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सब ठीक हो जाएगा...पिता के ये शब्‍द सुन कर रो पड़ी थी 'दामिनी'

dainikbhaskar.com | Jan 06, 2013, 10:03 IST

  • 16 दिसंबर की रात दिल्‍ली में चलती बस में गैंगरेप की शिकारहुई लड़की के पिता भी अब दुनिया के सामने आ गए हैं। उन्‍होंने अपनी बेटी का नाम भी बताया (हम यहां नाम नहीं बता रहे हैं) है और कहा है कि दुनिया को उसका नाम जानना चाहिए, क्‍योंकि उनकी बेटी ने कोई गलत काम नहीं किया है। वह अपनी जान की हिफाजत करते हुए मरी है और दुनिया की दूसरी औरतों के लिए प्रेरणास्रोत बन सकती है। उन्‍होंने एक ब्रिटिश अखबार को दिए इंटरव्यू में बताया है कि उन्‍हें घटना के बारे में पहली बार 16 दिसंबर की रात सवा ग्‍यारह बजे पता चला था। हालांकि तब भी उन्‍हें यह पता नहीं था कि उनकी बेटी के साथ वास्‍तव में क्‍या हुआ है। उन्‍होंने कहा, '16 दिसंबर को रात 10.30 बजे मैं काम से लौटा था। मेरी पत्‍नी बटी को लेकर चिंतित थी, क्‍योंकि वह घर नहीं लौटी थी। हमने बेटी और उसके दोस्‍त के मोबाइल पर फोन किया, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला। रात 11.15 बजे अस्‍पताल से फोन आया कि मेरी बेटी के साथ कोई हादसा हो गया है।' इसके बाद वह अपने किसी दोस्‍त को लेकर मोटरसाइकिल से अस्‍पताल गए। उन्‍होंने कहा, 'वहां वह बिस्‍तर पर पड़ी थी। उसकी आंखें बंद थीं। मैंने उसके माथे पर हाथ फेरा और उसका नाम लेकर पुकारा। उसने आंखें खोलीं और रोना शुरू कर दिया। मैंने अपने आंसुओं पर काबू किया और उसे दिलासा देते हुए कहा कि सब ठीक हो जाएगा।' तब तक उन्‍हें असलियत मालूम नहीं थी। बाद में पुलिस ने असलियत बताई। इसके बाद उन्‍होंने पत्‍नी और बेटों को भी अस्‍पताल बुलाया, लेकिन वह उन्‍हें गैंगरेप की बात नहीं बता पाए।
    दूसरी ओर दिल्ली गैंगरेप के दो आरोपी सरकारी गवाह बनना चाहते हैं। मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट ज्योति क्लेर के सामने पेशी के दौरान दो आरोपी पवन गुप्ता और विनय गुप्ता ने सरकारी वकील की मदद लेने से इनकार कर दिया। उन्होंने इस मामले में सरकारी गवाह बनने की इच्छा जताई। वहीं अन्य आरोपी राम सिंह और मुकेश ने कोर्ट में पेशी के दौरान अपने बचाव के लिए सरकारी वकील की मदद मांगी। हालांकि सरकारी गवाह बनने से इस जघन्य अपराध के इन आरोपियों को शायद ही कोई राहत मिल पाए।

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  • वह बताते हैं कि शुरुआती दस दिनों तक पीड़ित कभी होश में आती, फिर बेहोश हो जाती। जब उसे घर जाने की बात कहते थे वह रोमांचित हो जाती थी और मुस्‍कुराने लगती थी। वह जीना चाहती थी, लेकिन उसकी आंत निकालनी पड़ी, जिसके बाद हालात मुश्किल हो गए और तमाम कोशिशों के बावजूद वह दुनिया छोड़ गई। उसने पुलिस को दो बार बयान दिए थे। उस समय उसके पिता के लिए वहां बैठना मुश्किल हो जाता था, क्‍योंकि वह बेटी की आपबीती सुन नहीं पाते थे। वह बताते हैं कि उनकी पत्‍नी उस दौरान मौजूद रहती थी और बेटी की आपबीती सुन कर अपने आंसू रोक नहीं पाती थी।
  • पिता ने यह भी बताया कि बेटी के साथ जो लड़का था वह उसका ब्‍वॉयफ्रेंड नहीं, बल्कि अच्‍छा दोस्‍त था। उन्‍होंने कहा, 'हम अलग जाति के हैं। इसलिए शादी का सवाल ही नहीं था। वैसे भी, बेटी ने कभी शादी की इच्‍छा नहीं जताई थी। वह पहले नौकरी करना चाहती थी। उसका सपना डॉक्‍टर बनने का और पैसे कमा कर विदेश जाने का था।' उन्‍होंने बेटी की पढ़ाई के लिए जमीन तक बेच दी थी। बेटी के सपनों के बारे में बात करते हुए आज भी पिता की आंखें चमक उठती हैं। ये सपने तो अब मर गए पर 'दामिनी' के पिता को यह उम्‍मीद है कि अब हर मां-बाप अपने बेटों को औरतों का सम्‍मान करना सिखाएंगे।

  • इससे पहले 16 दिसंबर की रात 'दामिनी' के साथ मौजूद रहे उसके दोस्‍त ने घटना का ब्‍यौरा दुनिया के सामने बताया था। उन्‍होंने कहा था- बस में सवार छह लोगों ने हमें बेरहमी से मारा। बस के शीशों पर काली फिल्म चढ़ी थी और पर्दे लगे थे। लाइटें भी बंद थीं। हम एक-दूसरे को बचाने की कोशिश कर रहे थे। शोर भी मचाया। मेरे दोस्त ने पुलिस को फोन करने का प्रयास भी किया। लेकिन गुंडों ने उनका मोबाइल छीन लिया। मेरे सिर पर रॉड मारी गई। फिर मैं बेहोश हो गया। होश आया तो देखा-वे बस को यहां से वहां दौड़ा रहे हैं। कोई दो-ढाई घंटे तक ऐसा चलता रहा। उसके बाद महिपालपुर फ्लाईओवर के नीचे हम दोनों को फेंक दिया। वे मेरी दोस्त को कुचलना भी चाहते थे। लेकिन किसी तरह मैंने उन्हें खींचकर बस के नीचे आने से बचाया। हमारे पास कपड़े नहीं थे। शरीर से खून बह रहा था। हम इंतजार करते रहे कि कोई तो मदद करेगा। कई गाड़ियां पास से गुजरीं, मैंने हाथ हिलाकर रुकने को कहा.. ऑटो, कार वाले स्पीड स्लो करते लेकिन रुका कोई नहीं। मैं चिल्लाता रहा कि कोई कपड़े तो दे दो। लेकिन किसी ने कपड़े नहीं दिए। 20-25 मिनट तक हम मदद के लिए लोगों को पुकारते रहे। 15-20 लोग वहां खड़े थे। कोई कह रहा था कि लूट का मामला होगा। डेढ़-दो घंटे हम वहीं पड़े रहे। फिर किसी के फोन करने पर पुलिस आई। पीसीआर के तीन वैन आए। पर पुलिस इस बात पर बहस करती रही कि यह मामला किस थाने का है... पूरा ब्‍योरा पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

  • दिल्‍ली के ज्‍वाइंट सीपी (साउथ वेस्‍ट) विवेक गोगिया ने पीडिता के दोस्‍त की बातोंको गलत बताते हुए हुए कहा कि पीसीआर वैन चार मिनट के भीतर मौका-ए-वारदात पर पहुंच गई थी। पीसीआर को पहली कॉल मिलने के बाद पुलिस पीडिता और उसके दोस्‍त को लेकर 16‍ मिनट के भीतर सफदरजंग हॉस्पिटल पहुंच चुकी थी। पीसीआर वैन वक्‍त पर पहुंच गई थी और इन वैन्‍स के लिए ज्‍यूरि‍‍सडिक्‍शन का कोई मतलब नहीं होता है। पुलिस अपनी ड्यूटी कर रही थी, कोई वाहवाही लूटने की कोशिश नहीं कर रही थी। पुलिस ने पीडिता के दोस्‍त को फर्स्‍ट ऐड दिया। अपने खर्चे पर पीडिता का इलाज करवाया।
    ज्‍वाइंट सीपी ने घटना का ब्‍यौरा देते हुए बताया कि पीसीआर को पहली कॉल 10:21 बजे रात को मिली। पहली पीसीआर ईगल 47 (E-47) 10:27 बजे मौके पर पहुंची। दूसरी पीसीआर जेब्रा 54 (Z-54) भी 10:28 बजे मौके पर पहुंच गई। पुलिस ने पीडिता और उसके दोस्‍त को 10:49 बजे जेब्रा 49 में बैठाया और 10:55 बजे सफदरजंग अस्‍पताल पहुंचाया।
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Web Title: Delhi gang rape
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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