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अफजल की फांसी पर पांच सवाल

dainikbhaskar.com | Feb 10, 2013, 07:04 IST

  • नई दिल्‍ली.संसद पर हमले के दोषी अफजल गुरु की फांसी पर अब जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा है कि कानूनी प्रक्रिया का सही तरह पालन नहीं किया गया। एक टीवी चैनल से बातचीत में उमर ने कहा कि इस फांसी से कश्मीरी लोगों की यह धारणा और बढ़ेगी कि उन्हें इंसाफ नहीं मिलता। उमर से पहले मानवाधिकार संगठन और लेखिका अरुंधति राय भी इस फांसी का अलग-अलग कारणों से विरोध कर रहे हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी अफजल की फांसी की निंदा की है।
    सीएम उमर अब्दुल्ला ने कहा कि इस बात पर भी सवाल उठेंगे कि जिन लोगों को प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री को मारने के लिए मौत की सजा सुनाई जा चुकी है, अफजल को उनसे पहले फांसी पर क्यों लटका दिया गया। उमर ने यह भी कहा कि अफजल गुरु के परिवार वालों को मौत से पहले उससे मिलने नहीं देना अमानवीय है।
    दिसंबर 2001 में संसद पर हमले के आरोपी अफजल गुरु को शनिवार को तिहाड़ जेल में फांसी देकर वहीं दफना दिया गया। अफजल की फांसी की सभी राजनीतिक दलों ने स्वागत किया लेकिन कश्मीर और दिल्ली समेत देश के कई हिस्सों में इसकेविरोध में आवाजें भी उठीं। सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और कुछ युवाओं ने फांसी पर सवाल उठाए। अफजल को संसद पर हमले के 12 साल बाद फांसी दी गई। अफजल का केस शुरू होने से लेकर उसे फांसी होने तक काफी अड़चनें आईं।फैसले के समय सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने इस मामले को अदालत के बाहर भी रेयरेस्ट ऑफ रेयरबना दिया था। ऐसे में हम 5 कारण बता रहे हैं जो अफजल की फांसीपर सवाल उठाते हैं।

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  • सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियां
    सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल के समय दी गई अपनी टिप्पणी में कहा था कि अगर अफजल के बयान को छोड़ दिया जाय तो यह साबित नहीं होता है कि वह किसी आतंकवादी संगठन का सदस्य है। और खुद उसका बयान भी उसे किसी आतंकी संगठन का सदस्य साबित नहीं करता है। सर्वोच्च अदालत ने यह भी टिप्पणी की थी कि संसद पर हमले ने देश कोझकझोर दिया है और समाज का 'सामूहिक विवेक' अपराधी को फांसी देने से ही संतुष्ट हो सकता है। अदालत ने इसके आगे कहा था कि आतंकियों और षड्यंत्रकारियों केइस कारनामे से देश की एकता, अखंडता और संप्रभुता को चुनौती मिली है। इस देशद्रोही षड्यंत्र में शामिल होने वाले के खिलाफ सबूत मिलने पर उसे अधिकतम सजादेकर ही इसका मुआवजा लिया जा सकता है।फांसी के विरोधी कह रहे हैं कि अदालत को सबूतों के आधार पर फैसला लेने के बजाय समाज के सामूहिक विवेक की तुष्टिके लिए फैसला दिया है।
  • देरी से मिला न्याय
    2011 में संसद पर हमले के आरोपी अफजल को फांसी देने में सजा मिलने में 12 साल लगे। जबकि 2008 में मुंबई हमलों के आरोपी अजमल आमिर कसाब को चारसाल बाद ही फांसी पर लटका दिया गया था। संसद पर हमले के शहीदों के परिजनों का कहना है कि उन्हें न्याय मिलने में काफी देर हुई। न्याय मिलने में हुई देरी केमामलों में कहा जाता रहा है कि देरी से मिला न्याय अन्याय के बराबर होता है। प्रमुख विपक्षी दल भाजपा ने भी इसे देरी से मिला न्याय कहा है। अफजल को फांसीमिलने में देरी से नाराज होकर संसद हमले में मारे गए शहीदों के परिजनों ने अपने मेडल भी लौटा दिए थे। हालांकि शनिवार को अफजल को फांसी दिए जाने के बादशहीदों के परिजनों ने टीवी पर आकर मेडल स्वीकार करने की बात कही है। हालांकि बलात्कार की तरह आतंक के मामलों में भी फास्ट्रटैक कोर्ट गठित करने के फैसलोंका मानवाधिकारवादी विरोध करते हैं। इनका तर्क होता है कि आतंक के मामलों में सबूत ढूंढने की जरूररत होती है, जिसमें समय लगता है।
  • मोदी के दबाव में फांसी?
    अफजल को दी गई फांसी को राजनीतिक विश्लेषक राजनीति से प्रेरित कदम बता रहे हैं। यही नहीं विश्लेषकों का कहना है कि अजमल कसाब की फांसी भी यूपीए सरकार ने मौजूदा समय और राजनीति में खुद को बनाए रखने के लिए दी है। गुजरात में विधानसभा चुनावों से ठीक 20 दिन पहले कसाब को फांसी दिए जाने पर राजनीतिकविश्लेषकों ने इसे गुजरात चुनावों के मद्देनजर उठाया गया यूपीए सरकार का कदम बताया था। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि इस बार भी एक हफ्ते से गुजरात केमुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी राष्ट्रीय मुद्दा बने हुए थे। समाचार माध्यमों में उनका नाम भाजपा के पीएम पद के उम्मीदवार के तौर पर उछाला जा रहा था। 12 फरवरी कोमहाकुंभ में भाग लेने इलाहाबाद भी जाना था। इससे ठीक पहले अफजल गुरु को फांसी दिए जाने से राष्ट्रीय मीडिया से मोदी, कुंभ और भाजपा पीएम जैसे मुद्दे पूरी तरहसे गायब हो गए।
  • आत्‍मसमर्पण किए आतंकवादी को फांसी पर सवाल
    राजनीतिक विश्लेषक और जानी मानी लेखिका अरुंधति राय कहती हैं अफजल गुरू एक सरेंडर्ड मिलिटेंट था, इसके बावजूद उसे फांसी दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अफजल जो कि एक सरेंडर्ड मिलिटेंट है देश के खिलाफ राष्ट्रदोह के कार्यों में लिप्त रहा है। वह समाज के लिए खतरनाक है और उसका जीवन खत्म कर देना चाहिए।अरुंधति कहती हैं कि इस पैराग्राफ में यह जाने बिना कि आज की तारीख में कश्मीर में सरेंडर्ड मिलिटेंट का क्या मतलब होता है, गलत तर्कों का इस्तेमाल किया गयाहै। नई दिल्ली में जंतर-मंतर पर अफजल की फांसी का विरोध करने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता गौतम नवलखा, हरीश सुंदरम और एपवा अध्यक्ष कविताकृष्णन कहतेहैं कि अफजल एक सरेंडर्ड मिलिटेंट था और उसे फेयर ट्रायल भी नहीं मिला था।
  • अमानवीय है फांसी
    फांसी को अमानवीय सजा बता कर अब तक दुनिया भर में 97 देश इस पर प्रतिबंध लगा चुके हैं। जबकि 58 देश फांसी दिए जाने के मामले में काफी सक्रिय हैं। अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल ने भी भारतीय संसद पर हमले के मामले में दोषी अफजल गुरु को फांसी दिए जाने की निंदा की है। एमनेस्टी इंटरनेशनल इंडिया के कार्यक्रम निदेशक शशि कुमार वेलथ ने कहा कि वे फांसी दिए जाने की कड़े शब्दों में निंदा करते है। उन्होंने आरोप लगाया कि अफजल गुरु की सुनवाई की निष्पक्षता को लेकर भी गंभीर सवाल हैं। कुछ महीनों पहले ही भारत सहित 39 देशों ने मौत की सजा पर प्रतिबंध के संबंध में संयुक्त राष्ट्र महासभा में पेश किए प्रस्ताव के मसौदे का विरोध किया था। भारत का तर्क था कि हर देश को अपनी कानून व्यवस्था तय करने का अधिकार है। प्रस्ताव के पक्ष में रिकार्ड 110 देशों ने मतदान किया। इस प्रस्ताव में फांसी पर रोक की बात कही गई थी। दो साल पहले 2010 में भी इस प्रस्ताव पर मतदान हुआ था, जिसमें 107 देशों ने मौत की सजा पर प्रतिबंध लगाने के पक्ष में मतदान किया था। मतदान के अगले ही दिन सुबह कसाब को फांसी दी गई थी। वैसे इस मतदान पर कई पुराने सहयोगी राष्ट्रों की अलग-अलग राय सामने आई। अमेरिका, जापान, चीन, पाकिस्तान, कोरिया, ईरान, इराक, कुवैत, लीबिया और भारत समेत 39 देशों ने इस प्रस्ताव के विरोध में मतदान किया। 36 देशों ने कोई राय जाहिर नहीं की थी। इस प्रस्ताव के पक्ष में जबरदस्त अभियान चलाने वाले राष्ट्र नॉर्वे ने अपने ट्विटर अकाउंट पर पोस्ट किया था कि इतना भारी समर्थन एक ‘महान परिणाम’ है।
    मौत की सजा पर कुछ खास जानकारियां-
    -73 देशों में इस सजा को लागू करने के लिए गोली मारी जाती है।
    -इनमें से 45 देशों में फायरिंग स्कॉड मौत की सजा को लागू करने का एकमात्र तरीका है।
    -भारत सहित 33 देशों में फांसी मृत्युदंड का एकमात्र तरीका है।
    -छह देशों में स्टोनिंग यानी पत्थर मार कर यह दंड दिया जाता है जबकि पांच देशों में इंजेक्शन देकर यह सजा दी जाती है।
    -तीन देशों में सिर कलम कर इस सजा को अंजाम दिया जाता है।
    -चीन में इंजेक्शन और फायरिंग के जरिए मृत्युदंड की सजा दी जाती है।
    -अफगानिस्तान और सूडान में फांसी के अलावा फायरिंग और पथराव के जरिए भी ऐसी सजा दी जाती है।
  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
Web Title: four questions on afzal's hanging
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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