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फोटो खिंचाने से बचने वालीं शमशाद बेगम मौत के बाद भी रहीं गुमनाम, घंटों बाद दुनिया को हुई खबर

dainikbhaskar.com | Apr 24, 2013, 11:44 IST

  • मुंबई.एक तरफ दि‍ल्‍ली के एम्‍स में भर्ती गुड़ि‍या अपने पि‍ता की गोद में चहकने लगी है और देश की नजरों का नूर बनी हुई है तो दूसरी तरफ सदाबहार गानों की मलिका पद्मश्री शमशाद बेगम बहुत ही खामोशी के साथ चली गईं। सचिन के 40वें जन्‍मदिनकी खबरों के लिए विशेष तैयारी में मशगूल मीडिया को भी उनकी मौत की खबर काफी देर बाद मिली। 23 अप्रैल की रात मुंबई स्‍थित एक अस्‍पताल में शमशाद बेगम का नि‍धन हो गया। एक जमाने में उनके आगे पीछे डोलने वाले बॉलीवुड की तरफ से उन्‍हें आखि‍री सलाम करने कोई नहीं पहुंचा। उनके जनाजे में भी चुनिंदा मि‍त्र व रि‍श्‍तेदार ही थी। मीडिया में भी उनके निधन की खबर बुधवार सुबह ही आई।
    पि‍छले वर्ष से ही शमशाद बेगम की तबि‍यत नासाज थी। उन्‍हें सुनाई भी कम देता था। उम्र उनकी सेहत पर हावी हो चुकी थी। शमशाद बेगम की बेटी उषा ने बताया कि वह पिछले कुछ महीनों से अस्वस्थ थीं और अस्पताल में थीं। पिछली रात उनका निधन हो गया। उनके जनाजे में सिर्फ कुछ मित्र मौजूद थे। वर्ष 1955 में अपने पति गणपत लाल बट्टो के निधन के बाद से शमशाद मुंबई में अपनी बेटी उषा रात्रा और दामाद के साथ रह रही थीं। उनकी नजदीकी इंदौर नि‍वासी डॉ.रायसिंघानी कहती हैं उनके कमरें में ढेरों ट्राफियां और अवाड्र्स करीने से सजाकर रखे गए हैं, लेकिन जब भी वह उनके घर गईं, शमशाद बेगम ने खासतौर पर हमेशा ग्रेट गोल्डन अवार्ड दिखाया।।
    शमशाद बेगम का जन्म 14 अप्रैल, 1919 को लाहौर में हुआ था। ये बचपन से ही के.एल. सहगल की बिग फैन थीं और इन्होंने 'देवदास' फिल्म 14 बार देखी थी। शमशाद बेगम ने अपने सिंगिंग करियर की शुरुआत 16 दिसंबर, 1947 को पेशावर रेडियो से शुरू किया था। इनकी सम्मोहक आवाज ने महान संगीतकार नौशाद और ओ.पी. नैय्यर का ध्यान अपनी ओर खींचा और इन्होंने फिल्मों में प्लेबैक सिंगर के रूप में इन्हें ब्रेक दिया। इसके बाद तो शमशाद बेगम की सुरीली आवाज ने लोगों को इनका दीवाना बना दिया। 50, 60 और 70 के दशक में ये म्यूज़िक डायरेक्टर्स की पहली पसंद बनी रहीं। शमशाद बेगम ने ऑल इंडिया रेडियो के लिए भी गाया। इन्होंने अपना म्यूज़िकल ग्रुप 'द क्राउन थिएट्रिकल कंपनी ऑफ परफॉर्मिंग आर्ट' बनाया और इसके माध्यम से पूरे देश में अनेकों प्रस्तुतियां दीं। इन्होंने कुछ म्यूज़िक कंपनियों के लिए भक्ति गीत भी गाए।

    उन्होंने हिंदी-उर्दू फिल्मों में पांच सौ से ज्यादे गाने गाये, जिनमें से दर्ज़नों गाने आज भी पुराने फ़िल्मी गीत-प्रेमियों की पसंद बने हुए हैं। उनके गाये कुछ सदाबहार गीत हैं - 'छोड़ बाबुल का घर', 'होली आई रे कन्हाई', 'गाडी वाले गाडी धीरे हांक रे' ( मदर इंडिया ), 'तेरी महफ़िल में क़िस्मत आज़मा कर' ( मुग़ल-ए-आज़म ), 'मेरे पिया गए रंगून' ( पतंगा ), 'कभी आर कभी पार' ( आर पार ), 'लेके पहला पहला प्यार', 'कहीं पे निगाहें कहीं पे निशाना' ( सी .आई .डी ), 'मिलते ही आंखें दिल हुआ दीवाना किसी का' ( बाबुल ), 'बचपन के दिन भुला न देना' ( दीदार ), 'दूर कोई गाए' ( बैजू बावरा ), 'सैया दिल में आना रे' ( बहार ), 'मोहन की मुरलिया बाजे', 'धरती को आकाश पुकारे' ( मेला ), 'नैना भर आये नीर' ( हुमायूं ), 'मेरी नींदों में तुम' ( नया अंदाज़ ), 'कजरा मुहब्बत वाला' ( क़िस्मत ) आदि। फिल्म संगीत में योगदान के लिए भारत सरकार ने 2009 में उन्हें 'पद्मभूषण' से नवाज़ा।

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  • फोटो खिंचाने से परहेज करती थीं शमशाद बेगम
    शमशाद बेगम के बारे में कहा जाता है कि ये अपने-आप को खूबसूरत नहीं मानती थीं, इसलिए अपना फोटो खिचवाने से परहेज करती थीं। इनके बहुत कम ही फोटो उपलब्ध हैं। इन्होंने गनपतलाल बट्टो से शादी की थी। उनका निधन 1955 में ही हो गया था। इसके बाद से वह अपने दामाद और बेटी ऊषा रात्रा के साथ मुंबई में रहती हैं। इनके साथ एक कॉन्ट्रोवर्सी भी जुड़ गई। 1998 में यह खबर आई कि इनका निधन हो गया, पर वो दूसरी शमशाद बेगम थीं, नसीम बानो की मां, जिनकी बेटी सायरा बानो हिंदी फिल्मों की मशहूर एक्ट्रेस और बॉलीवुड आइकॉन दिलीप कुमार की वाइफ हैं।
    आगे पढ़ें- उस्‍ताद हुसैन बख्‍श्‍वाले साहेब की शि‍ष्‍या थीं शमशाद बेगम
  • उस्‍ताद हुसैन बख्‍श्‍वाले साहेब की शि‍ष्‍या थीं शमशाद बेगम
    शमशाद बेगम की सुरीली आवाज ने सारंगी के उस्ताद हुसैन बख्शवाले साहेब का ध्यान खींचा और उन्होंने इन्हें अपनी शिष्या बना लिया। लाहौर के संगीतकार गुलाम हैदर ने इनकी जादुई आवाज का इस्तेमाल फिल्म 'खजांची'(1941) और 'खानदान' (1942) में किया। 1944 में ये गुलाम हैदर की टीम के साथ मुंबई आ गईं। यहां इन्होंने कई फिल्मों के लिए गाया। इन्होंने पहला वेस्टर्नाइज्ड सॉन्ग 'मेरी जान...सनडे के सनडे' गा कर धूम मचा दिया था। ओ.पी.नैयर ने इनकी आवाज की तुलना मंदिर में बजने वाली घंटियों की आवाज से की है। इनकी गायन शैली पूरी तरह मौलिक थी। इन्हें लता मंगेशकर, आशा भोंसले, गीता दत्त और अमीरबाई कर्नाटकी से जरा भी कम नहीं आंका गया। 2009 में इन्हें प्रेस्टिजियस ओ.पी. नैयर अवार्ड से नवाजा गया।
    आगे पढ़ें-'खनकती आवाज़ ही इनकी पहचान है'
  • 'खनकती आवाज़ ही इनकी पहचान है'
    शमशाद बेगम की आवाज़ की तारीफ़ में संगीतकार नौशाद साहब नें कहा था कि इसमें पंजाब की पांचों दरियाओं की रवानी है। उधर ओपी नय्यर साहब ने इनकी शान में कहा था कि इस आवाज़ को सुन कर ऐसा लगता है जैसे किसी मंदिर में घंटियां बज रही हों। इस अज़ीम गुलुकारा नें कभी हमसे अपना नाम बूझने को कहा था, लेकिन हक़ीक़त तो यह है कि आज भी जब हम इनका गाया कोई गीत सुनते हैं तो इनका नाम बूझने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती, क्योंकि इनकी खनकती आवाज़ ही इनकी पहचान है।
    कई वर्ष पहले विविध भारती के जयमाला कार्यक्रम में फ़ौजी जवानों को सम्बोधित करते हुए शमशाद बेगम नें बरसों बरस पहले अपनी दास्तान कुछ यूं शुरु की थी - 'देश के रखवालों, आप सब को मेरी दुआएं! मेरे लिए गाना तो आसान है, पर बोलना बहुत मुश्किल। समझ में नहीं आ रहा है कि कहां से शुरु करूं! आप मेरे गाने अपने बचपन से ही सुनते चले आ रहे होंगे, पर आज पहली बार आप से बातें कर रही हूं। जगबीती बयान करना मेरे लिये बहुत मुश्किल है। दास्तान यूं है कि मेरा जन्म लाहौर में 1919 में हुआ। उस समय लड़कियों को जो ज़रूरी तालीम दी जाती थी, मुझे भी दी गई। गाने का शौक घर में किसी का भी नहीं था मेरे अलावा। मेरे वालिद ग़ज़लों के शौक़ीन थे और वे मुशायरों में जाया करते थे। कभी कभी वे मुझसे ग़ज़लें गाने को भी कहते थे।'
    आगे पढ़ें-पहली हिंदी फ़िल्म थी पंचोली साहब की 'ख़ज़ांची'
  • पहली हिंदी फ़िल्म थी पंचोली साहब की 'ख़ज़ांची'

    जयमाला कार्यक्रम में शमशाद बेगम ने कहा- 'मास्टर ग़ुलाम हैदर मेरे वालिद के अच्छे दोस्त थे। एक बार उन्होंने मेरी आवाज़ सुनी और उनको मेरी आवाज़ पसंद आ गई। मास्टरजी नें एक रेकॉर्डिंग् कंपनी (jien-o-phone) के ज़रिये मेरा पहला रेकॉर्ड निकलवा दिया। 14 साल की उम्र में मेरा पहला गाना रेकॉर्ड हुआ जो था "हाथ जोड़ा लई पखियंदा ओये क़सम ख़ुदा दी चंदा"। उस रेकॉर्ड कंपनी नें फिर मेरे 100 रेकॉर्ड्स निकाले। 1937 में मैं पेशावर रेडियो की आर्टिस्ट बन गई, जहां मैंने पश्तो, परशियन, हिंदी, उर्दू और पंजाबी में प्रोग्राम पेश किए। पर मैंने कभी संगीत की कोई तालीम नहीं ली। 1939 में मैं लाहौर और फिर दिल्ली में रेडियो प्रोग्राम करने लगी। पंचोली जी नें पहली बार मुझे प्लेबैक का मौका दिया 1940 की पंजाबी फ़िल्म 'यमला जट' में, जिसमें मेरा गीत "आ सजना" काफ़ी हिट हुआ था। मेरी पहली हिंदी फ़िल्म थी पंचोली साहब की 'ख़ज़ांची'। उन्होंने मुझसे फ़िल्म के सभी आठ गीत गवाये। यह फ़िल्म 52 हफ़्तों से ज़्यादा चली।"

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Web Title: legend of bollywood songs shamshad begam died in mumbai
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