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रेल मंत्रालय, बंसल स्टाइल

डॉ. भारत अग्रवाल | Nov 19, 2012, 12:05 IST

  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
रेल मंत्रालय, बंसल स्टाइल
प्रथम अफगान पुत्री
अफगानिस्तान के राष्ट्रपति हामिद करजई पिछले दिनों दिल्ली आए थे। उनकी बात बताएं, उसके पहले उससे पहले की बात बताते हैं, जब पाकिस्तानी सदर आसिफ जरदारी अजमेर तक अपनी तशरीफ वाया दिल्ली ले गए थे। उनके साथ उनके वारिस और पार्टी में उनके बराबर के ओहदे वाले बिलावल भी थे। प्रोटोकॉल सरीखे अंदाज में बिलावल जरदारी भुट्टो की मुलाकात राहुल गांधी से करवाई गई थी। लेकिन करजई साब आए तो समस्या हो गई। उनकी बिटिया मात्र आठ महीने की है और भारत में यह प्रोटोकॉल निभाने लायक कोई भावी नेता न थी, न था। वैसे करजई की बिटिया बहुत ही सुंदर है। नाम है- मलाला। इसका पाकिस्तान वाली मलाला से कोई संबंध नहीं है।
रेल मंत्रालय, बंसल स्टाइल
रेल मंत्रालय मुद्दत बाद कांग्रेस के पास आया है। वे दिन हवा हुए जब गनी खां रेल चलाया करते थे। बहरहाल, अब पवन कुमार बंसल रेल मंत्री हैं और मंत्रालय के पूर्वजों की परंपरा का निर्वाह करने के लिए उनके पास न तो चंडीगढ़ में रेलवे का जोनल ऑफिस खोलने की गुंजाइश है, न स्प्रिंग कारखाना खोलने की। लेकिन बात मजबूरी की नहीं है। बंसल रेल मंत्रियों की और भी परंपराएं तोड़ रहे हैं। जैसे वह रेल मंत्री बनने के बाद भी चंडीगढ़ उसी शताब्दी से आते-जाते हैं, जिससे पहले आते-जाते थे। मंत्री वाली विशेष ट्रेन यूं ही खड़ी है।
एक्स्ट्रा बोझ
काश परंपरा तोड़ने की गुंजाइश कमलनाथ के पास भी होती। संसदीय कार्य मंत्रालय हाथ में है, अतिरिक्त बोझ (प्रभार) की तरह। संसद सत्र सिर पर है और वो भी अतिरिक्त बोझ ही है। एफडीआई का मसला है और वो भी अतिरिक्त बोझ है। डीएमके और मुलायम सिंह एफडीआई पर कम से कम सबके सामने तो नाराज हैं ही, और ये एक और अतिरिक्त बोझ है। इतना बोझ ढोने के कारण कमलनाथ को सुबह-शाम लंच-डिनर पार्टियां करनी पड़ रही हैं। ये बोनस का अतिरिक्त बोझ है।
ज्यादा ही फुर्तीले
दिग्विजय सिंह के बारे में हम कुछ नहीं कहेंगे। वजह ये है कि हमसे पहले भी कई लोग कह चुके हैं और हमारे बाद भी कई लोग कहेंगे। ट्विटर, फेसबुक सारा इंटरनेट, और न जाने क्या-क्या भरे पड़े हैं। लेकिन दिग्विजय सिंह की तरह कह सकने की हिम्मत आज भी और किसी में नहीं है। बाल ठाकरे बीमार पड़े थे। अफवाहें चल रही थीं। दिग्विजय ने ट्वीट दे मारा कि उन्हें बालासाहेब के निधन का दु:ख है। थोड़ी देर में किसी ने टोका, तो करेक्शन वाला ट्वीट कर दिया कि भाई पिछले ट्वीट का बहुत दु:ख है। बात का बतंगड़ बने, इसके पहले ही राजा साब ने मीडिया के सामने भी पूरा किस्सा बयान कर दिया।
बैकपैक वाले नवरत्न
शहंशाह अकबर का जमाना होता, तो अपने जयराम रमेश नवरत्नों में जरूर शुमार होते। लेकिन इस इक्कीसवीं सदी में उनका नंबर पंद्रह-सोलह के बाद ही लग पा रहा है। हाल ही में कैबिनेट की मीटिंग में जयराम रमेश एक पूरा बैकपैक लेकर हाजिर हुए। आम तौर पर मंत्री लोग एक-दो फाइलें या ब्रीफकेस ले आते हैं। पता नहीं शशि थरूर ने देख लिया होता, तो वो क्या ट्वीट करते, लेकिन नवरत्नों वाला आइडिया हमें वहीं के किसी ने बिना ट्वीट किए दिया था।
गडकरी का चुप्पी दांव
नितिन गडकरी को लेकर भाजपा की बेचैनी गुमसुम अवस्था को प्राप्त हो गई है। उम्मीद है कि उसकी गूंज अरुणाचल में सुनाई देगी। गडकरी के कुछ तो सितारे खराब हैं, कुछ उनके दुश्मन ज्यादा ही प्रेमी हैं और कुछ अपनी भी गलतियां हैं। दाऊद और विवेकानंद वाला मसला जिन्ना की तारीफ के लेवल तक नहीं गया, यही गनीमत है। अब गडकरी मनमोहन के चुप्पी फॉमरूले पर काम कर रहे हैं। जरूरत पड़ी तो नरसिंह राव के लेवल तक जाएंगे।
अंदरूनी लोकपाल
गडकरी तो गडकरी, उन्हें क्लीनचिट देने वाले एस. गुरुमूर्ति भी विवादों में फंस गए। गुरुमूर्ति संघ के वरिष्ठ लोगों में गिने जाते हैं, लेकिन गडकरी मामले पर वह वैसे ही अचानक सामने आए, जैसे केजरीवाल अंदरूनी लोकपाल से अंदरूनी ऑडिट कराकर खुद को क्लीनचिट देने में लगे हैं। लेकिन गुरुमूर्ति ने ट्वीट करके फिर गड़बड़ कर दी।
बड़ा खेल
भारत के तीन बड़े औद्योगिक घराने मिलकर आपसी तालमेल और रणनीति को धार देने की तैयारी में लगे हैं। यह एफडीआई की घोषणा का असर है या पल-पल बदलती राजनीति का- यह अभी पता नहीं चला है।
सी ए टी कैट, कैट माने बिल्ली
सीबीआई के डायरेक्टर बनने की जुगत में लगे अफसरों में एक नाम हाल ही में उत्तरप्रदेश से जुड़ा है। यूपी कैडर का अफसर सीबीआई डायरेक्टर बने, तो कसम माया-मुलायम की, उसे तो बिल्कुल होम स्टेट जैसा फील होगा। लेकिन ये बात दिल्ली वालों को रास नहीं आ रही है। दिल्ली वाले यूपी वालों से सीनियर भी हैं, सीबीआई में रह भी चुके हैं और पता कर रहे हैं कि अगर हमें न बनाकर उन्हें बनाया, तो क्या इसे कैट में चुनौती दी जा सकेगी। दौड़ में दिल्ली के पुलिस कमिश्नर नीरज कुमार पहले से हैं और अब नाम सामने आ रहा है अतुल कुमार का। अतुल 1976 के बैच के हैं।
संसद सुरक्षा सप्ताह!
दिल्ली पुलिस सड़क सुरक्षा सप्ताह कई बार मनाती है। इस बार वो चाहे तो और भी कुछ मना सकती है। दरअसल 22 नवंबर से संसद सत्र शुरू हो रहा है और संसद के मुख्य सुरक्षा अधिकारी का अतिरिक्त सचिव स्तर का पद दो महीने से खाली पड़ा है। लोकसभा सचिवालय वीवीआईपी सुरक्षा की तरफ से लापरवाह माना जा रहा है।
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Web Title: Ministry of Railways, Bansal Style
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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