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दिल्‍ली गैंगरेप की छात्रा के नाम से अधिक जरूरी है कुछ बदलाव

dainikbhaskar.com | Jan 07, 2013, 09:29 IST

  • नई दिल्‍ली। दिल्‍ली में चलती बस में गैंगरेप मामले में पांच आरोपियों की साकेत कोर्ट में पेशी के दौरान जबरदस्‍त हंगामाहुआ। दो वकील आरोपियों का मुकदमा लड़ने के लिए तैयार हो गए। इसके बाद ही कई वकील भड़क गए और उन्‍होंने हंगामा मचा दिया।

    इस बीच देश में लगातार बलात्‍कारकी घटनाएं हो रही हैं और इसी बीच इस पर बहस भी चल रही है। टाइम डॉट कॉम भी इस पर बहस चला रहा है। जद(यू) अध्‍यक्ष शरद यादव ने कहा है कि अभी जो बलात्‍कार पर देश भर में बहस चल रही है, वह सतही है। उधर, गैंग रेप की शिकार बनने के बाद जिंदगी को अलविदा कह चुकी दामिनी (जानिए छात्रा की आपबी‍ती) को न्‍याय दिलाने के लिए जहां आज भी कड़ाके की ठंड के बावजूद लोग जंतर-मंतर पर उसके लिए लड़ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर, इस छात्रा के नाम को दुनिया के सामने लाया जाए या नहीं, इस पर तेज बहस चल रही है (जानिए :'दामिनी' को इंसाफ दिलाने के 5 उपाय)। ब्रिटिश अखबार ने पिता के हवाले से छापा किवह चाहते हैं कि उनकी बेटी का नाम दुनिया के सामने आए (हालांकि छात्रा के पिता ने बाद में स्‍पष्‍ट किया कि वह केवल कानून बनाने के लिए बेटी के नाम का इस्‍तेमाल चाहते हैं, वरना नाम जगजाहिर करना नहीं चाहते)। इसके बाद भारत में भी कुछ मीडिया के एक तबके में नाम छापने की होड़ दिखी और सोशल साइट्स पर तो इस पर खूब बहस हुई। इस बहस की शुरुआत सरकार में मंत्री पद पर काबिज शशि थरूर के ट्वीट से हुई, जो चाहते हैं कि छात्रा के नाम से देश में कानून बने। भाजपा इस छात्रा को मरणोपरांत अशोक चक्र देने की वकालत कर रही है (दिल्‍ली गैंग रेप: आपस में भी नहीं करते बात, खुदकुशी कर सकते हैं 5 आरोपी!)। लेकिन असल सवाल नाम का नहीं है। सवाल है बदलाव का। पुलिस की कार्यप्रणाली, अस्‍पताल के बुनियादी ढांचों, समाज के सोच, नेताओं के नजरिये में बदलाव का।

    मप्र के मंत्री, महिला वैज्ञानिक से लेकर आसाराम बापू तक इस मामले में जो बयान दे रहे हैं, वे इस बदलाव की और ज्‍यादा जरूरत दर्शाते हैं।

    आगे की स्‍लाइड में जानिए, पुलिस, समाज, अस्‍पताल और कानून की वर्तमान स्थिति और बदलाव के कुछ महत्‍वपूर्ण सुझाव।

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  • अंग्रेजों के जमाने की पुलिस

    हमारी पुलिस आज भी अंग्रेजों के जमाने की पुलिस बनी हुई है। देश के कुछेक शहरों को यदि छोड़ दिया जाए तो अधिकांश जगह पुलिस की भूमिका शर्मनाक ही रहती है। दामिनी और उसके दोस्‍त की मदद के लिए पुलिस आई तो अपने अपने अधिकार क्षेत्र को लेकर उलझी रही (जैसा कि दोस्‍त ने मीडिया के जरिए देश को बताया)। पुलिस जहां आपस में ही बहस कर रही थी, वहीं दामिनी और उसका दोस्‍त जिंदगी के लिए मौत से लड़ रहे थे। घटना स्थल पर पीसीआर के तीन वैन आए। पर पुलिस इस बात पर बहस करती रही कि यह मामला किस थाने का है।

    पूर्व आईपीएस किरण बेदी का कहना है कि पुलिस में सुधार तेज करना चाहिए। हमें न सिर्फ पुलिस की यूनिफार्म को चेंज करना होगा बल्कि उन्‍हें संवेदनशील बनाने के लिए कई प्रकार के प्रयास करने होंगे।
    पुलिस की संवेदनहीनता को इस बात से ही समझा जा सकता है कि दामिनी के केस में पुलिस धारा 302 लगाना ही भूल गई। इतना ही नहीं, पुलिस को लगता है कि महिलाएं आधुनिक कपड़े पहनती हैं, इसलिए उनके साथ बलात्‍कार होता है। लेकिन क्‍या कोई इस बात का जवाब देगा कि हर दिन गांव में जो बलात्‍कार होते हैं, उसमें कपड़ों की क्‍या भूमिका है। (पढ़ें: पुलिस की नजर में रेप के कुछ अजीबोगरीब कारण)
    पुलिस के तानाशाही रवैए के पीछे सबसे बड़ा कारण अग्रेजों के जमाने में बना पुलिस अधिनियम है। 1861 में बने पुलिस अधिनियम के मुताबिक ही देश के अधिकांश राज्यों की पुलिस आज भी काम कर रही है। आजादी से पहले तक पुलिस का काम अंग्रेजों के‍ खिलाफ हो रही बगावत को कुचलना था, आज पुलिस यही काम सत्‍ता के लिए करती है। देश आजाद हो गया लेकिन कानून वही का वही रहा। कई राज्‍यों ने अपने अपने पुलिस से जुड़े कानून बनाए। लेकिन पुलिस के चरित्र में कोई खास बदलाव नहीं आया। सुधार की कोशिश की गई। पुलिस सुधार के खातिर राष्ट्रीय पुलिस आयोग का गठन 1979 में किया गया था। एक के बाद एक कई रिपोर्ट इस आयोग ने दी। लेकिन आज तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया।
  • कानून की खामियां
    साल 2011 में भारत में हुए बलात्कार के कुल मामलों के मात्र 26 प्रतिशत में ही आरोपियों को सजा हो पाई। सबसे बुरा हाल दिल्ली का है। यहां दर्ज हुए बलात्कार के 635 मामलों में से मात्र एक में ही दोषी को सजा हो सकी। भले ही कानूनों में छोटे-छोटे बदलाव किए गए हों लेकिन हालात अब भी नहीं बदले हैं। आज भी पीड़िता की सेक्स हिस्ट्री जानने के लिए 'टू फिंगर टेस्ट' (पीड़िता के प्राइवेट पार्ट्स में दो उंगली डालकर) किया जाता है। यह टेस्ट ही बलात्कार के मामलों में हमारे कानून की उदासीनता का प्रतीक है। अगर यह कहा जाए कि बलात्‍कारी के बाद कानून करता है पीडि़ता का 'बलात्‍कार' , तो गलत नहीं होगा।
    रेप पीडि़ता की पहचान जगजाहिर करने को लेकर आईपीसी की धारा 228 ए में जिक्र है। इसके तहत बलात्‍कार पीडि़त की पहचान को सार्वजनिक करना गैरकानूनी है। लेकिन इस धारा में यह भी प्रावधान है कि अगर पीडि़त मर गई हो या वह अपनी पहचान सार्वजनिक करने की लिखित इजाजत दे चुकी हो या फिर मामले की सुनवाई कर रही अदालत ने ऐसा करने का आदेश दिया हो तो पहचान सार्वजनिक करना अपराध नहीं माना जाएगा।
    आईपीसी की धारा 375 और 376 में शादी के बाद सेक्‍स का जिक्र है। इसमें कहा गया है कि अगर पत्‍नी 15 साल से कम उम्र की है तो उसके साथ बिना उसकी मर्जी से शारीरिक संबंध बनाना रेप माना जाएगा। सरकार ने इस संबंध बिल का जो ताजा मसौदा पेश किया है, उसमें इस उम्र सीमा को एक साल बढ़ा भर दिया गया है। मूल रूप से पत्‍नी की मर्जी के बिना सेक्‍स के प्रति उसे सुरक्षा देने का कोई इंतजाम इस बिल में नहीं है। शादी के बाद रेप (पत्‍नी से) के मामले में इक्‍कीसवीं सदी की सोच इस बिल में कहीं नहीं झलकती है। यह तब हो रहा है कि जब दुनिया के सौ से अधिक देशों ने बीवी के साथ जबरन शारीरिक संबंध बनाने को अपराध माना है।
    दिसंबर की शुरुआत में दिल्ली की एक अदालत ने भी साफ कर दिया था कि पत्‍नी के साथ जबरदस्‍ती सेक्‍स करना रेप नहीं माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि आईपीसी में वैवाहिक बलात्कार जैसा कोई मामला नहीं होता है। यदि शादी कानूनन सही है तो पत्‍नी से सेक्स (भले ही जबरन किया गया हो) रेप जैसा मामला नहीं है। पत्नी से रेप के आरोप में एक आरोपी को अदालत ने यह दलील देते हुए बरी कर दिया।
    सरकार का नजरिया
    जरा हमारी सरकार का नजरिया देखें। गृह मंत्रालय की नजर में किसी लड़की या महिला का पीछा करना और कपड़े उतारना यौन अपराध की श्रेणी में नहीं आते हैं। मंत्रालय का तर्क है कि इन्हें कोर्ट में परिभाषित करना और साबित करना कठिन होता है। इसलिए सरकार ने नए आपराधिक कानून संशोधन बिल-2012 में पीछा करने, कपड़े उतारने, नंगी परेड कराने और बाल मुंडवाने को यौन अपराध की अलग श्रेणी में नहीं रखने का फैसला किया है (पढ़ें :महिलाओं को नंगा करना यौन अपराध नहीं!)।दिल्‍ली गैंगरेप की घटना के बाद भी सरकार की ओर से कई घोषणाएं की गईं, लेकिन इन पर अमल शून्‍य रहा। महिलाओं की सहायता के लिए शुरू की गई हेल्‍पलाइन तक ठीक से काम नहीं कर पाई। बसों में होमगार्ड के जवान बैठाने का फैसला भी ढाक के तीन पात जैसा रहा। जिस सरकार पर सिस्‍टम दुरुस्‍त करने की जिम्‍मेदारी है, उसी की मुखिया (शीला दीक्षित) ने महिलाओं का सम्‍मान सुनिश्चित कराने के लिए मोर्चा निकाला।

  • समाज : नैतिकता की बातें सिर्फ कहने में
    हम भले ही दामिनी के लिए सड़क पर संघर्ष करें लेकिन सबसे पहले बदलाव हमें खुद से करना होगा। उस रात दामिनी और उसका दोस्‍त सड़क किनारे सैकड़ों लोगों से मदद मांगता रहा, लेकिन कोई आगे नहीं आया। दामिनी के दोस्‍त का कहना है कि हमारे पास कपड़े नहीं थे। शरीर से खून बह रहा था। हम इंतजार करते रहे कि कोई तो मदद करेगा। कई गाड़ियां पास से गुजरीं, मैंने हाथ हिलाकर रुकने को कहा.. ऑटो, कार वाले स्पीड स्लो करते लेकिन रुका कोई नहीं। मैं चिल्लाता रहा कि कोई कपड़े तो दे दो। लेकिन किसी ने कपड़े नहीं दिए। 20-25 मिनट तक हम मदद के लिए लोगों को पुकारते रहे। 15-20 लोग वहां खड़े थे। कोई कह रहा था कि लूट का मामला होगा। डेढ़-दो घंटे हम वहीं पड़े रहे। यदि आप और हम चाहते हैं कि अब देश में दूसरी दामिनी न हो तो शुरूआत हमें खुद से करनी होगी। यहां जानिए कुछ ऐसे ही उपाय के बारे में।
    भारतीय समाज में महिलाओं को देवी की तरह पूजा जाता है लेकिन घर से लेकर सड़क तक पर उन्‍हें ही निशाना बनाया जाता है। कहीं बाप तो कहीं शिक्षक महिलाओं के साथ खेल रहे हैं। हमारे समाज की पोल खोलते जरा इन आंकड़ों पर एक नजर डालें। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के अनुसार पिछले पांच सालों में महिलाओं के खिलाफ अपराधों में इजाफा हुआ है। 2007 में महिला उत्पीडऩ के लगभग 8.8 प्रतिशत मामले सामने आते थे। 2011 में यह दर बढ़कर दस फीसदी तक पहुंच गई है। पूरे देश में बलात्कार, महिलाओं पर हमले और प्रताडऩाओं के मामलों में भी बढ़ोतरी हुई है। इन अपराधों में 2010 के मुकाबले 2011 में औसतन 7.1 प्रतिशत का इजाफा हुआ है।
    यदि हमें समाज में अपराध रोकना है तो शुरूआत घर और स्‍कूलों से करनी होगी। बच्‍चों को नैतिक शिक्षा के साथ सेक्‍स एजुकेशन देना अनिवार्य करना होगा। इसके अलावा महिलाओं को देवी मानने की परंपरा को बंद कर उसे इंसान मानते हुए समानता का अधिकार देना होगा।

  • अस्‍पताल : जिंदगी देने वाली जगह बनी नरक
    हिंदुस्‍तान के किसी भी अस्‍पताल में चले जाएं, खासतौर से सरकारी अस्‍पतालों में, यहां न सिर्फ नर्स बल्कि डॉक्‍टर भी असंवेदनहीनता की चादर ओढ़े नजर आते हैं। मरीजों और उनके परिजनों के साथ गाली गलौज इन अस्‍पतालों में आम बात है। यदि कोई रेप पीडि़ता इन अस्‍पतालों में पहुंच जाती है तो यह अस्‍पताल के लिए चर्चा का विषय बन जाता है।
    जरा दामिनी के दोस्‍त की जुबानी सुनिए, दिल्‍ली के सफदरजंग अस्‍पताल की दास्‍तानं। पुलिस ने हमें सफदरगंज अस्पताल पहुंचाया। वहां भी किसी ने मदद नहीं की। किसी ने कंबल तक नहीं दिया। सफाईवाले से मदद मांगी। कहा पर्दा ही दे दो। ठंड लग रही है। लेकिन किसी ने नहीं दिया। मेरे हाथ-पैर से खून बह रहा था। मैं हाथ भी नहीं उठा पा रहा था। पैर में फ्रेक्चर था।
    आज भी बलात्‍कार की शिकार पीडि़त का मेडिकल उसके गुप्‍त अंग में अंगुली डालकर किया जाता है। रेप टेस्ट की एक समस्या यह भी है कि यह निर्धारित नहीं है कि डॉक्टर को क्या जांच करनी है और क्या नहीं करनी है। कई मामलों में डॉक्टर सिर्फ अपनी राय एक कागज पर लिखकर पुलिस स्टेशन भेज देता है। रेप टेस्ट के लिए निर्धारित पैमानों की अस्पष्टताका पता इस बात से भी चलता है कि रेप टेस्ट के दौरान डॉक्टरों को महिला की तंदुरुस्ती के बारे में भी राय देनी होती थी ताकि यह स्थापित किया जा सके की महिला अपना बचाव करने में सक्षम थी या नहीं। कई केस में देखने को आया है कि मेडिकल करने वाली डॉक्‍टर ही पीडि़त के साथ बदसलूकी करने लगता है।
  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
Web Title: News for delhi gang rape
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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