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दिल्‍ली गैंगरेप की छात्रा के नाम से अधिक जरूरी है कुछ बदलाव

dainikbhaskar.com | Jan 07, 2013, 09:29 AM IST

अंग्रेजों के जमाने की पुलिस

हमारी पुलिस आज भी अंग्रेजों के जमाने की पुलिस बनी हुई है। देश के कुछेक शहरों को यदि छोड़ दिया जाए तो अधिकांश जगह पुलिस की भूमिका शर्मनाक ही रहती है। दामिनी और उसके दोस्‍त की मदद के लिए पुलिस आई तो अपने अपने अधिकार क्षेत्र को लेकर उलझी रही (जैसा कि दोस्‍त ने मीडिया के जरिए देश को बताया)। पुलिस जहां आपस में ही बहस कर रही थी, वहीं दामिनी और उसका दोस्‍त जिंदगी के लिए मौत से लड़ रहे थे। घटना स्थल पर पीसीआर के तीन वैन आए। पर पुलिस इस बात पर बहस करती रही कि यह मामला किस थाने का है।

पूर्व आईपीएस किरण बेदी का कहना है कि पुलिस में सुधार तेज करना चाहिए। हमें न सिर्फ पुलिस की यूनिफार्म को चेंज करना होगा बल्कि उन्‍हें संवेदनशील बनाने के लिए कई प्रकार के प्रयास करने होंगे।
पुलिस की संवेदनहीनता को इस बात से ही समझा जा सकता है कि दामिनी के केस में पुलिस धारा 302 लगाना ही भूल गई। इतना ही नहीं, पुलिस को लगता है कि महिलाएं आधुनिक कपड़े पहनती हैं, इसलिए उनके साथ बलात्‍कार होता है। लेकिन क्‍या कोई इस बात का जवाब देगा कि हर दिन गांव में जो बलात्‍कार होते हैं, उसमें कपड़ों की क्‍या भूमिका है। (पढ़ें: पुलिस की नजर में रेप के कुछ अजीबोगरीब कारण)
पुलिस के तानाशाही रवैए के पीछे सबसे बड़ा कारण अग्रेजों के जमाने में बना पुलिस अधिनियम है। 1861 में बने पुलिस अधिनियम के मुताबिक ही देश के अधिकांश राज्यों की पुलिस आज भी काम कर रही है। आजादी से पहले तक पुलिस का काम अंग्रेजों के‍ खिलाफ हो रही बगावत को कुचलना था, आज पुलिस यही काम सत्‍ता के लिए करती है। देश आजाद हो गया लेकिन कानून वही का वही रहा। कई राज्‍यों ने अपने अपने पुलिस से जुड़े कानून बनाए। लेकिन पुलिस के चरित्र में कोई खास बदलाव नहीं आया। सुधार की कोशिश की गई। पुलिस सुधार के खातिर राष्ट्रीय पुलिस आयोग का गठन 1979 में किया गया था। एक के बाद एक कई रिपोर्ट इस आयोग ने दी। लेकिन आज तक इस दिशा में कोई कदम नहीं उठाया गया।
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Web Title: News for delhi gang rape
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)

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