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एक पंजाबी राबिनहुड की जो कराता था लड़िकयों को हरम से आजाद, आज भी मनता है उसकी याद में जश्न

अवनीन्द्र त्रिपाठी | Jan 06, 2013, 23:49 IST

  • पंजाब की पाक धरती पर कहने को यूं तो एक से बढ़कर एक सूरमा और बड़ी-बड़ी शख्सियतें हुईं मगर उनमें से एक अजेय-अमर पात्र ऐसा भी है जिसके बारे में हम सब जानते तो हैं फिर भी कुछ बातें ऐसी हैं जिनके बारे में बहुत कम कहा-सुना गया है।
    यहां बात हो रही है मुगिलया दौर में शासकों के दमन चक्र और विशेषकर महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचारों के खिलाफ उठ खड़े हुए एक मसीहा की। वो मसीहा जो न सिर्फ अन्याय पर उतारू शासन के खिलाफ खड़ा हो उठता है, बल्कि समाज के कमजोर वर्ग, विशेषकर महिलाओं के खिलाफ हो रहे अत्याचारों का सरेआम विरोध करता है।
    बहादुर इतना कि अकेले अपने दम पर अकबर काल के मजबूत मुगलिया सल्तनत की ईंट से ईंट बजा देता है। महिलाओं के खिलाफ उस दौर में प्रचलित हरम परंपरा पर प्रहार करने वाला यह शख्स कोई और नहीं, बल्कि भट्टी राजपूतों की शान दुल्ला भट्टी हैं। दुल्ला कितने प्रासंगिक हैं, इस बात का सबूत हर साल उनकी याद में मनाया जाने वाला त्योहार लोहड़ी है, जिसकी धूम पंजाब के साथ-साथ देश से लेकर विदेशों तक रहती है।
    आइये आगे की स्लाइड्स में जानते हैं दुल्ला भट्टी के बारे में और उनसे जुड़े कुछ रोचक तथ्य जो आपको मुगलिया दौर में ले जाएंगे...
  • दुल्ला भट्टी वाला हो......
    दुल्ला भट्टी का असली नाम राय अबदुल्ला खान भट्टी था. भट्टी का जन्म पाकिस्तान के पंजाब में पिण्डी भट्टियां नाम के जगह पर हुई. जैसलमेर की स्थापना करने वाले राजा रावल जैसल सिंह की पीढ़ियों से दुल्ला का काफी नजदीकी संबंध था. दुल्ला के जन्म के समय यह नाम उनकी मां ने उनको दिया जिसका अर्थ होता है शेर. दुल्ला के समय पंजाब में मुगलिया हुक्मरानों ने कुछ कुप्रथाएं चला रखी थीं उनमें मनमाना महसूल वसूलना और महिलाओं, बच्चों को गुलाम बनाने की परंपरा आम थी.
    महिलाओं को जहां हरम के लिए अगवा किया जाता था वहीं बच्चों को गुलाम बनाया जाता था. दुल्ला ने इन तीनों कुरीतियों के खिलाफ हल्ला बोला.
    अगली स्लाइड में पढ़िए दुल्ला के अकबर भी थे मुरीद
  • अकबर भी थे मुरीद
    दुल्ला के कारनामों की फेरहिस्त काफी लंबी-चौड़ी है. शब्द कम पड़ जाएं इस महान योद्धा के बखान में।
    कहा तो यहां तक जाता है कि मुगल शासन के महानतम बादशाह मोहम्मद जलालुद्दीन अकबर भी दुल्ला की बहादुरी के मुरीद थे। ये दुल्ला ही थे जिन्होंने मुगल काल के हुक्मरानों के तुगलकी फरमानों का विरोध करते हुए न सिर्फ विरोध किया बल्कि उन्हें इस प्रकार नाकों चनें चबाने पर मजबूर कर दिया कि अकबर को तकरीबन 20 साल तक दिल्ली की बजाए लाहौर को राजधानी बनाना पड़ गया था और इस दौरान लाहौर का किला शासन का केंद्र रहा। दुल्ला के बारे में मशहूर है कि वे गरीबों के मसीहा थे और अमीरों को लूटकर सारा पैसा देश की निर्धन गरीब जनता में बांट देते थे।
  • दुल्ला और प्रतिशोध
    दुल्ला भट्टी के दादा राय संदल खान उन चंद वीर लड़ाकों में थे जिन्होंने महमूद जगनवी के खिलाफ लड़ते हुए अपनी आखिरी सांस तक आक्रमणकारियों का प्रतिकार किया. जब दुल्ला को इस बात का पता चला तो उनके अंदर छुपा हुआ क्रोध प्रतिशोध में तब्दील हो गया. इस बीच शासन द्वारा मनमाने तौर पर वसूले जा रहे महसूलों के खिलाफ अवाम ने विरोध किया. जब अकबर को इस बात के बारे में मालूम हुआ तो उन्होंने आदेश दिया सभी बगावत करने वालों को फांसी देकर उनकी खाल उतरवाई जाए फिर उसमें भूसा भरकर उन्हें उन लोगों के घरों के बाहर लटका दिया जाए. दुल्ला को जब इस बात का पता चला तब उन्होंने कसम खाई कि वे अपने दादा का बदला लेंगे और समाज को मुगलिया शासन के आतंक से मुक्त कराकर ही दम लेंगे. अपने इस प्रयास के दौरान उन्होंने कई मशहूर डाके डाले जिससे उन्होंने एक छोटी सी सेना बनाई.
  • शहज़ादा सलीम से सांठ-गांठ
    इसी बीच अनारकली की मोहब्बत की गिरफ्त में कैद शहजादा सलीम ने दुल्ला से हाथ मिलाकर अकबर के खिलाफ बगावत का ऐलान कर दिया. हलांकि बगावत सफल नहीं हो पाया पर अपनी अवाम की भलाई के लिए लड़ने वाले दुल्ला पंजाब के जनमानस की लोक कथाओं के अमर पात्र बन गए.
  • दुल्ला और लोक गीत
    दुल्ला की याद में मनाए जाने वाला लोहड़ी पर्व विश्व भर में काफी धूम-धाम से मनाया जाता है. पंजाबी सभ्याचार के अभिन्न अंग इस त्योहार में एक लोक गीत है जो हमेशा गाया जा है जिसमें विवरण है कि किस प्रकार दुल्ला भट्टी सुंदर मुंदरी के दुखों का अंत कर उसे पिता की तरह दान-दहेज देकर इच्छित वर से ब्याह करवा देता है. हर बार की तरह इस बार भी हर्ष और उल्लास का त्योहार लोहड़ी दस्तक दे रहा है. सर्द मौसम में उल्लास और उमंग की नई ऊर्जा भरने वाले इस त्योहार को पंजाब समेत देश भर में जनवरी माह की तेरहवीं तारीख को मनाया जाएगा। इस दौरान जमकर जश्न मनेगा और पूरा समां खुशनुमा हो जाएगा, मगर पिछले साल और इस साल की शुरुआत में देशभर में जो निराशाओं का दौर चलता रहा उम्मीद है उससे हम निकल पाने में सफल रहेंगे।
    गीत के बोल इस प्रकार हैं-
    सुंदर मुंदरिए हो,
    तेरा कौन बिचारा हो,
    दुल्ला भट्टी वाला हो,
    दुल्ले ने धी वियाही,
    शेर शक्कर पाई,
    कुड़ी दा लाल पथाका हो,
    कुड़ी दा साल्लू पाट्टा हो,
    साल्लू कौण समेट्टे,
    चाच्चा गली दिस्से,
    चाच्ची चूरी कुट्टी, जमींदारां ने लुट्टी,
    जमींदार सुधाए,
    बम बम भोले आए,
    इक भोला रह गेया,
    सिपाही फड़ के लै गेया,
    सिपाही ने मारी इट्ट,
    भांवें रो भांवें पिट्ट,
    सान्नूं दे दे लोहड़ी ते तेरी जीवे जोड़ी।।
  • यह है लोहड़ी का महत्व
    पंजाबी सभ्याचार के लिहाज से लोहड़ी का त्योहार काफी अहिमयत रखता है. जब देशभर में लोग 14 जनवरी को मकर संक्राति का त्योहार मनाते हैं वहीं 13 जनवरी की रात में पंजाब, पाक के पंजाब प्रांत, हरियाणा, दिल्ली और राजस्थान, हिमाचल प्रदेश और जम्मु के कुछ भागों में विशेषतौर पर इस त्योहार को काफी धूम-धाम के साथ मनाया जाता है साथ ही देश के अन्य भागों और विदेशों में भी इसकी धूम रहती है. चूंकि पौष मास में कोई और विशेष त्योहार नहीं पड़ता इस लिए भी इस त्योहार का महत्व काफी बढ़ जाता है। कहा जाता है कि इसी कारणवश इस त्योहार को मनाया जाता है जिससे पूरे माह की नीरसता का अंत हो और नवऊर्जा का संचार होता है। लोहड़ी को किसी भी शुभ काम के आरंभ के तौर पर भी देखा जाता है इसी लिए पहली लोहड़ी का महत्व काफी बढ़ जाता है।
  • ये होता है विधि-विधान
    लोहड़ी चूंकि आम अवाम की जनभावना से उत्पन्न त्योहार है इसलिए कोई विशेष विधि-विधान का बंधन नहीं है। हां यह त्योहार समाज को एकजुट करने के लिए काफी महत्वपूर्ण हो जाता है. इस दिन सामूहिक उल्लास को मुख्य तरजीह दी जाती है। चूंकि 14 तारीख को सूर्य मकर राषि में प्रवेश करता है इसिलए नई शुरुआत से पूर्व इस त्योहार का मक्सद नयी ऊर्जा को संचारित करना है। इस दिन लोग सामूहिक उत्सव का आनंद उठाते है। घरों के बाहर रात को उप्पलें, लकड़ी और जलावन इकट्ठा करके उन्हें तिकोने आकार में सजाया जाता है. फिर आग की परिक्रमा पूरे परिवार और मोहल्ले के साथ मिलकर की जाती है। आहुति के तौर पर आग में तिल, गुड़ और रेवड़ी व गजक डाली जाती है. मनवांछित मुरादें मांगी जाती हैं और बड़े-बूढ़ों का आशिर्वाद लिया जाता है फिर शुरू होता है उत्सव का दौर।
  • बच्चों की रहती है चांदी
    लोहड़ी का पर्व बच्चों के लिए काफी मायने रखता है। इस दिन शाम को होने वाले जश्न की सारी तैयारी में बच्चों का काफी अहम योगदान होता है। वे प्रफुल्लित होकर जलावन एकत्रित करते है। घर-घर जाकर लोहड़ी मांगकर शाम को जश्न के लिए जरूरी समान इकट्ठा करते है। फिर शाम होते ही शुरू हो जाता है जश्न का दौर। लोग लोकगीतों पर भंगड़ा और गिद्दा डालते है। रात भर खूब मौज-मस्ती होती है और चलता रहता है सेलीब्रेशन का दौर। इस त्योहार में पहली लोहड़ी काफी महत्वपूर्ण होती है। पहली लोहड़ी चाहें शादी की हो, चाहें किसी बच्चे के जन्म की या फिर नये घर या गाड़ी की, जो भी हो बहाना-जमकर मनता है जश्न..
    खुशियों के इस त्योहार की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।
  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
Web Title: special story on dulla bhatti of punjab
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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