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इतिहास के झरोखे सेः पंजाब में रखी गई थी सबसे पहले प्रजातंत्र की नींव

शिवराज द्रुपद | Jan 26, 2013, 04:40 IST

  • अमृतसर.भारतीय प्रजातंत्र की नींव आजादी से पहले 1929 की 31 दिसंबर को रख दी गई थी। इसकी शुरुआत पंजाब (अविभाज्य पंजाब) से हुई थी और इसमें लाहौर तथा अमृतसर शहरों ने अहम भूमिका निभाई थी। इस ऐतिहासिक मौके पर ध्वज फहराने के लिए महात्मा गांधी तक पहुंचे हुए थे। 26 जनवरी 1930 को स्वराज की घोषणा करते हुए इस दिन को ही स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाने की अपील की थी। इसके बाद इस दिन को ‘स्मृति दिवस’ के रूप में हर साल इसी तिथि को अमृतसर में मनाते हुए ध्वज चढ़ाने का सिलसिला शुरू हो गया।
    जलियांवाला बाग में स्मृति दिवस:ध्वज चढ़ाने की रस्म 26 जनवरी, 1930 में जलियांवाला बाग में शुरू की गई और हर साल इसी तिथि के आयोजन की परंपरा बन गई। इस दौरान पंचायती लंगर लगाया जाता था और लोग इसे आजादी के जश्न के रूप में मनाने लगे। इतिहासकार सुरेंद्र कोछड़ का कहना है कि उसी साल जब इसकी खबर ब्रिटिश पुलिस को लगी तो उसने दबिश देकर लंगर का सारा सामान जब्त कर लिया और लंगर भवन पर ताला लगाते हुए आयोजन पर रोक लगा दी। लंगर के इंचार्ज हरगोपाल वस्सन को शांति भंग के आरोप में पुलिस ने हिरासत में ले लिया था। यह परंपरा 1947 तक बाग में जारी रही।
  • अंजुमन इस्लामिया की ललकार : कोछड़ ने ऐतिहासिक तथ्यों के हवाले से बताया कि 26 जनवरी 1930 के ही दिन कटड़ा शेर सिंह स्थित बाजार अराइयां (जहां आज दवाओं की मार्केट है) में अमृतसर अंजुमन इस्लामिया की तरफ से जलसे का आयोजन किया गया था। इसमें मुख्य वक्ता और राष्ट्रीय सद्भावना एवं धार्मिक मामलों में सुधार के समर्थक सर सैयद अहमद ने ध्वज चढ़ाया था।

    इस दौरान उन्होंने जो भाषण दिया था वह अंग्रेजों के लिए चुनौती और हिंदू-मुस्लिम एकता में मजबूती देने वाला था। उन्होंने कहा था--‘कौम से मेरामतलबसिर्फमुसलमानों से नहीं बल्कि हिंदू-मुसलमान दोनों से है। हिंदुओंके अपमान से मुसलमानों का और मुसलमानों के अपमान से हिंदुओं का अपमान है।’। ब्रिटिश हुकूमत की ‘डिवाइड एंड रूल’ पॉलिसी पर ललकारते हुए कहा था--‘इन हालातों में जब तक दोनों भाई (हिंदू-मुस्लिम) एक साथ परवरिश न पा सकें, एक साथ शिक्षा न पा सकें, एक ही प्रकार की उन्नति दोनों को उपलब्ध न हो तो हमारी इज्जत नहीं हो सकती’।

  • रावी दरिया के किनारे लिया था संकल्प: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो 31 दिसंबर को लाहौर में रावी दरिया के किनारे स्थित मिंटो पार्क में कांग्रेस का अधिवेशन हुआ था।
    इतिहासकार एवं भारत-पाक मामलों की विशेषज्ञ अनीता सरीन कहती हैं कि उस मौके पर महात्मा गांधी के अलावा कस्तूरबा गांधी, पं. जवाहर लाल नेहरू और मोहम्मद अली जिन्ना समेत तत्कालीन कांग्रेस के बड़े-बड़े नेताओं ने शिरकत की थी। इस दौरान पार्टी का ध्वज चढ़ाकर उसे सलामी
    देते हुए पूर्ण स्वराज की आवाज बुलंद की थी। वह बताती हैं कि इस आयोजन में हिस्सालेने के लिए अमृतसर से कई प्रमुख गायक मंडलियां गईं थीं और वहां पर देशभक्ति पूर्ण गीत भी पेश किए गए थे।
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Web Title: demand of swaraj was raised in punjab
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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