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PICS: कभी लगती थी जहां महफिलें आज सजता है भूतों का दरबार!

bhaskar.com | Jan 19, 2013, 02:11 IST

  • राजे-रजवाड़ों की धरती है राजस्थान। रंग-बिरंगा राजस्थान। यहां की धरती पहचान रही है राजपूताना आन-बान और शान। जहां एक और उस शान की गवाह इमारतें, हवेलियां और किले आज भी बाहें खोलकर आपका स्वागत करते हैं, वहीं कुछ दूसरी कहांनियां ऐसी भी हैं जो इतनी उजली नहीं। जो अहसास कराती हैं ख़ौफ़ का, सूनेपन का और बर्बादी का।

    राजस्थान के अलवर जिले में एक ऐसा ही किला स्थित हैं भानगढ़ में। यह किला दुनिया के 100 सबसे डरावनी जगहों में शामिल किया गया है। भानगढ़ के किले में रात गुज़ारने के बाद आज तक कोई ज़िंदा नहीं लौटा और गर लौटा भी तो चंद रोज़ ही जिया। भानगढ़ यानी भूतों का गढ़। 500 बरस पुराने इस किले को श्राप है कि यहां रात के अंधेरे में भटकने वालों पर मौत का साया ही मंडराएगा। रात होते ही यहां घुंघरुओं की आवाज़ें आना शुरू हो जाती हैं।

    भारतीय पुरातत्व विभाग ने भी इस किले को बेहद ही अजीब माना है। आगे क्लिक कीजिए और जानिए क्या है रूह कंपा देने वाले इस किले की कहानी और क्यों सरकारी अमले भी यहां आपको न जाने की ही सलाह देते हैं।

  • राजस्थान के अलवर जिले में सरिस्का नेशनल पार्क के एक छोर पर खड़ा है खंडहरनुमा भानगढ़। इस किले को आमेर के राजा भगवंत दास ने 1573 में बनवाया था। भगवंत दास के छोटे बेटे और मुगल शहंशाह अकबर के नवरत्नों में शामिल मानसिंह के भाई माधो सिंह ने बाद में इसे अपनी रिहाइश बना लिया।

    यह किला दुनिया की 100 सबसे डरावनी जगहों में शामिल किया गया है। भानगढ़ के किले में रात गुज़ारने के बाद आज तक कोई ज़िंदा नहीं लौटा और गर लौटा भी तो चंद रोज़ ही जिया। भानगढ़ यानी भूतों का गढ़। 500 बरस पुराने इस किले को श्राप है कि यहां रात के अंधेरे में भटकने वाले के हाथ मौत पर ही पड़ेगें। रात होते ही घुंघरुओं की आवाज़ें आनी शुरू हो जाती हैं।

    भारतीय पुरातत्व विभाग ने भी इस किले को बेहद ही अजीब माना है। आगे क्लिक कीजिए और जानिए क्या है रूह कंपा देने वाले इस किले की कहानी और क्यों सरकारी अमले भी यहां आपको न जाने की ही सलाह देते हैं।

  • भानगढ़ के किले के अंदर घुसते ही दाहिनी ओर कुछ हवेलियों के अवशेष दिखाई देते हैं। सामने बाजार है। कहते हैं ये भानगढ़ का जौहरी बाजार था। इसमें सड़क के दोनों तरफ कतार में बनी दो मंजिला दुकानों के खंडहर हैं। किले के आखिरी छोर पर दोहरे अहाते से घिरा तीन मंजिला महल है। लेकिन तीनों मंजिल लगभग पूरी तरह ढेर हो चुकी है।

  • चहारदीवारी के अंदर कई दूसरी इमारतों के मलवे बिखरे पड़े हैं। इनमें से एक में तवायफें रहा करती थीं और इसे रंडियों के महल के नाम से जाना जाता था। किले के अंदर बने मंदिरों में गोपीनाथ, सोमेश्वर, मंगलादेवी और केशव मंदिर मिल जाएंगे। सोमेश्वर मंदिर के बगल में एक बावली है, जिसे अब भी लोग अपनी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करते हैं।

  • खंडहर बना भानगढ़ एक शानदार अतीत के बर्बादी की दुखद दास्तान है। किले के अंदर की इमारतों में से किसी की भी छत नहीं बची है। लेकिन हैरानी की बात है कि इसके मंदिर पूरी तरह महफूज हैं। इन मंदिरों की दीवारों और खंभों पर की गई नक्काशी इत्तला करती है कि यह समूचा किला कितना खूबसूरत और भव्य रहा होगा!

  • माधो सिंह के बाद उनका बेटा छतर सिंह भानगढ़ का राजा बना। छतरसिंह 1630 में लड़ाई में मारा गया। उसकी मौत के साथ ही भानगढ़ की रौनक घटने लगी। छतर सिंह के बेटे अजब सिंह ने नजदीक में ही अजबगढ़ (अजबगढ़ की कहानी अगले भाग में ) का किला बनवाया और वहीं रहने लगा। आमेर के राजा जयसिंह ने 1720 में भानगढ़ को जबरन अपने साम्राज्य में मिला लिया। इस समूचे इलाके में पानी की कमी तो थी ही। लेकिन 1783 के अकाल में यह किला पूरी तरह उजड़ गया।

  • भानगढ़ के बारे में जो अफवाहें और किस्से हवा में उड़ते हैं, उनके मुताबिक इस इलाके में सिंघिया नाम का एक तांत्रिक रहता था। उसका दिल भानगढ़ की राजकुमारी रत्नावती पर आ गया, जिसकी सुंदरता समूचे राजपुताना में बेजोड़ थी।

    एक दिन तांत्रिक ने राजकुमारी की एक दासी को बाजार में खुशबूदार तेल खरीदते देखा। सिंघिया ने तेल पर टोटका कर दिया ताकि राजकुमारी उसे लगाते ही तांत्रिक की ओर खिंची चली आए। लेकिन शीशी रत्नावती के हाथ से फिसल गई और सारा तेल एक बड़ी चट्टान पर गिर गया। टोटके की वजह से चट्टान को ही तांत्रिक से प्रेम हो गया और वह सिंधिया की ओर लुढ़कने लगा।

  • चट्टान के नीचे कुचल कर मरने से पहले तांत्रिक ने शाप दिया कि मंदिरों को छोड़ कर समूचा किला जमींदोज हो जाएगा और राजकुमारी समेत भानगढ़ के निवासी मारे जाएंगे। आस-पास के गांवों के लोग मानते हैं कि सिंधिया के शाप की वजह से ही किले के अंदर की सभी इमारतें रातों रात ध्वस्त हो गईं।

    यहां रहने वालों को यकीन है कि रत्नावती और भानगढ़ के बाकी निवासियों की रूहें अब भी किले में भटकती हैं। इसके अलावा, रात के वक्त इन खंडहरों में जाने वाला कभी वापस नहीं आता।

  • भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने सूरज ढलने के बाद और उसके उगने से पहले किले के अंदर घुसने पर पाबंदी लगा रखी है। दिन में भी इसके अंदर खामोशी पसरी रहती है। कई सैलानियों का कहना है कि खंडहरों के बीच से गुजरते हुए उन्हें अजीब-सी बेचैनी महसूस हुई। किले के एक छोर पर केवड़े की झाडिय़ां हैं। हवा जब तेज चलती है तो केवड़े की खुशबू चारों तरफ फैल जाती हैं और किले का रहस्य और भी गहरा जाता है।

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Web Title: India's Haunted house Bhangarh fort
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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