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संगम में हो रही है स्वीमिंग पुल की मस्ती, जरा तस्वीरें तो देखिए...

Mahakumbh Team | Feb 15, 2013, 13:31 PM IST

शिव की उपासना करने वाले साधुओं की एक और जमात या अखाड़ा है उदासीन। परंपरा से शिव के उपासक लेकिन अलग पहचान और दर्शन के साथ। सृष्टि के आरंभ से उदासीन परंपरा की शुरुआत मानने वाले इस अखाड़े को जटाजूट, धुनि और ध्वजा बिल्कुल अलग पहचान देते हैं। इस अखाड़े के लोग अपनी एक अनूठी परम्परा के लिए जाने जाते है। उदासीन अखाड़े का अपना अलग दर्शन है और तीन सौ साल से ज्यादा लंबी परंपरा है। यहाँ पर बाबाओं के जटा रखने की परंपरा है। इस की लाल धर्मध्वजा अभयदान का संदेश देती है।
उदासीन अखाड़ों की परंपरा में सबसे अहम है जटा मुकुट की परम्परा। बड़ी मुश्किल से तैयार होती हैं ये जटाएं और इनकी संभाल भी बहुत संभल कर की जाती है। इस अखाड़े में दो तरह की जटाओं की परंपरा हैं। बड़ा उदासीन अखाड़ा के बिंदु जी महाराज का कहना है कि एक होती हैं सिद्ध जटाएं और दूसरी हैं दर्शनी जटाएं। सिद्ध जटाएं तो साधना के दौरान बन जाती हैं लेकिन दर्शनी जटाएं रस्सी की तरह बंटी हुई होती हैं। यानी जटा का मुकुट होता है।
उदासीन परंपरा में जटा मुकुट की अहमियत इस कदर है कि अखाड़े के मुखिया के पद पर पहुंचने के लिए सुंदर जटाओं का मुकुट होना बहुत जरूरी है। बिना सुंदर जटा के आप श्रीमहंत नहीं बन सकते। लंबी जटाओं की परंपरा के पीछे एक दर्शन भी है जो साधना से उत्पन्न हुई ऊर्जा को सही दिशा देता है और नकारात्मक ऊर्जा को सोखने में सहायक है। बड़ा उदासीन अखाड़ा के बिंदु जी महाराज का कहना है की साधना के दौरान हम जटाएं खोल लेते हैं क्योंकि दिमाग में ऊर्जा की गर्मी इकट्ठा हो जाती है। हम पागल ना हो जाएं ऊर्जा को सही चैनल मिले इसके लिए अर्थिंग मिलती है। साथ ही सोलर एनर्जी भी मिलती है।
कहते हैं कि इस अखाड़े में पहले तिलक लगाने की परंपरा नहीं थी। लेकिन बाद में इसे अपनाया गया। साधु कौन से रंग के कपड़े पहने इसे लेकर भी कोई आग्रह नहीं है। पांच रंगों का विकल्प है।
बड़ा उदासीन अखाड़ा के बिंदुजी महाराज सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा ने जब अपने चारों मानसपुत्रों सनक, सनंदन, सनातन औऱ सनत्कुमार की रचना की तो उनसे सृष्टि की शुरुआत यानि वंशपरंपरा को आगे बढ़ाने का आदेश दिया। लेकिन चारों ने इसमें कोई रुचि नहीं दिखाई और साधना में जुट गये। बस, यहीं से उदासीन भक्ति, ज्ञान औऱ विवेक का मार्ग शुरू हुआ यानी उदासीन परंपरा की नींव पड़ी। तब से अब तक नारद, कपिल, हरित जैसे एक सौ आठ ऋषि-मुनि और महर्षियों ने इस परंपरा को आगे बढ़ाया। सदियों बाद जब गुरु नानक देव के पुत्र श्रीचंद महाराज ने इस अखाड़े के संतों महंतों को जमाकर इस परंपरा को समृद्ध कर समाज के काम में लगाया।
जगद्गुरु शंकराचार्य के शैव संन्यासी अखाड़ों की तरह दस नाम परंपरा उदासीन अखाड़ों में भी है। ये अलग बात है कि ये यहां अलग रूप और नाम से प्रचलित है। बिंदुजी महाराज कहते है कि हमारी दशनाम परंपरा सनानत है। ऋषि मुनि दास, आनंद जैसे दस नाम हमारे अखाड़ों में हैं। बाद में शैव अखाड़ों ने गिरि, पुरी, भारती आश्रम तीर्थ जैसे नाम ग्रहण किये।
इसके अलावा जो परंपराएं इस अखाड़े में सबसे जुदा हैं वो हैं चारों श्रीमहंत किसी को शिष्य नहीं बना सकते। दीक्षा नहीं दे सकते। मठों या आश्रम ना तो बना सकते और न ही किसी मठ या आश्रम में स्थायी तौर पर रह भी नहीं सकते। आश्रमों में शिष्य दीक्षित होते हैं ना कि श्रीमहंतों के यहां। तभी इस अखाड़े की गरिमा और महिमा अलग भी है और समरस भी।

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Web Title: fun of swimming pool in Sangam at mahakumbh
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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