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SPL: भाजपा के सबसे 'कड़क' मुख्‍यमंत्री रहे हैं राजनाथ सिंह

Ajayendra Rajan | Jan 23, 2013, 14:16 PM IST

SPL: भाजपा के सबसे 'कड़क' मुख्‍यमंत्री रहे हैं राजनाथ सिंह
लखनऊ. राजनाथ सिंह ने दृढ़ इच्छाशक्ति के साथ निर्णय लेने का परिचय तो 1991 में पहली बार भाजपा सरकार बनने पर ही दे दिया था, जब उन्होंने परिणाम की परवाह किए बगैर प्रदेश में नकल विरोधी अध्यादेश लागू कर दिया था। लेकिन साल मुख्‍यमंत्री बनने के बाद उनके कुछ फैसले आज भी राजनीतिक गलियारों में चर्चा के केंद्र मं रहते हैं। अपने कार्यकाल में उन्‍होंने गठबंधन धर्म से ऊपर उठकर कड़े फैसले लेने के कई उदाहरण पेश किए। यही नहीं मुख्‍यमंत्री बनने से पहले भाजपा की सरकार बचाने में भी अहम भूमिका अदा की। चलिए बताते हैं राजनाथ सिंह के उन फैसलों के बारे में-
कल्‍याण सिंह के नेतृत्‍व में भाजपा और बसपा की गठबंधन सरकार के दौरान जब बसपा ने समर्थन वापस ले लिया तो तीन दिन में बसपा से 20 विधायक टूटे और कांग्रेस से भी करीब इतनी ही संख्‍या में विधायक टूटे और भाजपा की सरकार गिरने से बच गई। इस राजनीतिक उठापटक के दौर में भाजपा की सरकार बचाने में राजनाथ सिंह का ही नाम सामने आया। उन्‍होंने बसपा और कांग्रेस के अधिकतर क्षत्रिय नेताओं को तोड़ा।
इसके बाद 2000 में राजनाथ सिंह प्रदेश के मुख्‍यमंत्री बने तो सरकार को सहयोग दे रहे सहयोगी दलों, विशेषकर लोकतांत्रिक कांग्रेस ने हमेशा दबाव में अपना हित साधा। उसके नेता नरेश अग्रवाल के दबाव व गठबंधन से अलग हटकर सरकार गिरा देने की धमकियों से कल्याण सिंह से लेकर रामप्रकाश गुप्त तक आहत रहे। ऊर्जा विभाग में मनमानी से इस विभाग की हालत दिनों- दिन बिगड़ती गई। उधर सरकार में रहते हुए भी भाजपा की खुली आलोचना से नरेश अग्रवाल बाज नहीं आते थे। लेकिन, न तो कल्याण सिंह और न ही रामप्रकाश गुप्त उन पर हाथ डाल पाए।
मुख्यमंत्रियों को दबाव में लेने की उनकी यही रणनीति राजनाथ सिंह के मुख्यमंत्री बनने के बाद भी जारी रही। उन्हें कई बार समझाया भी गया। किन्तु वे नहीं माने। उन्होंने प्रदेश की विद्युत आपूर्ति में व्यवधान के लिए भी मुख्यमंत्री को दोषी ठहराना प्रारंभ कर दिया, जबकि अनियमितताओं की शिकायतें लगातार मुख्यमंत्री के पास पहुंच रही थीं।
हद तो तब हो गई जब हरिद्वार में नरेश अग्रवाल ने पार्टी सम्मेलन में भाजपा के खिलाफ खुलकर सड़कों पर आने की चेतावनी दे डाली। आखिरकार राजनाथ सिंह ने तत्काल नरेश अग्रवाल को मंत्रिपरिषद् से बर्खास्त करने का फैसला ले लिया। मुख्यमंत्री ने स्वयं ही हरिद्वार में फोन करके नरेश अग्रवाल को बर्खास्तगी की सूचना दी। इस निर्णय का प्रदेश की जनता ने स्वागत किया। जनता को लगा कि मुख्यमंत्री समय पड़ने पर कठोर निर्णय ले सकते हैं।
यही नहीं कानून व्‍यवस्‍था में कड़ाई से अनुपालन का मैसेज देते हुए सीएम राजनाथ सिंह ने अपनी ही सरकार के राज्‍यमंत्री अमरमणि त्रिपाठी को न सिर्फ मंत्री पद छीना, बल्कि उन्‍हें गिरफ्तार भी करवा दिया। दरअसल पूर्वांचल में एक बड़े व्‍यापारी के 16 साल के बेटे राहुल मधेशिया का अपहरण हुआ था। अपहरणकर्ता उसे नेपाल ले जाने की तैयारी में थे, तभी पुलिस ने अमरणि के लखनऊ में कैंट रोड पर स्थित निवास पर रेड की और अपहृत राहुल को छुड़़ा लिया।
पुलिस ने इस संबंध में पांच लोगों को गिरफ्तार भी किया। राज्‍यमंत्री के घर से अपहृत बच्‍चा बनाने की खबर ने भाजपा सरकार को बैकफुट पर ला खड़ा किया। आखिरकार राजनाथ सिंह ने कड़ा निर्णय लेते हुए अमरमणि से मंत्री पद छीन लिया और बाद में इसी मामले में अमरमणि की गिरफ्तारी हुई।
सीएम राजनाथ सिंह ने अपने कार्यकाल में अति पिछड़े वर्ग को आरक्षण में आरक्षण दिए जाने का ऐलान किया। इस ऐलान के विरोध में तत्‍कालीन पर्यटन मंत्री अशोक यादव अदालत चले गए। उनके इस फैसले पर आखिरकार राजनाथ सिंह ने जवाब दिया और उनसे मंत्री पद छीन लिया गया।

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