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अर्थशास्त्री मनमोहन जी काश! खिलजी की इतिहास पढ़ लिए होते

Amit Mukherjee | Feb 16, 2013, 14:29 IST

  • वाराणसी. एक फिर से महंगाई का बम आम जनता पर फूटा है। पेट्रोल और डीजल की कीमतों में केंद्र सरकार ने फिर से वृद्धि कर दी है। लेकिन आपको यह सुनकर ताज्जुब होगा कि 20 अक्टूबर 1296 को दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाला अनपढ़ बादशाह अलाउद्दीन खिलजी ने बाज़ार की बढ़ती कीमतों पर नियंत्रण और महंगाई पर काबू पाकर इतिहास में एक मिशाल कायम किया है।
    बीएचयू इतिहास विभाग के युवा इतिहासकार प्रो. राजीव श्रीवास्तव ने अलाउद्दीन खिलजी के बाज़ार और महंगाई नियंत्रण नीति पर रिसर्च किया है। खिलजी ने गद्दी संभालने के बाद 20 साल तक शासन किया, लेकिन उसके बाद भी 92 सालों तक बाज़ार मूल्य स्थिर रहा।
    स्लाइड के जरिए जानिए क्या खास था खिलजी के फॉर्मूले में....
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  • इतिहास के पन्नों में छुपे महंगाई नियंत्रण के फार्मूले को राजीव अपने रिसर्च के माध्यम से सजोने में लगे हैं। उनके मुताबिक, खिलजी के प्रमुख दो फार्मूले थे। पहला कीमतों का निर्धारण बाज़ार नहीं बादशाह करेगा और कड़ाई से नियमों के पालन के लिये कानून बनाया गया। दलालों और जुआ खेलकर बाज़ार मूल्य बढ़ाने वालों पर कर लगाना। कई जानकर भी मानते हैं कि वायदा कारोबार (फ्यूचर ट्रेडिंग) की चाल पकड़नी होगी तभी महंगाई पर नियंत्रण पाया जा सकता है। उसके समय कुल 28 तरह के कर से वर्ष भर में 30 लाख से ज्यादे का राजस्व इकठ्ठा किया जाता था। आपदा प्रबंधन से निपटने के लिये उसने कई अन्नागार भी बनवाये थे। गद्दी पर बैठने के ठीक एक साल बाद भीषण अकाल पड़ा था, लेकिन उसने मुफ्त में अन्न बंटवाया था। व्यक्तिगत भंडारण बंद कर दिया गया था।

  • राजीव के मुताबिक, अलाउद्दीन के समय में खाद्धान का दाम बढ़ाना, बनावटी कमी दिखाना और जमाखोरी गंभीर अपराध थे। महंगाई नियंत्रण का एक और बेजोड़ कारण था कि उस समय रईसों के संसाधन और आय के ऊपर कर लगाये गये थे। उसकी व्यवस्था से 112 साल तक महंगाई स्थिर रही। हिंदुस्तान में पहली बार ''शहना ए मंडी'' (बाज़ार अधीक्षक) की नियुक्ति की गयी जो उत्पादन का लागत और मंडियों का भाव देखा करता था। बाज़ार कभी किसी वस्तु के मूल्य का निर्धारण नहीं करता था बल्कि शासक करता था।

  • इस काल में ''दीवाने रियासत'' मालिक याकूब (महंगी चीजों को खरीदने का लाइसेंस अधीक्षक) लेना पड़ता था। हीरा और जवाहरात खरीदने पर इजाजत लेनी पड़ती थी। पहली बार गरीब जनता को ही बाज़ार का गुप्तचर बनाया गया ताकि मूल्यों का पता लगाया जा सके। मिलावट या बिना इजाजत भण्डारण करने पर शारीर का मांस काट लेने जैसे कठोर कानून भी लाया गया।

  • उस समय एक जीतल आज के 1/64 रुपये (एक रूपए का 64वां हिस्सा) के बराबर था। खिलजी की ये महंगाई नियंत्रण नीति 112 साल तक काबिज रही। फिरोज शाह तुगलक के गद्दी पर बैठने के बाद भी 1388 तक ये महंगाई नियंत्रण नीति लागू रही। इतिहास की पहली ऐसी बाज़ार मूल्य नियंत्रण निति थी जो सबसे लम्बी चली थी।

  • ट्रेन्डिंग नोटिफिकेशन्स
Web Title: Alauddin Khilji is better than economist Manmohan singh
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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