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क्यों जा सकती है आप के 21 MLAs की मेंबरशिप, क्या है ऑफिस ऑफ प्रॉफिट

dainikbhaskar.com | Jun 16, 2016, 20:02 IST

नई दिल्ली.आम आदमी पार्टी के 21 विधायकों के ऑफिस ऑफ प्रॉफिट से जुड़े विवाद पर दिल्ली सरकार उलझ गई है। प्रेसिडेंट प्रणब मुखर्जी ने विधायकों को पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी बनाने पर मुहर लगाता बिल लौटा दिया है। इसके बाद उनकी असेंबली मेंबरशिप भी खतरे में आ गई है। अरविंद केजरीवाल इस संवैधानिक मुद्दे को मोदी की सरकार की साजिश बता रहे हैं। dainikbhaskar.com आपको कॉन्स्टिट्यूशन एक्सपर्ट सुभाष कश्यप के जरिए यहां बता रहा है कि आखिर यह विवाद क्याें उठा और इसमें आगे क्या होने के आसार हैं...
क्या है मामला?
- पिछले साल 70 सीटों वाली दिल्ली असेंबली के चुनाव में आम आदमी पार्टी 67 एमएलए के साथ जीत कर आई थी।
- 13 मार्च 2015 को अरविंद केजरीवाल सरकार ने अपने 21 विधायकों को पार्लियामेंट सेक्रेटरी अप्वाइंट किया।
- इस अप्वाइंटमेंट को दिल्ली के एक एडवोकेट प्रशांत पटेल ने चुनौती दी।
- उन्होंने पिछले साल 19 जून को पिटीशन फाइल की जिसमें इसे ऑफिस ऑफ प्रॉफिट (लाभ के पद) का मामला बताया।
- पटेल ने इन 21 MLAs की मेंबरशिप कैंसिल करने के लिए पिटीशन फाइल की।
कब बिल लाई थी सरकार?
- प्रशांत की पिटीशन प्रेसिडेंट तक पहुंचने के बाद दिल्ली सरकार 23 जून, 2015 को दिल्ली असेंबली में ऑफिस ऑफ प्रॉफिट एक्ट में अमेंडमेंट से जुड़ा बिल लाई और बिना बहस के उसे पास करा लिया।
- बिल पास करा कर 24 जून 2015 को इसे लेफ्टिनेंट जनरल नजीब जंग के पास भेज दिया गया।
- बिल को कानून मंत्री कपिल मिश्रा ने बिना बहस के पास कर दिया। ऐसा करने के पीछे तर्क दिया कि सरकार के कामकाज को बेहतर ढंग से चलाने के लिए ऐसा किया जा रहा है।
यहां फंसा पेंच?

- एलजी ने इस अमेंडमेंट बिल को प्रेसिडेंट के पास भेज दिया। प्रेसिडेंट ने इलेक्शन कमीशन से राय मांगी।
- इलेक्शन कमीशन ने पिटीशन लगाने वाले एडवोकेट से अपना जवाब रखने को कहा।
- जवाब में प्रशांत पटेल ने सौ पेज का जवाब दिया और बताया कि मेरे पिटीशन फाइल किए जाने के बाद असंवैधानिक तरीके से बिल लाया गया।
- इलेक्शन कमीशन एडवोकेट के जवाब से सेटिस्फाइ हुआ। इसके बाद प्रेसीडेंट ने बिल लौटा दिया।
ऑफिस ऑफ प्रॉफिट क्या होता है?
- कॉन्स्टिट्यूशन के आर्टिकल 102 (1) (ए) के तहत सांसद या विधायक ऐसे किसी और पद पर नहीं हो सकता, जहां अलग से सैलरी, अलाउंस या बाकी फायदे मिलते हों।
- इसके अलावा आर्टिकल 191 (1)(ए) और पब्लिक रिप्रेजेंटेटिव एक्ट के सेक्शन 9 (ए) के तहत भी ऑफिस ऑफ प्रॉफिट में सांसदों-विधायकों को अन्य पद लेने से रोकने का प्रोविजन है।
- संविधान की गरिमा के तहत ‘लाभ के पद’ पर बैठा कोई व्यक्ति उसी वक्त विधायिका का हिस्सा नहीं हो सकता।
21 विधायकों का क्या होगा?
- दिल्ली सरकार ने ऑफिस ऑफ प्रॉफिट मामले में जो अमेंडमेंट बिल पास किया था, उसमें कहा गया था कि 21 एमएलए को पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी अप्वाइंट किए जाने पर इसे लाभ के पद (ऑफिस ऑफ प्रॉफिट) का मामला न माना जाए।
- विधायकों की मेंबरशिप इसलिए रद्द हो सकती है, क्योंकि दिल्ली विधानसभा नेशनल कैपिटल रीजन एक्ट के तहत काम करती है।
- संविधान के साथ NCR एक्ट में यह प्रावधान है कि अगर कोई विधायक ऑफिस ऑफ प्रॉफिट लेता है तो उसकी मेंबरशिप कैंसिल हो जाती है।
- संविधान के आर्टिकल 192 में भी इस बारे में साफ कहा गया है। इसके मुताबिक पार्लियामेंट या असेंबली का कोई भी मेंबर अगर लाभ के किसी भी पद पर होता है उसकी सदस्यता जा सकती है। फिर चाहे यह लाभ का पद केंद्र सरकार का हो या राज्य सरकार का।
- Delhi MLA(Removal of Disqualification) Act, 1997 के मुताबिक, पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी को भी इस लिस्ट से बाहर नहीं रखा गया है।
- मंत्रियों के पद भी ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के पद हैं, लेकिन उन्हें कानून के तहत लाभ के पद से बाहर रखा गया है।
आप MLA ने क्या सुविधाएं ली थीं?
- पिछले महीने इलेक्शन कमीशन ने भी आम आदमी पार्टी के विधायकों को नोटिस जारी कर पूछा था कि आपकी मेंबरशिप क्यों ना कैंसल की जाए?
- जवाब में विधायकों ने कहा कि वे पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी होने के नाते दिल्ली सरकार से सैलरी, अलाउंस या ऐसी कोई दूसरी सुविधा नहीं ले रहे जो ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के दायरे में आए।
- विपक्ष कह रहा है कि इन 21 पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी को स्टाफ, कार, सरकारी ऑफिस, फोन, एसी, इंटरनेट और बाकी फैसिलिटीज दी गई हैं।
- इलेक्शन कमीशन ने जांच के दौरान पाया कि पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी बनाए गए विधायकों को विधानसभा में ही रूम अलॉट किए गए हैं। कुछ ने तो इन रूम को अपना ऑफिशियल एड्रेस भी बताया था।
क्या बच पाएगी MLA की मेंबरशिप ?
- सुप्रीम कोर्ट के फैसले के मुताबिक अगर किसी सांसद या विधायक ने अॉफिस ऑफ प्रॉफिट लिया है तो उसे मेंबरशिप गंवानी होगी। चाहे उसने सैलरी या अलाउंस लिया हो या नहीं।
- चुनाव आयोग ही इस मामले पर आखिरी फैसला लेगा। अगर चुनाव आयोग फैसला लेता है और इन एमएलए की मेंबरशिप खत्म होती है तो इन सीटों पर बाइ इलेक्शन कराया जाएगा। यही एक रास्ता बचता है।
कहां चूक गई केजरीवाल सरकार?
- केजरीवाल सरकार की सबसे बड़ी गलती यह है कि उसने पहले अपने 21 विधायकों को पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी बनाया और उसके बाद कानून में बदलाव की प्रक्रिया शुरू की।
- 'आप' सरकार ने इस मामले में कॉन्सटीट्यूशन राइट्स का वॉयलेशन किया है।
- कानूनी प्रावधानों को जानते हुए आप सरकार अमेंडमेंट बिल लाई और उसे बिना बहस के पास करा कर एलजी को भेज दिया।
गेंद अब किसके पाले में है?
- अब राष्ट्रपति ने बिल लौटा दिया है। इसके बाद इलेक्शन कमीशन के पास इन MLA की मेंबरशिप कैंसिल करने का आखिरी अधिकार है।
- अब आम आदमी पार्टी के पास अदालत जाने का रास्ता बचा है। हालांकि, अगर किसी मामले में चुनाव आयोग और राष्ट्रपति एकमत हों तो अदालत में उन फैसलों का रद्द होना मुश्किल है।
- इस मामले में गेंद अब चुनाव आयोग के पाले में है। राष्ट्रपति ने इस मामले में उससे सलाह मांगी है।
पहले भी संसदीय सचिव बनाए जाते रहे हैं तो ये बिल क्यों अटका?
- क्योंकि ये अप्वाइंटमेंट्स संविधान को एक तरफ रखकर हुए हैं।
- दो तरह के राज्य हैं एक वे जहां पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी को ऑफिस ऑफ प्रॉफिट के दायरे से बाहर रखा गया है तो दूसरे वे राज्य हैं, जहां के कानून के तहत ये पद प्राॅफिट के दायरे में आते हैं।
- दिल्ली में इन्हें लाभ के पद के दायरे में रखा गया है। दिल्ली में सिर्फ सीएम एक संसदीय सचिव रख सकता है, इससे ज्यादा नहीं।
क्या देश में और कहीं हुए हैं ऐसे मामले?
- मई, 2012 में पश्चिम बंगाल में टीएमसी-कांग्रेस सरकार ने भी पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी के अप्वाइंटमेंट को लेकर बिल पास किया था।
- इसके बाद ममता बनर्जी ने 20 से ज्यादा विधायकों को पार्लियामेंट्री सेक्रेटरी अप्वाइंट किया।
- इन सेक्रेटरी को मिनिस्टर का दर्जा मिला था। लेकिन पिछले साल जून में कलकत्ता हाईकोर्ट ने सरकार के बिल को असंवैधानिक ठहरा दिया।
इनपुट : मनोज शर्मा।
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Web Title: why 21 AAP MLAs Appointment as parliamentary secretaries invalid?
(News in Hindi from Dainik Bhaskar)
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