Arun Binjola | Sep 13, 2013, 12:10 PM IST

नई दिल्‍ली.शुक्रवार की दोपहर जब जज ने 'दामिनी' के चार गुनहगारों को सजा-ए-मौतदी तो एक गुनहगार रोने लगा था, कोर्ट रूम के बाहर पुलिसकर्मी भी खुश हो गए और घटना की जांच करने वाले एक अधिकारी ने तो पत्रकार को गले लगा लिया। लेकिन इस मामले में तीन साल की सजा पा चुका नाबालिग दोषी अलग ही धुन में था। वह उत्‍तर दिल्‍ली के विशेष केंद्र में अपने एक प्रशिक्षक के साथ था। साकेत कोर्ट में फैसला आने के करीब आधे घंटे बाद जब एक अफसर नाबालिग कैदी को देखने गया तो उसे टीवी देखते पाया। लेकिन अफसर जैसे ही उसके कमरे में दाखिल हुआ, नाबालिग लड़के ने चैनल बदल दिया और गोविंदा की फिल्‍म देखने लगा।

जानिए, कैसे 35 साल पहले एक ‘दामिनी’ के गुनाहगारों को 30 हजार चिट्टियों ने दिलाई थी ‘सजा-ए-मौत’

16 दिसंबर 2012 की रात हुए गैंगरेप मामले में साकेत की अदालत ने मुकेश (26), पवन (19), विनय (20) और अक्षय (28) को सजा-ए-मौत दी। इस अहम फैसले को सुनाने वाले जज योगेश खन्‍ना ने अपने आदेश को एक नजीर बनाते हुए साफ किया कि जीवन में पहली बार किसी नृशंस अपराध किए का मतलब यह नहीं कि उस पर रहम किया जाए। (जज बोले- दोषियों को फांसी देने से ही मिलेगा 'दामिनी' को इंसाफ)

एएसजे खन्‍ना ने बचाव की इस दलील को खारिज करते हुए कहा है कि कसाब और धनंजय चटर्जी को भी उनके पहले जघन्‍य अपराध के लिए फांसी की सजा दी जा चुकी है। इस मामले में फैसला सुनाते हुए जज ने कहा कि पीड़िता को इंसाफ तभी मिलेगा जब आरोपियों को फांसी की सजा होगी। (‘दामिनी’ तो चाहती थी छह दरिंदों को 'जिंदा जला दो')

फोटो कैप्‍शन: सजा-ए-मौत पाए चार में से तीन आरोपियों की बस्‍ती संत रविदास नगर में शुक्रवार को सुरक्षा के लिहाज से तैनात किए गए पुलिसकर्मी।

आगे पढ़िए किन और दलीलों को जज योगेश खन्‍ना ने किया खारिज

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