उस कुर्सी तक पहुंचने में पहुंच काम न आए
Source: प्रेरणा बी साहनी Designation: पत्रकार और ब्लॉगर
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आपके चेहरे की सिलवटें गहरा रही हैं, पार्टी में जाने का आत्मविश्वास कुम्हला गया है। कुछ ही हफ्तों में कजिन की शादी है, पर वजन घटाए बगैर मेहमानों और रिश्तेदारों के बीच जाना बहुत अटपटा लगेगा। बच्चे को कैलशियम के लिए सिर्फ दूध! कम्पिटीशन का सामना कैसे कर पाएगा? इंटरव्यू में लडख़ड़ाती अंग्रेजी से नौकरी कहां मिलेगी? ममता की कसौटी एक मुट्ठी ब्रांडेड बादाम! फेयरनेस क्रीम लगाने से तकदीर बदल सकती है। आए दिन तमाम विज्ञापन हममें या तो उम्मीद जगाते हैं या फिर नकारे जाने का डर दे जाते हैं। बस कुछ ऐसे ही उम्मीदों के मॉइश्चराइजर, दर्दनिवारक के जादू, गोरेपन की क्रीम के चमत्कार और हेयर कलर के आत्मविश्वास की डोर थामे हम निकल पड़ते हैं अपनी किस्मत बदलने के लिए...।
जरूरी नहीं कि हर चीज की जरूरत हो ही। न जाने कब लालच किसी शौक को जरूरतों में शुमार कर देता है। हां, हमें अहसास है कि जरूरत और शौक के बीच की दहलीज बेहद महीन है। फिर भी हिंदुस्तान जैसी विकासशील अर्थव्यवस्था में अक्सर 'ग्रीड' से 'नीड' का पलड़ा भारी रहता है। तभी तो 'कौन बनेगा करोड़पति' और बिग-बी को इतना याद किया जा रहा है कि उन्हें हिचकियां आ रही हैं। आम आदमी खास बनकर हॉट सीट पर बैठने का सपना देख रहा है। शायद यही वह मौका है जिसकी उसे बरसों से तलाश थी...जहां कोई पहुंच, कोई सिफारिश नहीं चलेगी। ऐसे में अपने ज्ञान को आजमाने का मौका भी भरपूर है। बरसों से भीड़ में छुपे इन नायकों की अब आगे आने की बारी है।
वह ज्ञान ही है जो आपकी उम्मीद बनकर आपको उस शिखर पर पहुंचा सकता है, जिस पर आपके सपने रोज चढ़ाई करते हैं। वहीं पहुंचकर बराबरी का दर्जा मिलता है। यह कर्म ही है जो धर्म, जाति, लिंग, व्यवसाय और आय की तमाम सरहदें पोंछ देता है। काबिलियत की चमक सबको नजर आती है। आप अपने आस-पास या फिर इतिहास की तिजोरी में संभालकर रखे कामयाब लोगों के किस्सों को खंगालें, तो जान जाएंगे कि कामयाबी की दास्तान मेहनत की स्याही से लिखी गई थी। हर खास इंसान कुुछ आम रास्तों से होकर गुजरता है और आम इंसान को भी खास बनने की राह जरूर मिलती है। जब यह राह मेहनत के पथरीले और कंटीले रास्तों से गुजरती है तो किस्मत भी मुस्कराकर हाथ थाम लेती है। हर किसी को ऐसे मौके की तलाश रहती है जो सिर्फ उसकी काबिलियत का आकलन करे, हैसियत का नहीं।
वैसे, चुनौतियों का मुकाबला करना हम हिंदुस्तानियों को बखूबी आता है। चाहे वह रेलवे रिजर्वेशन की लाइन हो, पार्किंग की जगह ढूंढऩे की कवायद, बिलिंग कराना या फिर प्रतियोगी परीक्षा देना- हमारी स्पद्र्धा का दायरा अक्सर व्यापक होता है। यही कारण है कि इम्तिहान देना भी हमारे संस्कारों में शामिल हो गया है। यही वजह है कि हमारे देश का तंत्र तेजी से प्रवेश परीक्षा की प्रणाली को अपना रहा है। देश के नामी संस्थानों में तो 'एंट्रेंस एग्जाम' हंै ही, अगले कुछ सालों में इंजीनियरिंग और मेडिकल के लिए भी सिंगल कॉमन एंट्रेंस एग्जाम हो जाएगा। जरा नजरें उठाकर तो देखें, हर जगह ज्ञान की कसौटियां तैयार हो रही हैं, जिससे काबिलियत को बराबरी का हक मिल सके। तब जाकर कहीं सिफारिशों का दबाव कम होगा। अवसरों की बराबरी 'क्लास' और 'मास' के बीच की खाई पाट देगी। यही उम्मीद हमें हर हार के बाद फौलाद बना देती है, फिर से लडऩे का दोगुना हौसला देती है।
हम जैसे न जाने कितने हिंदुस्तानियों को इंतजार है काबिलियत परखने वाली ऐसी हॉट सीट का, जहां पहुंचने के लिए कोई भी पहुंच काम न आए। उम्मीदों का आसमान हो और सपनों का मुकाबला।