मुश्किल नहीं है गलती मान आगे बढ़ जाना

 
Source: यास्मिन सिद्दीकी     Designation: ब्लॉगर व रिपोर्टर
 
 
 
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http://unified.bhaskar.com/city_blogger_author_images/thumb_image/100075_thumb.jpg मुंबई में एक फैशन शो के दौरान पूर्व मिस यूनिवर्स सुष्मिता सेन ने जैसे ही अपने कदम रैंप पर बढ़ाए, उनका स्टाइलिश डिजाइनर काला गाउन सैंडल में उलझ गया। वह जरा भी नहीं घबराईं। उन्होंने अपनी मां शुभ्रा की मदद ली और फिर पहले जैसी ऊर्जा व पूरे आत्मविश्वास के साथ रैंप पर वॉक किया। शो खत्म होने के बाद उन्होंने कहा कि गलतियां तो हो ही जाती हैं। न जाने कैसे ड्रेस सैंडल में फंस गई। ऐसे वक्त मेरे पास दो ही विकल्प थे : या तो मैं उस दिक्कत की वजह से अपना मूड खराब करके शो भी खराब कर लेती या फिर आगे बढ़ जाती। मैं जब भी रैंप पर चलती हूं तो मुझे मेरे वे दिन याद आते हैं कि किस तरह संघर्ष करके मैं मिस यूनिवर्स बन पाई थी। इस खुशी को अपनी इस छोटी-सी गलती के सामने कैसे गंवा देती! बस, आगे बढ़ गई।

सुष ने बड़ी आसानी के साथ अपनी गलती मान ली और उस पर जीत भी हासिल कर ली। लेकिन गौर करने की बात है हममें से कितने लोग हैं, जो अपनी गलती को स्वीकार कर, उस गलती को अपने ऊपर हावी होने दिए बिना उनकी तरह आगे बढऩा और जीतना सीख लेते हैं। बहुत दूर जाने की जरूरत नहीं, आसपास देखेंगे तो पाएंगे कि अव्वल तो लोग आगे बढ़कर अपनी गलती मानते ही नहीं। अधिकांश लोगों को लगभग सभी मामलों में लगता है कि वेे तो सही हैं, गलती सामने वाले की है। और अगर सामने वाला यह साबित कर दे कि गलती उसकी भी नहीं तो फिर वे मिलकर इसके लिए हालात को जिम्मेदार ठहरा देते हैं। हालात के माथे सारा ठीकरा फोड़ देना बिल्कुल सुरक्षित और सबसे फायदे का सौदा होता है, क्योंकि कोई भी परिस्थिति कभी यह कहने नहीं आने वाली कि गलती उसकी या उसके भाई-बंधुओं की भी नहीं है।

लब्बोलुआब यह कि गलती हो जाने के बाद उसकी जिम्मेदारी से बचने के सौ बहाने हमारे पास हमेशा तैयार रहते हैं। दूसरी तरफ, कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो लाचारगीवश अपनी गलती मान तो लेते हैं, लेकिन साथ ही इतने परेशान और शर्मिंदा भी हो जाते हैं कि ऐसा लगता है जैसे बस, अब उनकी जिंदगी से सारे विकल्प चले गए। अब कुछ भी बचा नहीं। गलती को स्वीकार कर, उससे सबक लेकर, उस पर जीत हासिल करने वाले लोग कम ही मिलते हैं। वास्तव में, गलती के लिए पछताते रहना तो हालात से टूट जाना है। अगर हम गौर करेंगे तो पाएंगे कि गलतियां, भूल-चूक तो हमारी दोस्त की तरह हैं। वे अनजाने में ही सही, हमें कितना कुछ सिखा जाती हैं। फिर वह चाहे मुश्किल हालात से लडऩे की बात हो या हार के बावजूद जीत के लिए खुद को तैयार करने का जज्बा पैदा करना- इस तरह की योग्यता तो सिर्फ गलतियां करके ही मिल सकती है शायद।

स्कूल के दिनों में अपनी गलतियां छुपाना शायद सभी को याद होगा। क्लास में शोर होने पर जब टीचर चश्मे को जरा नीचे करके चिल्लाकर पूछती थीं कि कौन कर रहा है इतना शोर... तो क्लास में चुप्पी एक पल में छा जाती थी, लेकिन कोई भी लड़की उठकर यह नहीं कहती थी कि मिस, मैं अपनी सहेली से बात कर रही थी। मैं आइंदा ऐसा नहीं करूंगी... या फिर आप मुझे सजा दे दीजिए। कोई टूट-फूट होने, झगड़ा होने पर भी कोई आगे बढ़कर नहीं कहता कि हां, यह मेरी गलती से हुआ है। इसकी बजाय सब पलकें झुकाए, नजरें चुराते रहते और कनखियों से देखते रहते।

बहरहाल, ऐसा कल नहीं कर पाए तो क्या हुआ, आज करके देख लीजिए। एक बार गलती स्वीकार कर उस गलती से जीतना सीख लीजिए। फिर देखिए, खुद में कैसा बदलाव महसूस होता है। आप गलतियों से घबराएंगे नहीं, बल्कि उनसे सीखने को तैयार रहेंगे।
 
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