औषधि की जगह आग क्यों बन गया आरक्षण
Source: रुकमा नंद शर्मा Designation: पत्रकार व ब्लॉगर
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गांधीजी के अहिंसक आंदोलन की बदौलत हमारा देश 1947 में अंग्रेजों की लगभग दो सौ साल की दासता से आजाद हुआ था। इसके साथ ही देश को अपना संविधान देने की कवायद भी शुरू हो गई थी। कई देशों के संविधानों को खंगालने के बाद भारत का एक संविधान तैयार किया गया। इसमें दलितों-पिछड़ों को देश की मुख्यधारा में लाने के लिए नौकरियों में आरक्षण की व्यवस्था की गई। उस समय ही इसका काफी विरोध भी हुआ, लेकिन तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए नौकरियों में आरक्षण देने का प्रावधान कर दिया गया और इसकी एक समयसीमा भी निर्धारित कर दी गई।
शुरुआत में इसे दस साल के लिए लागू करने की व्यवस्था दी गई और जरूरी होने पर दस साल आगे बढ़ाने का प्रावधान भी किया गया, लेकिन इसके लिए अधिकतम चालीस साल की समयसीमा तय की गई थी। उस वक्त संविधान निर्माण समिति से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण शख्सियतों ने आगाह किया था कि यदि इस व्यवस्था को लंबे समय तक जारी रखा गया, तो यह देश में जातीय विभेद और विद्वेष का कारण भी बन सकती है।
बहरहाल, वर्तमान परिस्थितियों में आरक्षण एक तरह से अनंतकाल के लिए लागू लगता है। न सिर्फ इसका दायरा बढ़ाने की गंभीर कोशिशें हो रही हैं, बल्कि पदोन्नति में भी आरक्षण देने की पूरी तैयारी हो गई है। आरक्षण के लिए जातीय समूह आंदोलन पर उतारू हैं और राजनीतिक दलों को सीधे तौर पर चुनावों में नतीजे भुगतने की धमकियां दे रहे हैं। ऐसा लगता है कि आरक्षण का प्रावधान राजनीतिक दलों के लिए वोट प्राप्त करने का एक ऐसा जरिया बन गया है, जिसे कोई भी छोडऩा नहीं चाहता। जिसको जैसा मौका मिल रहा है, वह वैसे ही इसे हवा दे अपने राजनीतिक स्वार्थ साध रहा है। हद तो यह हो गई है कि अब केंद्र सरकार पदोन्नतियों में भी आरक्षण देने के लिए संविधान संशोधन पर उतारू हो गई है। उसे पता है कि यदि उसने दो-तिहाई बहुमत से संसद में यह संविधान संशोधन करा लिया, तो उसे २०१४ के लोकसभा चुनावों में राजनीतिक लाभ मिलेगा। लेकिन वह शायद भूल रही है कि उसके इस कदम से देश गंभीर नतीजे भुगतेगा। कई विशेषज्ञों को आशंका है कि एक बार यह व्यवस्था होने के बाद जिन कर्मचारी-अफसरों को आरक्षण के जरिये पदोन्नतियां मिलेंगी, वे कनिष्ठ होकर भी वरिष्ठों पर रौब झाड़ सकते हैं। इस सीढ़ी पर चढ़कर ऐसे लोग भी पदोन्नत हो सकते हैं, जिनके पास पर्याप्त अनुभव नहीं होगा। जरा अनुमान लगाएं, तब उनके निर्णय कैसे होंगे?
आज आरक्षण के सवाल पर पूरा देश दोराहे पर खड़ा है। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि आरक्षण के सहारे कई बार कम योग्यता वाले नौकरियां पा जाते हैं और अच्छी योग्यता वाले वंचित रह जाते हैं। इन हालात में मेधावी युवा पश्चिमी देशों में जाकर सेवाएं दे रहे हैं, जिससे देश को उनकी शिक्षा और कौशल का लाभ नहीं मिल रहा है। काम न मिलने पर हताश युवाओं द्वारा आत्महत्या की खबरें भी आती रहती हैं।
हालांकि ऐसा नहीं है कि आरक्षण से वोटों की रोटियां सेंकने वाले राजनीतिक दलों को इस मुद्दे की गंभीरता का भान नहीं है। ऐसे में क्या उन्हें इस गंभीर विषय पर मंथन नहीं करना चाहिए? उन्हें यह देखना चाहिए कि जिन जातियों को आरक्षण मिला, क्या वाकई उनका भला हुआ है? क्या समाज में असमानता की खाई पट गई? क्या उनके पास इस बात का भी जवाब है कि जिस व्यक्ति ने इसका लाभ ले लिया, उसका परिवार फिर-फिर क्यों नौकरियों में आरक्षण पा रहा है? क्या यह बेहतर नहीं होगा कि जातीय आधार पर आरक्षण की बजाय सभी जातियों के अति पिछड़े परिवारों के बच्चों की नि:शुल्क शिक्षा और भरण-पोषण की व्यवस्था हो? आरक्षण के हिमायतियों को भी इन प्रश्नों पर सोचना चाहिए।