एक शहर के एकांत में
Source: आलोक श्रीवास्तव Designation: दैनिक भास्कर समूह की मैगजीन डिवीजन के संपादक
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कोई किसी शहर में अकेला होता है। कुहरे में छिपी जाड़े की सुबह बताती है कि वह अकेला है, तभी कुहरे में से छनती धूप की कोमल आहट सुनाई पड़ती है। आसपास की छतों से पहले हलचल फिर एक शोर उठता है और पूरा आसमान रंगों से भर जाता है। कितने सारे रंग और कितने सारे आकार पतंग बन कर धूप से और हवा से खेल रहे हैं। आसमान रंग की एक चादर बन गया है... कौन अकेला हो सकता है रंगों से ढके इस आसमान के नीचे?
जब किसी शहर में कोई अकेला होता है तो उसे शहर से शिकायत होती है। बरसों पहले जब मैं बंबई गया तो वहां चार सालों से रह रहे एक मित्र ने कहा कि यह शहर अकेला करता है और तोड़ता है। मैंने बीस साल उस विराट महानगर में गुजारे ... अकेले रहा, पर शहर को कभी दोष नहीं दे पाया, क्योंकि मैंने पाया कि वह शहर खुद अकेला है। उसका अकेलापन मुख्य भारतीय भूमि के अंतिम छोर वसई के खाड़ी-तट पर बने पुर्तगालियों के खंडहर होते विशाल किले के परकोटों और पुर्तगाली सैनिकों की कब्रों से लेकर समंदर के उदास पानी तक फैला है।
एक इतिहास वहां था, जो उसे छोड़ कर चला गया था। जिंदगी की न जाने कितनी शक्लें उसके रास्तों, मकानों, बाजारों से ओझल होती गई थीं। नए लोग आए, जिंदगी ने नई करवट ली, पर तीन सौ सालों में जो कुछ रुखसत हुआ, हमेशा को जो समय में खो गया, उसने उस शहर की आत्मा को अकेला कर दिया, मैं उस शहर के इस विराट अकेलेपन को देखकर स्तब्ध रह गया था... यह सब बेलार्ड पियर के गॉथिक भवनों में, फोर्ट इलाके की ईस्ट इंडिया कंपनी के समय की बिल्डिंगों में, मलाबार हिल के पुराने बंगलों में दिखाई और सुनाई पड़ता था।
अभी परसों जयपुर के आसमान पर रंगीन कागजों का चंदोवा तना था। उमंग और खुशी के गीत फिजा में बिखरे थे। मैं अकेला था। पिछले दो साल में देखी जयपुर की तमाम झलकें आंखों के सामने आने लगीं... अरे, यह शहर भी अकेला और उदास निकला... हम अपनी जिंदगी से शहरों को मापते हैं। पर यह पैमाना सही नहीं है... शहर की अपनी जिंदगी होती है, उसका भी अपना अकेलापन होता है, उसके अपने जिए बरस, दिन और माह होते हैं... उसके अपने गुजरे कारवां और उड़ती गुबारें होती हैं। यह जयपुर शहर तो अपने अकेलेपन के पार से देखता होगा -- पिछले दस वर्षों में ही शहर की हर दिशा में खड़ी हो गई बहुमंजिला इमारतें, शहर के छोरों को मिलाने के लिए तेजी से बनती मेट्रो... नए मॉडल की कारें, स्कूटियां.... और अपने छूट गए तीन सौ बरसों का एकांत लिए जयपुर लौट जाता होगा अपने किलों, महलों, बारादरियों के पुकारते निर्जन में.... शहर में हम कभी अकेले नहीं होते...
दरअसल तमाम पुराने शहर अकेले हैं और वे हैरत और उदासी से हमें निहारते हैं... कितना छोटा है -- इतिहास में अकेले में छूट गए शहरों में भटकता हमारा निजी अकेलापन....