Navneet Gurjar
Designation :- पत्रकार व ब्लॉगर
Expertise :- पेशे से पत्रकार लेकिन जितना खूबसूरत लिखते हैं, उससे कहीं सुन्दर तबला बजाते हैं, संवेदनाओं को शब्दों में पिरोना उनकी खासियत है
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पीपल के पत्तों से देवताओं की तरह उतरी नज्म
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आइए! वहां चलते हैं जहां पेड़ पर बैठी कविताएं-नज्में हवा चलते ही हमारी गोद में आने को बेताब हैं। जी! लिटरेचर फेस्टिवल के मुगल टैंट में।
मंच अभी सूना है। (जैसे सुबह के पहले...
बस्ते जितनी बस्ती है और बटुए जैसे मंदिर
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शहर में एक गांव बसा है। नया-नया। गांव क्या, बस्ती कहिए। लिटरेचर बस्ती। बस्ते जितनी बस्ती। उसमें बटुए जितने मंदिर। साहित्य के, किताबों के, नज्मों-कविताओं और कहानियों के...
नानी की कहानी ही कहानियों की नानी
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सोफों या सोफों जैसी कुर्सियों पर गुलजार थे, जावेद अख्तर थे। प्रसून जोशी और विशाल भारद्वाज भी थे। ..और कहानियां मंच पर खेल रही थीं। सेशन का नाम था- कहानी किसको कहते हैं? फ्रंट...
गोलियां, बंदूकें चलाने से पहले, यह खत पढ़ लीजिए
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जब कोई आक्रांता दूर देश की धरती पर कदम रखता है तो सबसे पहले वहां की पुस्तकों की अलमारियां कांपती हैं। ..और जब कभी कोई लेखक उस धरती पर आता है तो सबसे पहले वहां की लाइब्रेरी...
पूरो की नसों के दूध को लजा रहे हैं हम
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कहानी दर्दनाक है। विभाजन के वक्त की। गांवों में लकीरें खिंच गई थीं। एक तरफ हिन्दू। दूसरी तरफ मुसलमान। छतों पर पत्थर, बारूद और हथियार जमा थे। जैसे डंगर खुद ही फांक-फांक...
कब मरेगा- गलत परंपराओं का भ्रूण?
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कोलकाता में हुगली के गंदे किनारे कुछ बूचड़ बैठे रहते हैं। पानी से कुछ दूरी पर वे एक विशालकाय कछुआ पाले रहते हैं। कछुआ रेंग-रेंग कर घुटने-घुटने पानी तक ही जा सकता है।...
बेटी हमारी है, बीच में आने वाली सरकार कौन?
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टुकड़ों की राजनीति शायद हर कोई जानता है। आजादी के तुरंत बाद समाजवादियों को कांग्रेस में या कांग्रेस के विरुद्ध पैर रखने तक की जगह नहीं थी। इसलिए कि कांग्रेस बहुत पहले ही...
कांई थारो कर्यो रे कसूर
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सही है सरकारें आर्थिक मदद के अलावा कर क्या सकती हैं। वे जो परंपराएं हैं, जो बेटी वालों से दुश्मन-सा व्यवहार करती हैं। वो जो झूठी शान है जो बेटियों के पिता को झुकने पर मजबूर...
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