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आपस की बात

मेरी हालत कुछ वैसी ही है जिसे बहादुर शाह ज़फ़र ने कोई डेढ़ सौ साल पहले बयान किया था - ‘बात करनी मुझे मुश्किल कभी ऐसी तो...

कितनी अजीब बात है न कि ऐसी तमाम बातों में मेरा कोई भरोसा तो नहीं है लेकिन फिर भी ऐसी हर कहानी सुनने में मुझे मज़ा...

‘..मेरी दोस्ती, मेरा प्यार’

कथा लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल भाग तीन, शुरू करेला हूं। मतलब वही कि शुरू करता हूं। तो सबसे पहले एलपी के सबसे पहले...

‘हर नई किरन के साथ, मंगल संदेश लाया’

अल्लामा इक़बाल का एक शेर है - ‘मेरी सुराही-से क़तरा-क़तरा नए हवादिस टपक रहे हैं। मैं अपनी तस्बीहे-रोज़ो-शब का...
 

‘जिंदगी का सफर, है ये कैसा सफर’

वक्त भी बड़े कमाल की चीज़ है। ख़ुद तो गुज़रता ही रहता है और जो-जो उसके साथ होते हैं वो भी बेचारे गुजरते चले जाते हैं।...

चलो दिलदार चलो चांद के पार चलो

सिर काज़मी साहब का एक शेर है : तू जो इतना उदास है ‘नासिर’ तुझे क्या हो गया, बता तो सही उदास तो आज मैं भी हूं। सच...
 

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  • March 11, 12:59
     
    सूथी मेरी ज़िंदगी, आंखों ने जो बहा दिया/ रोती है मुझपे बेकसी, हसरतों ने मिटा दिया’। अमीर बाई कर्नाटकी की आवाज़ में इस गीत को सुनकर आप समझ सकते हैं कि इंसान किस हद तक अपने दर्द को आवाज़ और आवाज़ को दर्द में तब्दील कर सकता है। आज जिस घड़ी एक बार फिर ग़ुलाम मोहम्मद की पिछली बार अधूरी छूटी दास्तान पूरी करने की ग़रज़ से बैठा तो शुरुआत उनके बनाए हुए नग़मों को सुनने से की। अमीर बाई और मोहम्मद रफ़ी का...
     

  • February 27, 05:14
     
    सर्दी जाने को है और गर्मी आने को है। ऐसे में फ्रिज, वॉटर कूलर और बोतलबंद पानी के इस दौर में मटके को याद करना सवाब का काम होगा। हम जैसे ‘पिछड़े हुए’ लोग तो ख़ैर आज भी मटके के पानी से अपनी मोहब्बतें बरक़रार रखे हुए हैं। हां, इतना ज़रूर है कि अब जो रस्ते चलते ह्रश्वयास लगती है तो ढेर सारे मटकों से सजे हुए ‘ह्रश्वयाऊ’ को नज़रें अब भी ढूंढती हैं और अक्सर हार जाती हैं। ऐसे मौक़ों पर अक्सर किसी...
     

  • February 21, 04:13
     
    पता है आज की बात का रंग क्या होगा? हा हा। आज की बात एक नहीं, दो नहीं, दस नहीं, बस नहीं, पूरे सौ रंगों की होगी। मÊाक़ नहीं, जिस साÊा की बात आज हम लोग करेंगे उसे बुलाने के लिए तो बुलाते हैं सारंगी, लेकिन जानने वाले जानते हैं कि शब्द सारंगी की उत्पत्ति ही ‘सौ रंगी’ के जोड़ से ही हुई है। आम तौर पर सारंगी का नाम आते ही सोग में डूबी, माहौल को उदास बनाने वाली एक आवाज का ख़याल आता है। याद है न देश में...
     

  • January 31, 03:26
     
    नामुकम्मल दुनिया में कोई बात मुकम्मल साबित नहीं होती। ख़ुद इंसान इतना नामुकम्मल है कि उससे किसी कामिल कारनामे की उमीद करना ही बेकार है। हर बार इस ख़ुशफ़हमी के साथ बात शुरू करता हूं कि आज सब कुछ बता दूंगा। बात ख़त्म होते-होते अपनी नाकामी का अहसास होना शुरू हो जाता है और अंदर से ‘ठेंगा-ठेंगा’ की आवाज़ें आने लगती हैं। अच्छा है। एक तरह से ये अच्छा भी है। इंसान अपनी औक़ात नहीं भूलता और ज़रा...
     

  • January 23, 01:01
     
    आज एक बार फिर से संगीतकार सी रामचंद्र की बात शुरू करने से पहले एक शख्स का ज़िक्र। इस शख्स का नाम है नंदकिशोर। मेरे मित्र हैं और कानपुर में रहते हैं। संगीत की अद्भुत दीवानगी है। इसी दीवानगी में न सिर्फ पूरे हिंदुस्तान में घूमते रहते हैं, बल्कि पाकिस्तान और इंग्लिस्तान तक भी चले जाते हैं। कोई धनी आदमी नहीं हैं, लेकिन जुनून के लिए पैसे की क्या ज़रूरत? सो जगह-जगह से दुर्लभ संगीत, दुर्लभ...
     

  • January 3, 10:04
     
    नया साल मुबारक हो। दुआ है आपकी हर मुराद पूरी हो। यह साल सबके लिए इतनी $खुशियां लेकर आए कि अब तक गुकारे हुए 2011 साल हैरान रह जाएं कि आखिर हमारे टेम पे सब लोग इतने खुश क्यों नहीं थे। कहिए - आमीन। तो हुकारु, पुरनूर, आला हकारत, आपका ये खादिम भी इसी दुआ के अमल में आज कोई ‘एसी-वेसी’ दिलजली बात नहीं करेगा, और बात की चाहे जो करेगा। तो सबसे पहले तो ऐसा करेगा कि अपनी एक ऐसी बात बताएगा जो पहले किसी और...
     

  • December 27, 01:36
     
    जयपुर में अदम जी मंच संचालन कर रहे थे। यह जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय अधिवेशन में संयोजित कवि गोष्ठी थी। मुझे कविता पढ़ने बुलाने के पहले एक किस्सा सुनाया। किसी नगर में एक बड़े ज्ञानी महात्मा थे। उनका एक शिष्य था, नाम था उसका लौकी नाथ। एक दिन लौकी नाथ मठ छोड़ कर भाग गया। ज्ञानी गुरु ने खोज की लेकिन लौकी नाथ का कुछ पता न चला। सालों के बाद उसी नगर में एक नए संन्यासी आत्मानंद पधारे।...
     

  • November 6, 03:25
     
    देर से न जाने क्यों यक़ीन था कि ‘सुबह ज़रूर आएगी।’ इसी यक़ीन के साथ वह हर रात जाग-जागकर सुबह का इंतज़ार करता रहता था। कई बार तो ऐसा भी होता कि जागकर थक चुकी आंखों को रात में भी सुबह दिखाई देने लगती। नींद से भारी आंखें ख़ुशी में बहते आंसुओं से भीगकर पल भर को बंद हो जातीं।अगले पल जब आंख खुलती तो मालूम होता कि वह तो महज़ चार आंसू भर जितनी सुबह थी। ऐसे ही बरसों-बरस उम्मीद का दामन थामेथामे, उसने...
     

  • October 17, 05:38
     
    ज़ाओं में लगातार एक आवाज़ गूंज रही है। ‘अब यादों के कांटे इस दिल में चुभते हैं/ न दर्द ठहरता है, ना आंसू रुकते हैं/ तुम्हें ढूंढ रहा है ह्रश्वयार, हम कैसे करें इक़रार, कि हां तुम चले गए।’ यहां गले में अटकी सिसकी और बर्फ़ हो चुकी सर्द आह की आवाज़ भी सुनी जानी चाहिए। आवाज़ फिर गूंजती है। ‘इक आह भरी होगी/ हमने न सुनी होगी/ जाते-जाते तुमने, आवाज़ तो दी होगी/ हर व़क्त यही है ग़म/ उस व़त कहां थे हम? कहां...
     
 
 
 
 
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