

अर्ज़े-नियाज़े-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा
मरने की ए दिल और ही तदबीर कर के मैं...
हमने कब उनसे मुलाकात का वादा चाहा
दूर रहकर उन्हें और भी ज्यादा चाहा
याद आए हैं मुझे और भी शिद्दत से वो
भूल जाने का...
देख तो दिल कि जां से उठता है
ये धुआं सा कहां से उठता है
गोर किस दिल-जले की है ये फ़लक
शोला इक सुबह यां से उठता है
सुध...
तमन्ना दिल की एक हसरत है
पूरी हो जाए तो इंसान ख़ुशक़िस्मत है
न पूरी हो तो गम न करना
अधूरा रहना ही तमन्नाओं की फ़ितरत...
मैं अपनी वफाओं की यूं मिसाल देता हूं
कोई भी सवाल करे तो टाल देता हूं
मुझे अक्सर उन्हीं लोगों से मिला है फरेब
जिनके पांव का कांटा मैं निकाल देता हूं।
विशाल जैन, धुवारा (मप्र)
हैरान रातों को राहत नहीं है
मुझे फिर भी उनसे शिकायत नहीं है
मैं हक अपना जताऊं तो कैसे
वो चाहत है मेरी विरासत नहीं है।
अखिल कुशमारिया, जबलपुर (मप्र)
आजमाती है जिंदगी उसी को
जो कठिन रास्तों पर चलना जानता है...
उल्फ़त की ज़ंजीर से डर लगता है
ख़ुद अपनी तक़दीर से डर लगता है
जो जुदा करते हैं किसी को किसी से
हाथ की उस लकीर से डर लगता है।
नरेंद्र कुमार तायवाड़े, राजनांदगांव (छग.)
आंखों में रहने वालों को याद नहीं करते
दिल में रहने वालों की बात नहीं करते
हमारी तो रूह में बस गए हैं वो
तभी तो हम मिलने की फरियाद नहीं करते।
मनोहर जैन, सीहोर (मप्र)
कौन दिल को सुकून देता है
जो भी मिलता है दग़ा देता है
उठता है...
स्मृति के संचित कोषों में महक रही फुलवारी
तुम आओ ना आओ, आएगी याद तुम्हारी
दूर-दूर तक ख़ुशबू फैली, लगे यहां पर मेले
सिमट रहा जग सारा, हम तनहा रहे अकेले।
कृष्णमुरारी चतुर्वेदी, बूंदी (राज)
ऐ ज़िंदगी बेशक कोई तेरे बाद नहीं
अब तो तेरा चेहरा भी मुझे याद नहीं
दिल को गर हुई कभी महसूस कमी तेरी
समझा लूंगा उसे ये बस्ती आबाद नहीं।
अमर मलंग, कटनी (मप्र)
सांझ अपने कटोरे में हर रोज़ ये सूरज...
ख्वाब सच हो तो मंजिल भी मिल जाती है
याद भी अक्सर तस्वीर में बदल जाती है
कुछ मांगो तो पूरे सच्चे दिल से मांगो
एक दुआ से अक्सर तकदीर बदल जाती है।
डॉ सुरेंद्र मीणा, नागदा (मप्र)
मेरी हंसी का हिसाब कौन करेगा?
मेरी गलती को माफ कौन करेगा?
ऐ खुदा मेरे दोस्त को सलामत रखना
मेरी शादी में बर्तन साफ कौन करेगा?
प्रमजीत, हनुमानगढ़ (राज)
जिंदगी फिर लौटकर अपने घर को आएगी
हौसले बुलंद हों तो मंजिल...
नजरें झुकाकर आप तो शरमाने लगे हैं
शायद ख्वाब अक्सर रातों में आने लगे हैं
उड़ते हैं चांद को पाने की चाहत में
अभी तो बस चांदनी में नहाने लगे हैं।
कृष्णमुरारी चतुर्वेदी देई, बूंदी (राज)
हुस्न खुशबू गुलाब उम्र हुई
फिर भी कितनी अजाब उम्र हुई
उनकी नजरों ने जबसे दिल को छुआ
सांस मीना शराब उम्र हुई।
उमाश्री, होशंगाबाद (मप्र)
तड़पे बहुत पर वो मान नहीं पाए
इस दिल की मोहब्बत वो जान नहीं...