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आदाब अर्ज

दरिया की हवा तेज़ थी, कश्ती थी पुरानी रोका तो बहुत दिल ने मगर एक न मानी मैं भीगती आंखों से उसे कैसे हटाऊं मुश्किल है...

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं तुझे ए ज़िंदगी, हम दूर से पहचान लेते हैं। मेरी नजरें भी ऐसे काफि़रों की...

आपकी महफ़िल

अर्ज़े-नियाज़े-इश्क़ के क़ाबिल नहीं रहा जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा मरने की ए दिल और ही तदबीर कर के मैं...

ज़िंदगी में अपनों का साथ न छूटे..

हमने कब उनसे मुलाकात का वादा चाहा दूर रहकर उन्हें और भी ज्यादा चाहा याद आए हैं मुझे और भी शिद्दत से वो भूल जाने का...
 

आपकी महफ़िल

देख तो दिल कि जां से उठता है ये धुआं सा कहां से उठता है गोर किस दिल-जले की है ये फ़लक शोला इक सुबह यां से उठता है सुध...

अपने साये भी अब हुए पराये..

तमन्ना दिल की एक हसरत है पूरी हो जाए तो इंसान ख़ुशक़िस्मत है न पूरी हो तो गम न करना अधूरा रहना ही तमन्नाओं की फ़ितरत...
 

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  • February 21, 04:01
     
    मैं अपनी वफाओं की यूं मिसाल देता हूं कोई भी सवाल करे तो टाल देता हूं मुझे अक्सर उन्हीं लोगों से मिला है फरेब जिनके पांव का कांटा मैं निकाल देता हूं। विशाल जैन, धुवारा (मप्र) हैरान रातों को राहत नहीं है मुझे फिर भी उनसे शिकायत नहीं है मैं हक अपना जताऊं तो कैसे वो चाहत है मेरी विरासत नहीं है। अखिल कुशमारिया, जबलपुर (मप्र) आजमाती है जिंदगी उसी को जो कठिन रास्तों पर चलना जानता है...
     

  • February 13, 02:58
     
    उल्फ़त की ज़ंजीर से डर लगता है ख़ुद अपनी तक़दीर से डर लगता है जो जुदा करते हैं किसी को किसी से हाथ की उस लकीर से डर लगता है। नरेंद्र कुमार तायवाड़े, राजनांदगांव (छग.) आंखों में रहने वालों को याद नहीं करते दिल में रहने वालों की बात नहीं करते हमारी तो रूह में बस गए हैं वो तभी तो हम मिलने की फरियाद नहीं करते। मनोहर जैन, सीहोर (मप्र) कौन दिल को सुकून देता है जो भी मिलता है दग़ा देता है उठता है...
     

  • February 6, 11:47
     
    स्मृति के संचित कोषों में महक रही फुलवारी तुम आओ ना आओ, आएगी याद तुम्हारी दूर-दूर तक ख़ुशबू फैली, लगे यहां पर मेले सिमट रहा जग सारा, हम तनहा रहे अकेले। कृष्णमुरारी चतुर्वेदी, बूंदी (राज) ऐ ज़िंदगी बेशक कोई तेरे बाद नहीं अब तो तेरा चेहरा भी मुझे याद नहीं दिल को गर हुई कभी महसूस कमी तेरी समझा लूंगा उसे ये बस्ती आबाद नहीं। अमर मलंग, कटनी (मप्र) सांझ अपने कटोरे में हर रोज़ ये सूरज...
     

  • January 30, 05:07
     
    ख्वाब सच हो तो मंजिल भी मिल जाती है याद भी अक्सर तस्वीर में बदल जाती है कुछ मांगो तो पूरे सच्चे दिल से मांगो एक दुआ से अक्सर तकदीर बदल जाती है। डॉ सुरेंद्र मीणा, नागदा (मप्र) मेरी हंसी का हिसाब कौन करेगा? मेरी गलती को माफ कौन करेगा? ऐ खुदा मेरे दोस्त को सलामत रखना मेरी शादी में बर्तन साफ कौन करेगा? प्रमजीत, हनुमानगढ़ (राज) जिंदगी फिर लौटकर अपने घर को आएगी हौसले बुलंद हों तो मंजिल...
     

  • January 21, 01:51
     
    नजरें झुकाकर आप तो शरमाने लगे हैं शायद ख्वाब अक्सर रातों में आने लगे हैं उड़ते हैं चांद को पाने की चाहत में अभी तो बस चांदनी में नहाने लगे हैं। कृष्णमुरारी चतुर्वेदी देई, बूंदी (राज) हुस्न खुशबू गुलाब उम्र हुई फिर भी कितनी अजाब उम्र हुई उनकी नजरों ने जबसे दिल को छुआ सांस मीना शराब उम्र हुई। उमाश्री, होशंगाबाद (मप्र) तड़पे बहुत पर वो मान नहीं पाए इस दिल की मोहब्बत वो जान नहीं...
     

  • December 27, 01:31
     
    फूलों से हसीं मुस्कान हो आपकी चांद सितारों से ज्यादा शान हो आपकी जिंदगी का सिर्फ एक मकसद हो आपका कि आसमां से ऊंची उड़ान हो आपकी। अर्पिता कुमारी, रांची (झारखंड) सदा साथ रहे ऐसी जिंदगी चाहते हैं उनसे जो मिला दे वो बंदगी चाहते हैं है यकीन उस रब पे मिलाएगा वो जरूर मिल के न बिछड़ें कभी ताजिंदगी चाहते हैं। अमर मलंग, कटन (मप्र) वक्तके पन्ने पलटकर फिर वो हसीं लम्हे जीने को दिल चाहता है...
     

  • November 6, 01:28
     
    जिगर और दिल को बचाना भी है नज़र आप ही से मिलाना भी है मोहब्बत का हर भेद पाना भी है मगर अपना दामन बचाना भी है ख़िरद की इताअत ज़रूरी सही यही तो जुनूं का ज़माना भी है मुझे आज साहिल पे रोने भी दो कि तूफ़ान में मुस्कराना भी है ज़माने से आगे तो बढ़िए ‘मजाज़’ ज़माने को आगे बढ़ाना भी है
     

  • September 22, 12:09
     
    काग़ज़ की कश्ती थी पानी का किनारा था खेलने की मस्ती थी दिल ये आवारा था कहां आ गए इस समझदारी के बादल में वो नादान बचपन ही कितना प्यारा था। यश लखेरा, मण्डला (मप्र.) तुम्हारी पसंद मेरी चाहत बन जाए मुस्कराहट दिल की राहत बन जाए ख़ुदा ख़ुशियों से इतना तुम्हें नवाज़ दे तुमको ख़ुश देखना मेरी आदत बन जाए। मनोज बिश्नोलिया, झुंझुनूं (राज.) अश्कों को मोती बना देती है दोस्ती ज़ख्मों पे मरहम लगा...
     

  • September 14, 04:42
     
    बैठे-बैठे गम में गिरफ्तार हो गए किसी के प्यार में आबाद हो गए। दो गज जमीन मिल ही गई मुझ गरीब को मरने के बाद हम भी जमींदार हो गए। निकुंज आशर, सिवनी (मप्र) कहने को आपका शहर मेरा भी शहर है, इस शहर के भीतर का बियाबान देखिए। मिल जाए गर फुर्सत किसी को कुछ पलों की इस भीड़ में तन्हा-सा इक भगवान देखिए। पंकज सारस्वत, हनुमानगढ़ (राज) ये काली घटाएं छट जाएंगी और मोहक बदलियां बरस जाएंगी गर प्रिय...
     
 
 
 
 
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