

तमाम संवैधानिक अधिकारों के बावजूद आज भी आम आदमी हाशिये पर है। उसे मुख्यधारा में लाने की जरूरत है। आज कैसे...
जमाना गया जब कारें तेल पीती और धुआं उगलती भारी-भरकम मशीनें हुआ करती थीं। आज नई टेक्नोलॉजी ने कारों की शक्ल बदल दी...
मार्क टली
ब्रिटिश मूल के भारतवासी लेखक और पत्रकार
गजब x मेरे लिए इस साल की एक अच्छी याद है भारत का क्रिकेट विश्व...
बिहार के छोटे-से शहर मोतिहारी के सुशील कुमार 11 वर्षो से लगातार ‘कौन बनेगा करोड़पति’ देखते थे। उनके घर पर टेलीविजन...
कोलकाता के सोनागाछी की बच्चियां अपने हक की बात ‘कमलगंधा’ नामक थिएटर समूह के जरिए कह रही हैं। असम में उल्फा के आतंक वाले इलाके टेंगला में पबित्र राभा नाटे कद के कलाकारों के साथ थिएटर कर रहे हैं। दिल्ली में गुरु सलाउद्दीन पाशा ने सैकड़ों विकलांग बच्चों को नृत्य और थिएटर से जोड़कर उनके भीतर जीने की नई उमंग और आशा भर दी है। आगरा में अनिल शुला झुग्गी-झोपड़ी के बच्चों के साथ नुक्कड़...
प्राचीन संस्कृतियों में कुछ साझा मान्यताएं हैं। सबकी जातीय स्मृतियों में कुछ मूल अवधारणाएं मिलती-जुलती हैं। उनमें एक अवधारणा यह कि सृष्टि ‘माइंड’ और ‘मैटर’, ‘यिन’ और ‘यांग’, ‘शक्ति ’ और ‘शिव’ का आवेगमय नर्तन है।
यूनान, रोम और भारत की मिथकीय चेतना, उसका जातीय अवचेतन अधिक कल्पनाशील है। इस कल्पना की आधारभूमि से जो तरह-तरह के बिम्ब फूटे, उनमें ही एक बिम्ब है शक्ति का। शक्ति जो...
सफल बदलाव की चार प्रेरक कहानियां..।
डॉ पुश्किन
हिमालय में ग्रीन इकोनॉमी का मॉडल खड़ा किया
क्या?:
पुश्किन फत्र्याल हिमालय में प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण की रक्षा करते हुए पहाड़ी ग्रामीणों के लिए आजीविका के साधन विकसित करने में जुटे हैं। वह ग्रीन इकोनॉमी या पर्यावरण के अनुकूल अर्थव्यवस्था बना रहे हैं।
विचार यह है कि पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए बगैर पहाड़ों पर रहने...
पिछले महीने देश में जो उभार और आंदोलन देखा गया, उसमें एक बात ने कई लोगों को चिंतित कर दिया और वह थी राजनीतिज्ञों के प्रति घृणा की भावना। मंचों से दिए गए कुछ भाषणों में उनके लिए जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया, वही भावना आंदोलनकारियों की भीड़ में कुछ नारों और प्लेकार्ड में दिखाई दी। क्या यह आंदोलन के प्रवाह में गुस्से की तात्कालिक और क्षणिक अभिव्यक्ति थी? या हम, खासकर भारतीय मध्यवर्ग...
क्या केवल वोट देना ही लोकतंत्र है?
न्ना आंदोलन को जिस तरह संसद की संप्रभुता के मुकाबले खड़ा करने की कोशिश की गई, उसने लोकतंत्र को लेकर नए सवालों को जन्म दिया है। इसे नई लोकतांत्रिक चेतना का उदय भी कहा जा सकता है। क्या लोकतंत्र में नागरिकों की भूमिका क्या पांच सालों में एक बार चुनाव में वोट डालने के बाद खत्म हो जाती है? क्या दो चुनावों के बीच की अवधि में अपनी और अपने राष्ट्र की नियति...
दो छवियां देशवासियों को काफी दिनों तक नहीं भूलेंगी। 15 अगस्त की शाम को दिल्ली में महात्मा गांधी के समाधि स्थल राजघाट पर ध्यान की मुद्रा में चुपचाप अकेले बैठे अन्ना हजारे। पृष्ठभूमि में हरी घास का मैदान। हरेक मिनट बीतने के साथ चारों तरफ आहिस्ता-आहिस्ता बढ़ती लोगों की भीड़।
जिसे जब पता चला वह जहां कहीं था राजघाट की ओर दौड़ पड़ा। अगली सुबह अन्ना अपनी योजना के मुताबिक आमरण अनशन पर...
क्या भारत माता महज एक मिथ हैं? फिर ऐसा क्यों है कि ‘भारत माता की जय’ का नारा गूंजते ही करोड़ों भारतवासी जोश से भर उठते हैं? भारत माता आज किन झंझावातों से गुजर रही हैं? उन्हें मजबूत और खुशहाल बनाने के लिए क्या करना जरूरी है? 65वें स्वतंत्रता दिवस पर विशेष..।
अंग्रेजी के चश्मे से दुनिया को देखने वालों के लिए ‘मदर इंडिया’ एक मिथक है। भारत के करोड़ों जनसाधारण के लिए भारत माता मिथ नहीं,...
पाकिस्तान की विदेश मंत्री हिना रब्बानी खर को शिकायत है कि हाल में उनकी भारत यात्रा के दौरान भारतीय मीडिया ने उनकी खूबसूरती और फैशनेबुल परिधानों पर ज्यादा गौर किया। ‘अगर मेरी जगह कोई पुरुष विदेश मंत्री होता तो क्या वे उसके पर्स और कपड़ों पर इतना ध्यान देते?,’ उन्होंने अपने मुल्क लौटकर कहा।
दूसरी ओर, हमारे यहां कुछ लोगों को शिकायत है कि हिना रब्बानी ने अपनी उम्र, चेहरे, फैशनपरस्ती...
आप हमारे किसी भी छोटे या बड़े शहर में जाएं, सभी जगह आपको सार्वजनिक अव्यवस्था या अराजकता की एक-सी तस्वीर दिखाई देगी। सड़कों पर नियम तोड़कर मनचाहे तरीके से बेतरतीब चलते वाहन। फुटपाथ पर जगह-जगह दुकानें। सड़कों पर फैला कचरा और कई जगह कचरे का ढेर। सड़कों पर गड्ढ़े और गड्ढों में भरा पानी। अधबनी इमारतें और उनके सामने आधी सड़क को घेरकर बिखरी रेत या ईंटों का ढेर। आपका सामना बहुत सारी चीजों...