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कवर स्टोरी

मंटो (11 मई 1912 - 18 जनवरी 1955) उर्दू के मशहूर अफसानानिगार थे। उनकी कहानियां आज भी समाज का आईना हैं। छोटे-से जीवनकाल में...

बहनों में रानी बड़ी होने के अनुरूप ही अधिक गंभीर और शांत थी। सुंदर बहुत ही मीठे स्वभाव की, स्नेही और संतोषी लड़की...

फेसबुक पर बड़े होते बच्चे

दो-एक साल पहले की बात है। तब मेरी बेटी करीब 10 साल की रही होगी। अचानक एक दिन उसके स्कूल से फोन आया। स्कूल ने आनन-फानन...

हौसले को सलाम!

देश के सर्वाधिक जुझारू क्रिकेटरों की गिनती की जाए तो युवराज सिंह बेशक उनमें सबसे आगे-की पंक्ति में होंगे।...
 

मोबाइल संदेशों से तनाव भी दूर

मोबाइल से भेजे जाने वाले संदेशों यानी टेक्स्ट मैसेज को अक्सर युवाओं में एक लत के तौर पर देखा जाता है। कई बार तो...

थोड़ा बदलाव अपार खुशिया

अरसे से हम यह सुनते आए हैं कि हमारी खुशियों की चाबी हमारे पास ही होती है लेकिन हममें से ज्यादातर लोग खुशियों की उस...
 

और खबरें

 
 
 

  • March 19, 08:18
     
    किवदंती है कि नंद वंश के राजा से नाराज चाणक्य ऐसे शख्स की खोज में थे जो नंद राजा का नाश कर सके। पाटलीपुत्र की गलियों में उन्हें एक सात-आठ साल का बालक खेलता मिला। नाम था चंद्रगुप्त। एक बड़ी सिंहासननुमा कुर्सी पर वह राजा की तरह बैठा था और भ्रष्ट व अन्यायपूर्ण आचरणों के बारे में ऊंची आवाज में नसीहतें दे रहा था। उसके चेहरे पर तेज और आवाज में बुद्धिमता व ईमानदारी देखकर चाणक्य को समझते...
     

  • March 11, 12:12
     
    महीने लाखों बल्कि शायद करोड़ों भारतीय परिवारों के सिर पर परीक्षाओं का भूत सवार होगा। खुद मेरा परिवार भी ऐसे परिवारों में शरीक है। इम्तहान में अच्छे से अच्छे नंबर लाने की भारी-भरकम उम्मीदें बच्चों के गले में गिलोटिन की तरह बंधी हैं। उनकी कामयाबी के लिए पूरे के पूरे परिवार उनके पीछे बदहवासी की हालत में हाथ बांधकर खड़े हैं। मेमोरी पिल्स आलमारियों से निकल आई हैं। कोचिंग क्लासेस...
     

  • March 5, 02:45
     
    हंसी के बोल हमारी वाचिक परंपरा में हाजिर जवाबी और नोकझोंक हमारे देश में प्राचीन काल से ही हास्य और मनोविनोद की बहुत स्वस्थ और समृद्ध परंपराएं रही हैं। इंटरनेट और एसएमएस जोक्स के इस जमाने में जब स्टैंड अप कॉमेडी नए शो और नए रूपों में लोकप्रिय हो रही है, यह याद करना उचित होगा कि हमारे संस्कृत नाटकों में प्रहसन बड़े आकर्षण का केंद्र हुआ करते थे। लेकिन तब के विदूषक नए उभरते कॉमेडियन...
     

  • February 27, 04:07
     
    देश राजनीति के कठिन मोड़ पर खड़ा है। हमारी राजनीतिक व्यवस्था की गहराई में झांकें तो आप पाएंगे कि यह कितना गंभीर और संकट भरा मोड़ है। अगर हम दिन-रात सिर उठाती समस्याओं को सही ढंग से हल नहीं करते तो हमारी राष्ट्रीय एकता की प्रक्रिया ही खतरे में पड़ सकती है। वह प्रक्रिया जो हमारे महान देश की लोकतांत्रिक विरासत है। आज हालत यह है कि देश के 170 जिलों में (कुल 560 में से) शासन चलाना दूभर हो गया...
     

  • February 21, 03:16
     
    अखिलेश चंद्र मिश्रा को आज भी याद है कि बचपन में उनके गांव के घर में उनके दादा-दादी द्वारा किस तरह ख्याल रखा जाता था। घर में और कोई खाए या न खाए, उन्हें उनके समय से खाना दे दिया जाता। घर में बच्चे-बच्चे को पता था कि उन्हें क्या पसंद है और क्या नहीं पसंद है। उनकी पसंद की चीजें नियमपूर्वक थोड़े-थोड़े समय के अंतराल से या तो घर में बनाई जातीं या बाजार से लाई जातीं। दादी को पूजाघर में छुआछूत...
     

  • February 13, 05:49
     
    शायद ही कोई लड़की होगी जिसे हमारे शहरों में किसी न किसी रूप में शोहदों की छींटाकशी या छेड़छाड़ का शिकार न होना पड़ता हो। लड़कियां अपने-अपने ढंग से इसका प्रतिरोध करती हैं या अनदेखा कर देती हैं। लेकिन मुंबई में सेंट ऐंड्रूज कॉलेज में पढ़ रही अनिष्का अल्वारेज ने अपने प्रतिरोध को व्यापक रूप देने का अभिनव तरीका निकाला। 19 बरस की अनिष्का ने इसी कॉलेज में पढ़ रही पांच सहेलियों केसाथ...
     

  • February 6, 09:56
     
    क्या आप अपने नन्हे बच्चों को अपने हाथ से खाना खिलाते हैं? क्या आप उन्हें उनकी खुराक या जरूरत से ज्यादा खाना खिला देते हैं? क्या आपके छोटे बच्चे आपके साथ एक ही पलंग पर सोते हैं? क्या उनके पास खेलने के लिए अच्छे (सुटेबल) खिलौने हैं? क्या आपके पास रबर का बना बाथटब है और उसी में आप अपने बच्चों को नहलाते हैं? क्या आप अपने गोद के बच्चे को डायपर पहनाते हैं और क्या डायपर बदलने की मेज आपके पास है?...
     

  • January 30, 03:34
     
    2008 की गर्मियों में भारत के बेहतरीन बॉक्सिंग कोच और द्रोणाचार्य पुरस्कार से समानित ओमप्रकाश भारद्वाज के फोन की घंटी बजी। फोन भारतीय खेल प्राधिकरण से आया था। उन्हें बताया गया कि 10 जनपथ से कोई उनसे संपर्क करेगा। कुछ समय बाद नेहरू-गांधी परिवार के निजी स्टाफ में दो दशकों से ज्यादा समय से कार्यरत पी माधवन ने उन्हें फोन किया और एक असामान्य-सी गुजारिश की : राहुल गांधी बॉक्सिंग सीखना...
     

  • January 23, 10:36
     
    तमाम संवैधानिक अधिकारों के बावजूद आज भी आम आदमी हाशिये पर है। उसे मुख्यधारा में लाने की जरूरत है। आज कैसे जनप्रतिनिधि निर्वाचित हो रहे हैं, सब देख रहे हैं। एक बार चुने जाने के बाद वे मनमानी करने के लिए आजाद होते हैं। हम एक बार वोट डालते हैं और कुछ लोग पांच साल के लिए आ जाते हैं। इनके चुनाव में भी जाति, धर्म, पैसे आदि का बड़ा योगदान होता है। इसलिए जरूरी है कि कानून के निर्माण में जनता की...
     
 
 
 
 
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