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कहानी

गाड़ी आने में अभी आध घंटा था। मालती को अपने आप पर क्रोध आने लगा। फिर वह समय से इतना पहले स्टेशन पर पहुंच गई थी। जब उसे...

स्टेला को हेनरी एक निहायत मामूली शख्सियत वाला लड़का लगता था। नाकाबिले-गौर और रूखा..। और हेनरी मानो उस पर फ़िदा था।...

महानगर का फ्लैट

ऊंची इमारतों व सड़कों पर जगमगाती लाइटों की शोभा निराली थी। नागर सक्यता अपनी पराकाष्ठा पर थी। राजपती ने अधलेटी...

अफसोस

बह की महक मेरे आसपास तितली की तरह उड़ने लगी और रोज की तरह मेरी पलकों पर आकर बैठ गई। भांति-भांति के वेश धरती है वो...
 

‘ये सब की बात है,दो-चार-दस की बात नहीं’

श भर में लोकपाल की लहर चल रही हो तब मैं नीरो की तरह अपनी बांसुरी बजाने का गुनहगार नहीं होना चाहता। सो आज की बात उसी...

सुनो मांडव..

और यहां से रूपमती रोज नर्मदा को देखती थी। उसके बाद ही वो अन्न जल लेती थी।’ समीर ने दूर इशारा करते हुए बताया।...
 

और खबरें

 
 
 

  • October 8, 12:11
     
    मैं शांत हो गया। हम दूर शाम की आरती होती देख रहे थे। दर्जन भर पंडित। हाथों में जलती मशालों के आकार की विशाल आरतियां। सभी के हाथ एक साथ, एक गति और एक लय में उठते और नीचे आते हुए। पृष्ठभूमि में मंत्रों का उच्चर। चारों तरफ हजारों सैलानियों से घिरे। बनारस के घाटों की आरती जितनी भी बार देखें, हर बार मन मोह लेती है। मेरे नजदीक बैठी इस आरती की तरह। वो काले वाले दिखाइए,’ आरती ने दुकानदार से...
     

  • September 22, 12:10
     
    शाम गहराती हुई पहाड़ों पर उतर रही थी। ठंडक और अंधेरा एक-दूसरे से होड़ कर रहे थे। उसने खेलते हुए बच्चों के बीच से मैत्रेयी को बुलाया और चल पड़ा। आज उसे मैत्रेयी की बातें सुनने से ज्यादा अतीत याद करना अच्छा लग रहा था। खूब सारे दोस्त और शालिनी। वही शालिनी जिस पर पूरे मोहल्ले के लड़के जान देते थे और वह किसी पर जान देती थी तो सिर्फ उसे। चलते-चलते वह हांफने लगा तो एक पत्थर पर बैठ गया।...
     

  • September 14, 04:27
     
    लड़की आज भी उसी प्रकार खिड़की में नज़र आ रही है। दोनों तरफ खड़े गुलमोहर के पेड़ों के ठीक बीच बनी हुई वह खिड़की दूर से देखने पर किसी चित्र की तरह नज़र आती है। उस मकान के जितने दूर से होकर वह रोज़ गुजरता है उतनी दूर से किसी की चीज़ के बारे में केवल अनुमान ही लगाया जा सकता है, ठीक-ठाक रूप से कुछ कहा नहीं जा सकता। उस मकान का एक पाश्र्व उस ओर से दिखाई देता है जिस तरफ से वह निकलता है। कंटीले...
     

  • August 29, 12:04
     
    घबराहट के मारे प्रिंसिपल साहब के माथे पर पसीना चुहचुहा आया था। रिसेप्शनिस्ट प्रश्नवाचक चिह्न चेहरे पर चिपकाए सामने खड़ी थी, ‘सर क्या जवाब दूं उनको? वे बड़े उग्र हो रहे हैं।’ कोई और समय होता तो वे सामने पड़ी फाइल दे मारते उस पर मगर अभी तो इस भवसागर से उन्हें पार लगाने वाली वह ही थी। उसकी मधुर वाणी ही उन्हें पालकों के कोप से बचा सकती थी। आवाज संयत करके वे बोले, ‘मिस आनंद, आप उनसे कहिए...
     

  • August 21, 01:25
     
    देखिए जी, कोर्ट में आज मेरी पेशी है। जज विरोधियों के साथ मिला हुआ है। उसे तो बहाना चाहिए मुझे बेदखल करने का। जमानती मुक़दमा है, सही व़क्त पर न पहुंचा तो इकतरफ़ा फ़ैसला सुना देगा। मेरा घर हाथ से निकल जाएगा। पूरा परिवार सड़क पर आ जाएगा। जमानत देने वाले पर आफ़त की बिजली गिरेगी सो अलग। प्लीज आप ही बताएं मैं क्या करूं?’ उसकी बात सुन कर बीड़ी फूंक रहे ट्रक ड्राइवर ने उसकी तरफ़ पीठ कर ली, जैसे...
     

  • August 7, 11:27
     
    वह जून की उबलती हुई गर्मी का दिन था। मनीष तेजी से घर की ओर लौट रहा था। गर्माते आसमान में भी उसे हवा की खुनक, चिड़ियों का संगीत और फूलों की महक का अहसास हो रहा था। घर पहुंचने की उत्कंठा से उसमें ऊर्जा का इतना आवेग लग रहा था जैसे आसमान को छू लेगा। वह बहुत खुश था। इस अपार खुशी की वजह यह थी कि इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिले के लिए दी गई परीक्षा में वह अच्छे अंकों से सफल हुआ था। अब उसे इसी शहर...
     

  • July 31, 12:09
     
    कुछ चीजें कभी पुरानी नहीं पड़तीं। वे एक के बाद एक कालखंडों में अपनी प्रासंगिकता कायम रखकर कालजयी और शास्त्रीय होने का दर्जा हासिल कर लेती हैं। ऐसी ही हैं मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं। वे आज भी इतनी मौजूं हैं कि हर आयु, वर्ग, परिवेश के लोग अपने को उनके साथ जोड़ सकते हैं, उनसे सीख ले सकते हैं। हिंदी की अलग-अलग पीढ़ी के कथाकार यहां बता रहे हैं कि प्रेमचंद की कौन-सी कहानी उन्हें सबसे प्रिय है...
     

  • July 12, 11:51
     
    कार्निवल के मैदान में बिजली जगमगा रही थी। हंसी और विनोद का कलनाद गूंज रहा था। मैं खड़ा था। उस छोटे फुहारे के पास जहां एक लडक़ा चुपचाप शराब पीनेवालों को देख रहा था। उसके गले में फटे कुरते के ऊपर से मोटी-सी सूत की रस्सी पड़ी थी और जेब में कुछ ताश के पत्ते थे। उसके मुंह पर गंभीर विषाद के साथ धैर्य की रेखा थी। मैं उसकी ओर न जाने क्यों आकर्षित हुआ। उसके अभाव में भी संपूर्णता थी। मैंने पूछा...
     

  • July 3, 12:10
     
    रात उसने बहुत गंभीरता से कल सुबह दफ्तर जाने की बात सोची थी। दो दिन और अधिक हो गए थे। उसने सात दिन की छुट्टी ली थी क्योंकि इतने ही दिनों की छुट्टी उसे वेतन के साथ मिल सकती थी। लेकिन दो दिन और अधिक हो गए थे और कल नहीं जाने से तीसरे दिन की शुरुआत हो जाएगी। दिसंबर के आखिर के दिन थे और काफी ठंडक। रात ढाई बजे के करीब उसकी नींद टूट गई थी और बहुत देर तक लेटे हुए वह यही सोचता रहा था कि क्या करे।...
     
 
 
 
 
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