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कविता

चीटियों को देखकर मां की याद आती है मुझे वो भी ऐसे ही उतार लेती थी कढ़ाई में जमी रह गई सब्जी की परत रूखी रोटी से सबको...

तुमने पूछा था क्या बचपन से तुम इसी तरह रोती रही हो! और सोचने लगी मैं उस समय के बारे में जब हम बिना रोए हुआ करते थे...

ओ! धरती

एक त्रिकुटी को कुतरता है कीड़ा हथेलिओं से रेंगता हुआ धीरे-धीरे चढ़ आया है ऊपर शिराओं में छोड़ता हुआ विष चेहरे...

चांद

चांद पे भी जो गंदी नाली एक पिछड़ी-सी बस्ती होती कुछ सूखे-से खेत होते जानें रोटी से सस्ती होतीं कुछ नंगे मजदूर भी...
 

किस्सागो

एक बार ऐसा हुआ कहकर एक बार जब वह रुका तो ऐसा हुआ कि उसे कुछ भी याद नहीं आया अभी इतने किस्से थे बताने को कि गुÊार...

आपकी महफ़िल

गम का ख़ज़ाना तेरा भी है मेरा भी ये नज़राना तेरा भी है मेरा भी अपने ग़म को गीत बनाकर गा लेना राग पुराना तेरा भी है मेरा...
 

और खबरें

 
 
 

  • March 5, 04:19
     
    ज़िंदगी को ज़र-ब-कफ़, ज़रफ़ाम करना सीखते कौन था वो किससे हम आराम करना सीखते व़क्त ने मोहलत न दी वरना हमें मुश्किल न था सिरफिरी शामों को नज्रे-जाम करना सीखते सीख लेते काश हम भी कोई कारे-सूद-मंद शेर-गोई छोड़ देते, काम करना सीखते ख़ुद-ब-ख़ुद तय हो गए शामो-सहर अच्छा था मैं सुबह करना सीख लेते, शाम करना सीखते क़द्र है जब शोरो-ग़ोग़ा की तो हज़रत आप भी गीत क्यों गाते रहे, कोहराम करना सीखते
     

  • February 29, 01:26
     
    चुप रहते रहते एक दिन, फूटेंगे बोल। एक दिन नदी की बांक पर ठिठक मुड़ कर खड़े खड़े हांक लगाकर कहूंगी बस अब और नहीं। सूर्य अस्ताचल की ओर जाए या कि सिरहाने चलता रहे, मैं कहूंगी अब और नहीं। तब पेड़ पौधों, घास पातों में सिहरती हवा बहने लगेगी, सारी कड़वाहट, सारा रूखापन, पारे की मानिंद भारी हो लुढ़क जाएगा। रेत, पत्थर और कंकड़ों के साथ मिलकर, बहुत गहराई में तलछट बन जमा रहेगा। ऊपर खेलता रहेगा...
     

  • February 13, 02:40
     
    मेरे भीतर स्त्री का होना मेरे भीतर स्त्री का होना है मेरा स्त्री होना नहीं मैं स्त्री होना चाहता हूं मैं सदा के लिए अपने पुरुष होने की तरफ कभी न लौटने के लिए स्त्री होना चाहता हूं मैं बस स्त्री होकर देखने के लिए स्त्री नहीं होना चाहता मैं हमेशा के लिए स्त्री की देह दिमाग दिल और दुनिया होना चाहता हूं मैं कितनी भी बात कर लूं स्त्रियों की कितना भी चौंका हूं उन्हें उनकी कहकर दिखा दूं...
     

  • February 6, 11:26
     
    कानों में गूंजते हैं स्वह्रिश्वनल शब्द, मोहक तान बहुत कोशिश करती हूं दोहराने की वही सुर-ताल, वही गीत कि मेरी नन्ही गुड़िया भी जिसे सुनकर मधुर सपनों में खो जाए.. मैं मूंदती हूं आंखें साधती हूं शब्द आत्मसम्मान की खोज में उठते कदमताल के साथ तस्वीर सी उभरती है - फ़ायदे-नुकसान का बजट दिन भर के ताने और थकन। गुज़रती है लोरी घिसी एड़ियों के दर्द से जि़मेदारियों के...
     

  • January 30, 04:13
     
    तुम्हारे आने पर अब नहीं संवारती बाल, शीशा नहीं देखती.. नहीं लगाती करीने से चाय की ट्रे कुछ और तो लो, जिद भी नहीं करती उड़ेलती हुई दिन भर की बीती.. बिंदास देती हूं गालियां और मजे में कह जाती हूं उठा लाओ तो जरा दूर रखी मेरी चह्रश्वपलें फर्श बहुत ठंडा है.. भूल ही जाती हूं वह पहली तारीख जिसमें हम मिले थे तुम्हारे प्रेम में हूं.. ये कुछ सबूत मुझको मिले हैं.. बह गई हैं खारे पानियों में तन-मन...
     

  • January 23, 11:37
     
    सोजे-ग़म देके मुझे उस ने ये इरशाद किया जा तुझे कशमकशे-दहर से आज़ाद किया वो करें भी तो किन अल्फ़ाज़ में तेरा शिकवा जिन को तेरी निगाहे-लुत्फ़ ने बरबाद किया दिल की चोटों ने कभी चैन से रहने न दिया जब चली सर्द हवा मैंने तुझे याद किया इसका रोना नहीं क्यों तुमने किया दिल बरबाद इसका ग़म है कि बहुत देर में बरबाद किया इतना मासूम हूं फि़तरत से, कली जब चटकी झुक के मैंने कहा, मुझसे कुछ...
     

  • January 21, 12:11
     
    हमने एक-दूसरे में देखे तमाम विरोधाभास एक साथ नहीं चल सके। हमारे मूल्य एक हैं मेयार हैं अलग अलग-अलग है हमारी राह हमारा जोड़ा नहीं बन सका। हम एक दूसरे से करते हैं प्रेम। जिसे कहते हैं प्रेम किसी और से नहीं कर सकते कभी। अब भी मन ही मन एक-दूसरे से कहते हैं हम - आई लव यू वेरी मच। एक दूसरे के बिना नहीं जी रहे हैं हम। तुम आओ, मेरी चांद मेरी चांद.. बहुत सारे शहर तुम्हे याद करने की यादों से...
     

  • December 27, 01:30
     
    अपने जीवन में सादगी रखना आदमियत की शान भी रखना डस न ले आस्तीं के सांप कहीं इन से महफ़ूज़ ज़िंदगी रखना हों खुले दिल तो कुछ नहीं मुश्किल दुश्मनों से भी दोस्ती रखना मुस्तक़िल रखना मंज़िले-मक़सूद अपनी मंज़िल न आरज़ी रखना ए सुख़नवर नए ़ख्यालों की अपने शेरों में ताज़गी रखना अपनी नज़रों के सामने ‘शेरी’ ‘मीरो-ग़ालिब’ की शाइरी रखना
     

  • November 16, 04:45
     
    बस में बीच की सीट चुनता जबकि खिड़की से आती हवा कौन नहीं जानता फूल अच्छे होते हैं की तरह नींद आती तो नींद में कुर्बान करता मैं दस बीस जन्नत कि एक मांगता बच्चा कुछ मुझसे और देने को मेरे पास हिरण भी नहीं, ना खिलौना उसकी एक तस्वीर बस पास आते हुए की तस्वीर में तुम दीवार पर स्थिर मैं अकेला, तोड़ता घर वे मुझे लेने आते लेकर सांकलें मैं कहना चाहता कि रोटियां पेड़ पर उगती हैं लाशें Êारूर चलती...
     
 
 
 
 
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