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अपनी अलग पहचान भी वह तब ही बना पाएगी, जब उस अलग पहचान पर विश्वास हो, मान हो..
यदि स्त्री हौसला जुटा ले, तो उसके आत्मसम्मान पर प्रहार करना किसी को भी बहुत महंगा पड़ सकता है..आखिर स्त्री के लिए उसका मान करोड़ो से ज्यादा कीमती है..
एक बात कहूं, नीना जी, ‘पुरस्कार का सृजन से कोई सरोकार नहीं होता है।’यह तो समीकरणों और आपसी सहमति की शीरणी भर है।
घर में जिस जगह पर सबसे ज्यादा गंदगी हो हम पहले उसी स्थान की सफाई करते हैं फिर यही दृष्टि समाज के लिए क्यों नहीं?
परिश्रम से बड़ा कोई साथी नहीं और इच्छाशक्ति से बड़ा कोई मार्गदर्शक नहीं, इस मूलमंत्र को अपनाने वाले..दूसरों के लिए अनुकरणीय उदाहरण बन जाते हैं.. |