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Ganesh Utsav Ganesh Utsav गणॆश पूजन को लेकर कई पौराणिक मान्यताएं रहीं हैं, जिनका अनुसरण करते हुए लोग व्यक्तिगत स्तरों पर गणोश चतुर्थी मनाते थे। लेकिन समय की मांग ने इसे एक लोक महोत्सव का रूप दे दिया। लोक महोत्सव में सामूहिक भागीदारी के कारण सामाजिक समरसता को काफी बल मिला। इससे राजनीति को भी रोशनी मिली। गणॆश चतुर्थी को एक लोक उत्सव के रूप में मनाने से जुड़े तमाम पहलुओं पर भास्कर डॉट कॉम ने बात की दिनेश थिते से।
दिनेश थिते ने गणपति पूजा और इनके मंडलों को बचपन से काफी करीब से देखा और बाद में उन्होंने गणपति मंडल पर शोधकार्य किया।
सबसे पहले तो गणॆश चतुर्थी और इसके लोक महोत्सव के बारे में हमारे पाठकों को बताएं?
देखिए गणोश चतुर्थी व्यक्तिगत रूप से न मनाकर सामूहिक रूप से मनाते हैं। किसी भी लोकमहोत्सव में मुहल्ले या आसपास में रहने वाले लोग सक्रिय होते हैं। इससे धीरे धीरे सोशल फॉर्मेशन होता है और समूह भी बड़ा होता जाता है। लोग सामूहिक रूप से गणोश चतुर्थी मनाने के लिए गणोश मंडल बनाते हैं। यह मंडल केवल गणॆश चतुर्थी तक ही सीमित नहीं रहता बल्कि अनेक सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों का भी केंद्र हो जाता है।
गणॆश चतुर्थी की खास विशेषता क्या हैं?
गणॆश चतुर्थी की खास विशेषता है कि इसे मनाने वाले मंडलों की शुरुआत तो गणॆश जी की मूर्तिस्थापना और पूजन से होती है लेकिन धीरे धीरे यह महोत्सव सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक हो जाता है।
राजनीतिक कहने का अर्थ क्या है?
गणॆश मंडल राजनीतिक कैसे बन जाता है?देखिए जैसा कि मैने पहले भी कहा कि गणॆश मंडल में शामिल लोग केवल गणॆश चतुर्थी तक ही इकट्रठे होकर काम नहीं करते। इसके बाद भी कई कामों में मंडल के लोग आगे बढ़कर हाथ बंटाते हैं। इलाके में अगर कोई भी हादसा हो तो सबसे पहले गणपति मंडल के कार्यकर्ता आगे आते हैं। मैंने अपने शोध के क्रम में 145 गणपति मंडलों का सर्वे किया है। मैंने पाया कि मंडल के लोग 84 तरह की एक्टिविटी में शामिल रहते हैं। चाहे खुशी का मौका हो या दुख का, गणपति मंडल के लोगों की भागीदारी अहम होती है। इससे इनका दायरा बढता जाता है और ये सामाजिक रूप से काफी मजबूत हो जाते हैं। यह सोशल पावर ही राजनीति में भी काम आता है। महाराष्ट्र के कई बड़े नेता गणपति मंडलों से उभरे हैं।
गणॆश चतुर्थी के लोक महोत्सव बनने के कारण क्या रहे?
सबसे पहले इसे लोक महोत्सव के रूप में 1893 में मनाया गया था। गणॆश चतुर्थी मनाने और गणॆश मंडलों की स्थापना का श्रेय लोममान्य तिलक को है। 1893 में पुणो में एक मीटिंग हुई, जिसमें इसे लोक उत्सव के रूप में मनाने का फैसला लिया गया। इसके पीछे तीन प्रमुख कारण रहे।
1. अंग्रेजों के खिलाफ इकट्ठा होने का यह एक बेहतर मंच साबित हो सकता था।
2. 1857 के विद्रोह के बाद अंग्रेजों ने यह तय किया था कि हिंदुस्तान में यदि पांव जमाए रहना है, तो यहां के लोगों के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप न करना ही बेहतर होगा। इस फैसले से भी ऐसे आयोजनों को बल मिला।
3. 1893 में ही मुंबई में बहुत बड़ा दंगा हुआ था। मुसलमानों और अन्य समुदाय के लोगों को भी इस आयोजन से जोड़ने के लिए इसे लोक उत्सव का रूप दिया गया।
गणॆश चतुर्थी पर हमारे धार्मिक ग्रंथों में काफी कुछ लिखा गया है क्या पिछले कुछ वषों में गणॆश चतुर्थी पर कुछ लिखा गया है?
गणॆश चतुर्थी के बारे में श्री गणॆश कोश ग्रंथ में काफी कुछ लिखा गया है। अमरेंद्र गाडगिल इसके संपादक हैं और यह किताब मराठी में लिखी गई है। दूसरी किताब अंग्रेजी में है जो पॉल कोट्राइट ने लिखी। ऑक्सफोर्ड प्रेस से छपी इस किताब में कुछ कमेंट्स के कारण विवाद पैदा हो गया था। एक और किताब रामिंदर कौर रने लिखी है जो लंदन की रहने वाली हैं। लेकिन गणॆश चतुर्थी और इसके लोक महोत्सव पर शोध करने को काफी कुछ बाकी है।
समय के साथ इस महोत्सव में क्या परिवर्तन देखने में आया है?
गणपति मंडल में 15 से लेकर 40 साल तक के लोग होते हैं। धीरे धीरे पुराने लोगों की जगह नए लोग ले लेते हैं। नए लोग नई सोच और नए परिवेश के हिसाब से त्योहार में तब्दीलियां लाने की कोशिश करते हैं। हालांकि त्योहार की मूल भावना वही रहती है, केवल वाह्य आवरण ही बदलता रहा है।
पूरे महाराष्ट्र में इस महोत्सव पर कितना खर्च होता है और कितने गणपति मंडल सक्रिय हैं?
पूरे महाराष्ट्र में 40 हजार गणपति मंडल हैं जिनका टर्न ओवर 200 करोड़ रुपए का है। हर मंडल अपना सालाना हिसाब देता है। हालांकि इसमें हर खर्चे का जिक्र नहीं होता है। कई लोग श्रद्धा और उत्साह से अपनी जेब से भी खर्च करते हैं जिसे मंडल के हिसाब में नहीं जोड़ते हैं।
गणॆश महोत्सव पर और कौन से ऐसे विषय हैं, जिन पर शोध हो सकते है?
इस विषय पर सामाजिक विज्ञान के हिसाब से शोध किया जा सकता है। गणपति उत्सव पर डेकोरेशन के लिए बड़े बड़े होर्डिंग लगाए जाते हैं। इन पर विभिन्न कंपनियों के विज्ञापन भी होते हैं। इन सब पर मार्केटिंग के क्षेत्र में एक रिसर्च हो सकता है। गणपति उत्सव में सभी समुदाय के लोग एकजुट होकर काम करते हैं। यहां पर जाति और धर्म का भेद नहीं रह जाता।