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जनता के भगवान हैं गणेश: उपेंद्र

गणेश शब्द लोकतंत्र का बोध कराता है। गण यानी जन-जन से जुड़ा हुआ। गणेश भगवान जनता के भगवान हैं, इसलिए यह उत्सव सामूहिक भावना का प्रतिनिधित्व करता है। लोकजीवन में गणेश की यह भूमिका काफी महत्वपूर्ण है। इन्हें सिद्धि विनायक कहा गया क्योंकि इनकी साधना करने से शीघ्र सिद्धि की प्राप्ति होती है। गणेश भगवान ने सबसे पहले परिक्रमा करके अग्रपूज्य पाया था। यह कहना है ज्योतिषाचार्य और काशी में मनाए जनाए वाले गणेश उत्सव के प्रमख उपेन्द्र विनायक सहस्रबुद्धे का। संवाददाता नीरज कुमार ने उपेन्द्र विनायक से बात की और जानने की कोशिश की कि गणेश चतुर्थी पर उत्सव के विभिन्न पक्षों के क्या मायने हैं?

देवताओं में सबसे पहले पूजा भगवान गणेश की होती है। गणेश किसका प्रतिनिधित्व करते हैं?
गणेश ने पृथ्वी की परिक्रमा सबसे पहले पूरी की और उसी समय से उन्होंने अग्रपूज्य का पद पाया। कोई भी पूजा गणेश की पूजा के बगैर पूर्ण नहीं मानी जाती। सबसे पहले गणेश पूजन जरूरी है। आकाश, पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि इन पांच तत्वों से मिलकर ही मानव शरीर का निर्माण हुआ है, और भगवान गणेश इन पांच तत्वों के प्रतीक हैं। गणेश जी को विनायक भी कहा जाता है। विनायक लीडरशीप का बोध कराता है। विनायक यानी जिसका कोई नायक न हो। वह अपना नायक खुद हो।

गणेश पूजा को लेकर लोगों में काफी उत्साह देखा जाता है खासकर महाराष्ट्र में इसे व्यापक स्तर पर मनाया जाता है। बनारस में गणेश पूजा के आयोजन का खास प्रयोजन क्या है?
बनारस या काशी नगरी में गणेश जी की भी भूमिका महत्वपूर्ण है। यह भगवान शिव से जुड़ी नगरी है इसलिए गणेश का खास महत्व है। सती के शव को लेकर जब भगवान शंकर जा रहे थे उस समय भगवान विष्णु ने उन्हें काशी नगरी में रहने की सलाह दी थी। सती की मौत से भगवान शंकर काफी गुस्से में थे। काशी में गणेश जी आठ दिशाओं में सात चक्र में स्थापित हुए हैं। हरेक चक्र में सात विनायक हैं, यानी कुल मिलाकर 56 विनायक हुए हैं, जो कहीं और देखने को नहीं मिलता। इसलिए यह जगह गणेश पूजन के लिए काफी महत्वपूर्ण है।

गणेश पूजन क्यों करना चाहिए?
गणेश जी आत्मनियंत्रित (सेल्फ कंट्रोल्ड) देवता हैं। गणेश पूजन से आत्मनियंत्रण का भाव आता है। बनारस में एक खास पूजा की जाती है जिसे अंकुश पूजन कहते हैं। इसका पूजा का मुख्य प्रयोजन आत्मनियंत्रण हासिल करना होता है। साथ ही दूर्वा पूजन भी होता है। दूर्वा गणेश जी को काफी प्रिय है। उन्होंने इसे मस्तक पर धारण किया है। गणेश जी के पूजन से सामाजिक समरसता का भाव भी व्यक्ति के अंदर उमड़ता है। भगवान गणेश जन-जन के देवता हैं। वे सभी के हैं। उन्होंने दूर्वा, जिसे लोग पैरों से कुचल देते हैं और चूहे जैसे जंतु को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया। छोटे और बड़े सभी को गणेश जी ने महत्व दिया है। काशी में गणेश उत्सव के दौरान होने वाले दूर्वा पूजन में सभी समुदाय के लोग भारी संख्या में इकट्ठा होते हैं। गणेश जी सर्वसामान्य होने के कारण सर्वसुलभ कहे जाते हैं।

गणेश जी का सर हाथी का है, यह किस चीज का प्रतीक है?
गणेश जी का मस्तक हाथी का है और यह मद का प्रतीक है। यह आनंद और मस्ती का प्रतीक है। गणेश जी का मस्तक आनंद का बोध कराता है। गणेश जी के मस्तक की पूजा से विकृतियों पर अंकुश पाया जाता है।

कलयुग में भगवान गणेश कितने प्रासंगिक हैं और उनका क्या महत्व है?
कलयुग में भगवान गणेश का काफी महत्व है और वे काफी प्रासंगिक भी हैं। कहीं भी आप गणेश की पूजा कर सकते हैं। शास्त्रों में कहा भी गया है कलियु स्थानानि पूजयन्ते यानी इस कलयुग में कहीं भी गणेश की पूजा हो सकती हैं। शास्त्रों में गणेश जी और चंडी की पूजा का कलयुग में सर्वाधिक महत्व बताया गया है। गणेश जी 12 महीने 12 रूपों में रहते हैं और भाद्रमास में ये सिद्धि विनायक के रूप में होते हैं । उसी समय गणेश चतुर्थी की पूजा होती है।

उपेंद्र विनायक
Upendra Vinayakउपेंद्र विनायक सहस्रबुद्धे का जन्म 1958 में वाराणसी में हुआ था। उन्होंने बनारस यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में पीएचडी की। उन्होंने एलएलबी भी किया। कुछ दिनों तक वकालत करने के बाद वे ज्योतिष की ओर मुड़ गए और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। वाराणसी में गणोश पूजन मंडल से जुड़े हुए हैं और हर साल यहां होने वाले इस आयोजन में इनकी भूमिका महत्वपूर्ण होती है।