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महाराष्ट्र, तिलक और गणॆश‌ चतुर्थी

इतिहास बताता है कि गणॆश‌ चतुर्थी की शुरुआत मराठा सरदार शिवाजी के समय में हुई। उन्होंने इस उत्सव की शुरुआत सांस्कृतिक सौहार्द और राष्ट्रीयता के भाव मजबूत करने के लिए किया था। बाद में लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने इसमें नई जान फूंकी। तिलक ने इस उत्सव का सदुपयोग एक ऐसे प्लेटफॉर्म के रूप में किया जहां से आजादी की लड़ाई के संदेश प्रसारित होने लगे।

तब इसका महत्व इसलिए भी बढ़ गया था क्योंकि ब्रिटिश हुकू मत ने सभी प्रकार के जमावड़ों पर रोक लगा रखी थी। गणॆश‌ चतुर्थी ने तब भारतीयों में जबर्दस्त एकता का भाव फैलाया। राजनीतिक नेताओं ने इस उत्सव का उपयोग प्रेरणादायक भाषण देने और ब्रिटिश रूल के खिलाफ लोगों को जागरूक करने में किया।

गणॆश‌ चतुर्थी को महाराष्ट्र का राज्य पर्व बनाने में भी लोकमान्य गंगाधर तिलक का काफी योगदान रहा। अब महाराष्ट्र में गणॆश‌ की हजारों प्रतिमाएं बनती हैं। अरब सागर में या नदियों में विसर्जन के समय गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ के नारों के साथ बड़े-बड़े जुलूस निकालते हैं। गणॆशोत्सव अब पूरे देश में लोकप्रिय हो चुका है।