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हिंदी में हस्ताक्षर करने से क्यों कांपते हैं हाथ : बैरागी

मुंबई. विश्व हिंदी सम्मेलन 2007 में आमंत्रित विद्वान पूर्व सांसद और मशहूर साहित्यकार बालकवि बैरागी ने भास्कर डॉट कॉम से बातचीत करते हुए विश्व हिंदी सम्मेलन के कुछ अहम पलों को बांटा और यह विचार भी साझा किया कि हिंदी के सामने जमीनी समस्याएं क्या हैं। आइए पढ़ें बालकवि बैरागी के शब्द :

>> विश्व हिंदी सम्मेलन 2007 की सबसे बड़ी बात तो यही रही कि संयुक्त राष्ट्रसंघ के प्रांगण में 1100 लोगों के बीच तकरीबन सवा घंटे हिंदी ही हिंदी गूंजती रही और करीब ढाई सौ लोग दीवारों से सटकर खड़े रहे। इस तरह का नजारा इतिहास के आइने में पहली बार देखने को मिला।

>> विश्व हिंदी सम्मेलन के दौरान न्यूयॉर्क में इतने हिंदीभाषी और हिंदीप्रेमी थे कि किसी को कोई समस्या नहीं हुई। एक अपनेपन का माहौल रहा। अमेरिका के बाजार में हिंदी बढ़ रही है, सबको पता चला।

>> यूएन की सातवीं आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी को शामिल किए जाने की कवायद काफी सकारात्मक रही और हमारी सरकार ने भी कोशिश शुरू की है। इस बीच खुशी की बात यह रही कि रोटरी इंटरनेशनल ने पूरी दुनिया में हिंदी को अपनी गतिविधियों की भाषा के रूप में मान्यता दी है और अब हम उम्मीद कर सकते हैं कि लायंस क्लब जैसे अंतरराष्ट्रीय समूह भी इस दिशा में सकारात्मक कदम उठाएंगे।

>> इस सबके बावजूद मैं मानता हूं कि भाषा और विकास पर कभी पूर्णविराम नहीं लगता। यूएन की भाषा बनने के बाद भी यह सिलसिला जारी रहना चाहिए और रहेगा ही।

>> मैं उन लोगों की सोच पर बहुत मायूस होता हूं जो हिंदी में हस्ताक्षर करने से कतराते हैं। यही मानसिक गुलामी है और इसे सबसे पहले बदलने की जरूरत है।

>> हिंदी के सामने एक और समस्या यह है कि हिंदी की किताब खरीदकर पढ़ने की प्रवृत्ति पनप नहीं पा रही है। यह बहुत जरूरी है। फिर हिंदी लेखन में मूल्यों, शुद्धता और शुचिता का ध्यान रखा जाना भी बेहद महत्वपूर्ण है।

>> मुझे विश्वास है कि हिंदी बढ़ रही है और बढ़ती ही जाएगी। हिंदी बाजार में पैठ बना चुकी है और अगले विश्व सम्मेलन तक उम्मीद की जा सकती है कि हिंदी यूएन की आधिकारिक भाषा बन चुकी होगी।