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हिंदी और उर्दू एक-दूसरे की ताकत हैं : नारंग

मुंबई. साहित्य अकादमी, दिल्ली के निदेशक और ख्यात हिंदी लेखक गोपीचंद नारंग का मानना है कि हर भाषा की जड़ें मोहब्बत से ही सिंचित होती हैं और एक भाषा की मोहब्बत दूसरी भाषा के विकास या रास्ते में रोड़ा कभी नहीं बनती। विश्व हिंदी सम्मेलन में आमंत्रित किए गए नारंग ने भास्कर डॉट कॉम के साथ हिंदी के परिदृश्य के बारे में बातचीत की।

विश्व हिंदी सम्मेलन 2007 में आपने शिरकत की, खास बात क्या रही?
मैं वहां गया तो था लेकिन एक दिन में ही मुझे लौटना पड़ा क्योंकि हैदराबाद के एक विश्वविद्यालय द्वारा मुझे डीलिट से सम्मानित किया जाना था और राष्ट्रपति की मंशा थी कि मैं उसे तय कार्यक्रम के अनुसार ही ग्रहण करूं। लेकिन, इस बार संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा के रूप में हिंदी को शामिल किए जाने की मांग बड़े ह पुरजोर ढंग से रखी गई। इसे शामिल किए जाने के लिए संयुक्त राष्ट्र सदस्यों का तीन चौथाई बहुमत हमें चाहिए और इसके लिए हमें कोशिश करना है।

हिंदी और अंग्रेजी या हिंदी और उर्दू के नाम पर झगड़ने वालों के लिए क्या कहना चाहेंगे?
एक भाषा की मोहब्बत दूसरी भाषा को नहीं मारती। भाषा के नाम पर झगड़ा करने वाले राजनीति करते हैं और इसके लिए सिर्फ भाषा का शोषण करते हैं। सच तो यह है कि हिंदोस्तान में 45 करोड़ तक की आबादी सीधे हिंदी से जुड़ी है। हिंदी की शक्ति धरती की जड़ों से आती है। बड़ी भाषाएं देश में और भी हैं लेकिन वे क्षेत्र विशेष तक ही सीमित हैं। हिंदी अपने विविध रूपों में पूरे देश में सांस लेती है।

यह भी सच है कि ब्यूरोक्रेसी की एक सतह पर अंग्रेजी के बिना पत्ता भी नहीं हिलता लेकिन यह भी तो सच है कि देश भर के अधिकांश हिस्सों में आप चुनाव जीतने की जंग में हिंदी के बगैर सांस भी नहीं ले सकते। मैं मानता हूं कि आर्थिक ग्लोबलाइजेशन जरूरी है तरक्की के लिए लेकिन उतना ही जरूरी है सांस्कृतिक ग्लोबलाइजेशन।

भाषाई झगड़ा खड़ा करने वालों को समझना चाहिए कि हम बहुभाषी हैं। रोजमर्रा के जीवन में हम कम से कम दो या तीन भाषाओं से रूबरू होते हैं यानी हम एक साथ कई भाषाओं से जुड़ते हैं। और फिर, हिंदी तो इतनी उदार भाषा है कि वह किसी भाषा के आड़े नहीं आती और खुद को सबसे जोड़कर चलती है।

मैं कहता हूं कि प्रयोग की सतह पर हिंदी की सबसे बड़ी ताकत उर्दू है और उर्दू की सबसे बड़ी ताकत हिंदी। बंटवारे की राजनीति में यह झगड़ा पैदा हो गया लेकिन अब इसके खत्म होने के दिन आ गए हैं।

कमाऊ भाषा बन चुकी हिंदी की किताबें क्यों नहीं बिक पातीं?
जैसे-जैसे आर्थिक शक्ति बढ़ेगी तो यह भी होगा। और फिर इसके लिए एक बड़ी जागृति लाना होगी, बंगला और मलयालम की तरह हिंदी में भी पत्रिकाएं या पुस्तकें खरीदकर पढ़ने की प्रवृत्ति को हमें खुद ही विकसित करना होगा।

अगले विश्व हिंदी सम्मेलन तक क्या हिंदी यूएन की एक भाषा हो सकेगी?
बिल्कुल हो जाएगी बशर्ते हम आपसी फूट खत्म कर एक होकर कोशिश कर पाएं। हिंदी के सभी सेवकों, बोलने वालों, लेखकों, प्रकाशकों और प्रेमियों को एक साथ आकर यह बीड़ा उठाना होगा।