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साल की ललिता(परिवर्तित नाम) मेलूर के सानथुपेट्टाई गांव में एक कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करती है। पिछले हफ्ते ही उसे यहां के सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था, जहां पर उसने बुधवार को एक बच्ची को जन्म दिया।
ललिता के पति उदय कुमार की मौत पांच महीने पहले हो गई थी। संभवत: उदय के जरिए ही वह एचआईवी पॉजीटिव हुई हो। गर्भावस्था के अंतिम महीनों में भी उसे जबरदस्ती कंस्ट्रक्शन साइट पर काम करने के लिए बाध्य होना पड़ा, क्योंकि कोई और उसकी मदद के लिए नहीं था। शुक्रवार को ललिता ने खाने के लिए लोगों से करीब १क्क् रु. की मांग की, लेकिन उसकी किसी ने मदद नहीं की।
वह रोती, चिल्लाती रही, कई लोग उसके आसपास आ गए, कुछ लोगों ने उसे प्रताड़ित भी किया। ललिता ने कहा कि उसके पास अपना और अपने बच्चे का पेट भरने के लिए पैसे नहीं हैं। इसीलिए उसके पास अपने नवजात बच्चे को बेचने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा है। पुलिसवालों ने जैसे-तैसे ललिता को वापस उसके वार्ड में भेजा।
अस्पताल के सूत्रों ने बताया कि ललिता ने पहले अपने बच्चे को क्रेडल में देने की सोची, लेकिन एक सुरक्षाकर्मी ने उसे ऐसा करने नहीं दिया। हालांकि अस्पताल के डिप्टी सुपरीटेंडेंट डॉक्टर शिव कुमार ने इस बात से इनकार किया है।
उन्होंने कहा कि वह महिला अपने बच्चे को क्रेडल में नहीं देना चाहती थी, बल्कि वह उसे बेचने पर आमादा थी और हमारे अस्पताल में बच्चों को बेचने की अनुमति नहीं है। ललिता के साथ काम करने वाले अन्य लोगों ने ही उसे अस्पताल में भर्ती कराया था, लेकिन जैसे ही उन्हें इस बात का पता चला कि ललिता एचआईवी पॉजीटिव है, सबने उसका साथ छोड़ दिया। दूसरी तरफ उसे अस्पताल में भी भेदभाव का शिकार होना पड़ा।
अस्पताल में भी उसे मेटरनिटी वार्ड से हटाकर एक अलग कमरे में रखा गया। ललिता का बच्च भी एचआईवी पॉजीटिव है या नहीं, इसका पता अभी नहीं चल सका है। डॉक्टरों का कहना है इसमें छह हफ्तों का समय लगेगा। इस घटना को इतने दिन बीतने के बाद भी ललिता को अभी तक सरकारी मदद मुहैया नहीं कराई गई है। सरकार की नीति के अनुसार गरीब महिलाओं को छह हजार प्रेगनेंसी अलाउंस के तौर पर दिया जाता है।