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‘राज-दिलीप-देव’ तिकड़ी का ‘आनंद’

मुंबई. रुपहले परदे पर 50 का दशक बेहतरीन फिल्मों और संगीत के अलावा जिस खास पहलू के लिए सबसे ज्यादा जाना जाता है वह है तीन बेहतरीन अदाकारों की मौजूदगी और टक्कर। राज कपूर, दिलीप कुमार और देव आनंद की इस तिकड़ी ने 20 साल से ज्यादा समय तक दर्शकों को तीन खेमों में बांटे रखा।

सबसे पहले बात करें राज कपूर की। राज कपूर ने रुपहले परदे पर एक आम आदमी के किरदार को जिया और समाज की जमात से निकले इस आम आदमी को दर्शकों ने अपने दिल पर राज करने का हक दिया। गरीबी, ईमानदारी, भटकाव, अच्छा चरित्र और सच्ची आत्मा इस नायक के गुण थे जो व्यवहारवाद की कठोरतम धरातल से उपजते हुए आदर्शवाद की चरम सीमा तक पहुंचते थे। आवारा, श्री 420, जागते रहो, चोरी-चोरी आदि कई फिल्मों के जरिए राज ने न सिर्फ नौजवानों के दिलों में बल्कि हर वर्ग के मन में अपनी जगह बना रखी थी। राज ने उस नायक को जिया जो निश्छल प्रेम करता है और संघर्ष उसके जीवन और प्रेम के लिए अभीष्ट होता है।

दूसरे छोर पर थे दिलीप कुमार, कहा जाए तो राज कपूर के सामने सबसे बड़ी चुनौती। अदाकारी के मामले में माना जाता रहा है कि उनका कोई सानी नहीं था। ट्रेजडी किंग के नाम से मशहूर होने में उन्हें ज्यादा समय नहीं लगा। राज के श्रंगार रस से बिल्कुल उलट श्रंगार रस को दिलीप कुमार ने परदे पर खूबसूरती से उतारा। राज के श्रंगार रस का परिणाम संयोग था और दिलीप के लिए वियोग। देवदास, मुगल-ए-आजम, आन, संघर्ष जैसे संजीदा और दर्द भरे किरदार उतनी ही गहराई के साथ निभा जाने के लिए दिलीप कुमार क्लास के पसंदीदा तो रहे ही, साथ ही कठोर सच्चई से वाकिफ होने वाले एक बहुत बड़े वर्ग के मन में उस नायक के प्रति सहानुभूति का भाव बना रहा।

इस सीधी और साफ समझ में आने वाली टक्कर के दौरान देव आनंद ने एक अलग राह पकड़ी जिसे मध्यमार्ग नहीं कहा जा सकता, बस वह उनका अपना रास्ता था। स्टाइल के साथ ही नौजवानी की उमंगों, तरंगों और चंचलता को उन्होंने अपने किरदारों का मुख्य अंग बना लिया। देव आनंद का नायक न तो राज की तरह आदर्शवाद और व्यवहारवाद में उलझता दिखा और न ही दिलीप की तरह प्रेम की नाकामियों से दो-चार होता हुआ। अपनी नायिकाओं के साथ छेड़खानी, शरारत और फ्लर्ट करने वाला आम नौजवान देव का नायक रहा।

प्रेम को सबसे सरलता और सहजता के साथ जीना देव के नायक की नियति थी। फिर वह चाहे बाजी हो, जाल, तीन देवियां, लव मैरिज, तेरे घर के सामने या पेइंग गेस्ट, देव का नायक दीन-दुनिया से बेपरवाह प्रेम करने में विश्वास रखता था। नौजवानों खासकर युवतियों की पहली पसंद बनकर उभरा यह नायक जो शर्मो-हया के दौर में गलत मानी जाने वाली भावनाओं को अल्हड़ता और मासूमियत के साथ जाहिर करता चला गया।

प्रेम के तीन दृश्य :उस दौर में परदे पर प्रेम के तीन आयामों को उकेरने वाले इन तीन अदाकारों ने कुछ प्रेम दृश्य इस तरह से जिए हैं कि वे हिंदी सिनेमा के सबसे बेहतरीन प्रेम दृश्यों की सूची में हमेशा शामिल रहने के हकदार हैं।

दृश्य 1. परदे पर जैसे सात जन्मों का रिश्ता जीने वाली राज कूपर-नरगिस की जोड़ी का एक यादगार गीत - प्यार हुआ इकरार हुआ। इस गीत में उस दौर के हिंदुस्तानी समाज और संस्कृति का पूरा चरित्र उभरकर सामने आता है। शर्म हो, मर्यादा हो, डर हो या फिर प्रेम की पवित्र भावना, हिलोर, पूरा दृश्य उस समय के लगभग हर मन को परदे पर जीवंत कर रहा था। और इस दृश्य का वह मोड़ - हम न रहेंगे, तुम न रहोगे, फिर भी रहेंगी कहानियां.. वह छतरी का उड़ जाना, वो मन्ना डे के पीछे लता की आवाज में ऊंचे सुरों का आलाप, वो राज की बेबाकी और वो नरगिस का कुछ पलों के लिए डर से आजाद हो जाना। यही था उस गीत का जादू और यही है उस गीत की सच्चई जो आज भी दिलो-दिमाग पर छा जाने का माद्दा रखती है। श्री 420 के इस गीत के अलावा राज कपूर की आवारा, चोरी-चोरी और अनाड़ी के भी कुछ प्रेम दृश्य भी मील के पत्थर हैं।

दृश्य 2. जहांपनाह जलालुद्दीन मोहम्मद अकबर के महल के पीछे के हिस्से का बाग। तानसेन की ठुमरी के सुरों की तपिश के दौरान साहिबे-आलम सलीम के इसरार पर अनारकली का वहां आना। एक फूल बिखेरते पेड़ के नीचे दोनों का एक-दूसरे को देखना और इश्क का एक इबादत, एक जुनून की तरह हावी हो जाना। किसी को होश न रहता था और न रहता है कि वह दिलीप कुमार थे, वह मधुबाला थीं और वह आवाज बड़े गुलाम अली खां साहब की थी। दिलीप कुमार का एक मोरपंख से मधुबाला के चेहरे को सहलाना, सब कुछ अलौकिक, अद्भुत सा लगता है। बिना किसी स्पर्श के इस कदर मादक और संवेदनशील दृश्य निश्चित रूप से फिल्मकारों के लिए भी एक सपने जैसा ही है। इसके अलावा दिलीप कुमार के खाते में इसी फिल्म के कुछ और प्रेम दृश्यों के साथ ही अमर, देवदास, मधुमती और दिल दिया दर्द लिया के कुछ दृश्य लाजवाब हैं।

दृश्य 3. एक गीत तो है तेरे घर के सामने का कुतुब मीनार की सीढ़ियां चढ़ते हुए फिल्माया गया है देव और नूतन पर, दिल का भंवर करे पुकार..। इस गीत में दोनों के ही एक्सप्रेशन मुकम्मल तौर पर सब कुछ बयान करते हैं। छेड़खानी, शरारत, प्यार, चंचलता और अल्हड़ता खूबसूरती के साथ हर दिल की उमंग का अनुवाद दिखाई देती है। इसी के समानांतर एक गीत और दिखता है देव आनंद का, अच्छा जी मैं हारी.. मधुबाला के साथ कमाल की जुगलबंदी। दोनों की बेमिसाल अदाएं और शरारतें।

दरअसल देव आनंद ने परदे पर जवानी के दबे-कुचले अरमानों को न सिर्फ जिया बल्कि पूरे रस के साथ जिया इसलिए वे युवा वर्ग के तो चहेते बने रहे लेकिन बुजुर्गो के लिए बेशर्म, नामाकूल और फूहड़। कुछ भी हो ये दोनों ही गीत रोमांस के नए मोड़ की शुरुआत थे और इनके अलावा बाजी में केसीनो के बाहर कामिनी कौशल का गिरेबान पकड़ना, तीन देवियां मंे कल्पना कार्तिक के साथ अंखियां लड़ाना या पेइंग गेस्ट में नूतन के आंचल को न छोड़ना नए जमाने के रोमांस के पुराने दृश्यों के तौर पर याद रखे जाएंगे।





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