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यूं चला जिंदगी का सफर

मुंबई. अविभाजित पंजाब के गुरदासपुर में 1923 में जन्मे देव आनंद ने लाहौर कॉलेज से अंग्रेजी साहित्य में बीए करने के बाद अभिनय के शौक को पूरा करने के लिए बंबई की राह पकड़ी। बंबई आकर उन्हें मालूम हुआ कि रस्ता इतना आसान नहीं तो उन्होंने पहले मिल्रिटी सेंसर ऑफिस में 160 रुपए माहवार पर नौकरी पाई।

लेकिन, जल्द ही प्रभात टॉकीज की फिल्म हम एक हैं के लिए अभिनेता के तौर पर उन्हें ब्रेक मिला और पुणो में इस फिल्म की शूटिंग के दौरान देव की दोस्ती साथी अभिनेता गुरुदत्त से हुई। अच्छी दोस्ती के बाद दोनों ने एक करार किया कि अगर देव किसी फिल्म का निर्माण करेंगे तो गुरुदत्त उसका निर्देशन करेंगे और गुरुदत्त कोई फिल्म बनाएंगे तो देव उसमें अभिनेता होंगे।

बहरहाल, देव को पहला बड़ा ब्रेक दिया उनके पसंदीदा अभिनेता अशोक कुमार ने। 1948 में बॉम्बे टॉकीज प्रोडक्शन की जिद्दी के लिए देव आनंद की कोस्टार बनीं कामिनी कौशल और फिल्म सफल हुई। इस सफलता के साथ ही देव ने 1949 में अपनी फिल्म निर्माण कंपनी नवकेतन शुरू की जो आज तक फिल्में बना रही है। 1951 में देव ने बाजी का निर्माण किया और वादे के मुताबिक गुरुदत्त को निर्देशन की कमान सौंपी। हालांकि देव कुछ डरे हुए जरूर थे लेकिन फिल्म की कामयाबी ने उन्हें असली स्टार बना दिया और साहिर का गीत तदबीर से बिगड़ी हुई.. लाखों जुबानों पर मचल रहा था।

बस, फिर क्या देव के सितारे दिनोंदिन बुलंदी छूते चले गए। 1952 में राज कपूर की आवारा के साथ ही देव की राही और आंधियां स्क्रीन पर टंगने के साथ ही फिल्म फेस्टिवल में दिखाई गईं। इसी साल देव की कल्पना कार्तिक के साथ एक और फिल्म टैक्सी ड्राइवर भी बड़ी हिट साबित हुई और दोनों ने एक सादे समारोह में शादी भी कर ली।

फिर तो देव की सफल फिल्मों की लाइन लग गई। मुनीमजी, सीआईडी, पेइंग गेस्ट, काला बाजार, काला पानी.. काला पानी के लिए देव ने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार जीतकर राज कपूर और दिलीप कुमार के सामने अपनी मौजूदगी की बातों को पुख्ता कर दिखा भी दिया। इसके बाद देव आनंद की पहली रंगीन फिल्म उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी हिट और सबसे महत्वपूर्ण फिल्मों में शुमार हुई, वह थी आरके नारायण के उपन्यास पर आधारित गाइड।

गाइड के लिए उत्साहित देव ने हॉलीवुड में एक इंडो-यूएस को-प्रोडक्शन लॉंच किया और हिंदी और अंग्रेजी में एक साथ इसे 1965 में रिलीज किया गया था। गाइड के निर्देशक और देव के छोटे भाई विजय आनंद ने सभी आलोचकों के मुंह बंद कर दिए। इसके बाद देव और विजय की जुगलबंदी चली और काफी लटकी फिल्म ज्वैल थीफ भी बनाई गई।

इसके बाद 1970 में जहां राज कपूर की मेरा नाम जोकर बड़ी फ्लॉप हुई वहीं देव आनंद की जॉनी मेरा नाम बड़ी हिट साबित हुई। इसके बाद प्रेम पुजारी, हरे राम हरे कृष्णा, तेरे मेरे सपने जैसी फिल्मों के जरिए देव बतौर हीरो परदे पर दिखते रहे जबकि राज और दिलीप इस दौर में अलग तरह की भूमिकाएं करने लगे थे। देव आनंद की देस-परदेस 1978 में आखिरी हिट मानी जाती है। उसके बाद से वे लगातार फिल्म निर्माण और निर्देशन में सक्रिय हैं लेकिन अब तक कामयाब फिल्म दे पाने में नाकाम रहे हैं।





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