धन तेरस पर विशेष
कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि भगवान धन्वंतरि के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है। देवताओं एवं राक्षसों द्वारा क्षीर सागर का मंथन करते समय भगवान धन्वंतरि औषधियों के कलश के साथ प्रकट हुए थे। इसी कारण धनतेरस को भगवान धन्वंतरि के जयंती महोत्सव के रूप में भी मनाया जाता है। भगवान के 24 अवतारों में से स्वास्थ्य के देवता के रूप में भगवान धन्वंतरि का एक अवतार माना जाता है।
इस दिन दीर्घ जीवन तथा आरोग्य लाभ के लिए भगवान धन्वंतरि का पूजन किया जाता है। यह भी कहा जाता है कि वे संपूर्ण पृथ्वी पर प्राणियों को रोगमुक्त करने के लिए भव-भेष्जावतार के रूप में प्रकट हुए थे। वास्तव में ‘स्वास्थ्य ही धन है’ यह कहावत संभवत: आदिकाल से चली आ रही है। स्वास्थ्य की कामना एवं धनतेरस का परस्पर संबंध यही बताता है कि लक्ष्मी का सदुपयोग करना व्यक्ति के स्वस्थ रहने पर ही संभव है। इसी कारण ‘धनतेरस’ के दिन स्वास्थ्य के अवतार धन्वंतरि की पूजा का विधान है।
धनतेरस का दिन वस्तुत: यमराज से संबंध रखने वाला व्रत भी माना गया है। यह इसलिए भी कि यदि स्वस्थ नहीं रह सके तो रोग एवं बीमारियों के गर्त में जाकर मृत्यु-पाश में ही जाना होता है। अतएव रोगों से छुटकारा प्राप्त करने के लिए भी श्री यम की पूजन करने की प्रथा प्रचलित है। इस दिन सायंकाल घर के बाहर मुख्य दरवाजे पर एक पात्र में अन्न रखकर उसके ऊपर यमराज के लिए दक्षिणामुख करते हुए दीपदान रखे जाने की परंपरा है। इस बारे में जो मान्यता है वह निम्न श्लोक से प्रतिपादित होती है।
कार्तिक स्यासिते पक्षे त्रयोदश्यां निशामुखेयमदीपं वहिर्दघाद अपमृत्यु र्विनश्यति।
यह मान्यता है कि उक्त विधि के अनुसार दीपदान करते हुए यम का अर्चन किया जाता है तो अपमृत्यु का भय नहीं होता।वास्तव में उक्त श्लोक एक प्राचीन पौराणिक कथा पर आधारित है। एक बार यमराज ने दूतों से कहा कि मेरी आज्ञा से मृत्युलोक के प्राणियों का प्राणहरण तुम्हारे द्वारा किया जाता है। ऐसी स्थिति में कभी तुम्हारे मन में दया का भाव आया है? या कभी दुख हुआ है? यमदूतों ने कहा महाराज हम लोग तो आपके आदेश का पालन करने वाले हैं। हम लोगों का तो कर्म ही क्रूरता का है, किंतु अपमृत्युवश किसी युवा अथवा कम उम्र के प्राणी के असामयिक प्राण हरण करते समय उनके पारिवारिक सदस्यों का करुण क्रंदन सुनकर हम पाषाण हृदय का मन भी दुखी एवं द्रवित होने लगता है।
इस कारण कोई ऐसा उपाय आप ही बताएं, जिससे कि मृत्युलोक के प्राणी अपमृत्यु से बच सकें। यमदूतों की इस बात पर यमराज ने कहा कि धनतेरस के पर्व पर जो भी मेरे उद्देश्य से दीप दान करेगा उसकी असामयिक मृत्यु नहीं होगी। इस कारण यम का दीप दान देने की प्रथा तभी से चालू हुई।
धनतेरस के दिन पात्र खरीदने की भी परंपरा है। इस दिन चांदी के सिक्के, मूर्तियां, बर्तन खरीदना ज्यादा शुभ माना गया है, क्योंकि चांदी को चंद्रमा की धातु माना गया है। चंद्रमा मन का देवता है इस कारण व्यक्ति को मन में संतोष रहता है। मन के संतुष्ट होने पर ही व्यक्ति स्वस्थ होता है। इस संदर्भ यह कहावत भी प्रचलित है कि ‘मन संतोषी तो जग संतोषी’ यानी मन के संतुष्ट होने पर संपूर्ण चराचर में संतोष हो जाता है। इसी तरह संस्कृत में भी एक कहावत है कि ‘न तोषाद् परमं सुखम’ अर्थात संतोष से बड़ा सुख कोई नहीं है। अतएव संतोष एवं सुख चाहते हैं तो चांदी जैसा निर्मल स्वभाव बनकर चमकते रहें। संतोष धन खरीदने के लिए अपने इष्ट देवता की चांदी की प्रतिकृति खरीदें, चांदी के पात्र को उपयोग में लाने के लिए चांदी खरीदें। हालांकि धीरे-धीरे समाज में चांदी की जगह बर्तन खरीदने की परंपरा शुरू हो गई एवं साधारण परिवार का व्यक्ति भी एक नया बर्तन तो धनतेरस पर खरीद ही लेता है, जो कि उसके दैनिक जीवन में काम आता है।
इस प्रकार धनतेरस का पर्व दीपावली पर्व श्रंखला का प्रथम पर्व है। इस दिन धन्वंतरि पूजन, यम दीपक तथा धन के पूजन का महत्व है। कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी से अमावस्या (दीपावली पर्व) तक गौत्रिरात्र-व्रत की भी परंपरा है। इसमें त्रयोदशी से दीपावली पर्व तक गौशाला की विशेष सफाई, गौ पूजन तथा उसके बाद सौभाग्यवती स्त्रियों को सप्तधान्य, सात मिठाई एवं विभिन्न प्रकार के फल देने की भी परंपरा भी है। गौत्रिरात्र-व्रत महालक्ष्मी पूजन दीपावली के दिन से तीन दिन का माना गया है, ऐसी मान्यता है कि इससे पारिवारिक सुख में वृद्धि होती है। साथ ही जीवन धनधान्य से समृद्ध होता है।