जब राम 15 साल के थे तो ऋषि विश्वामित्र अयोध्या आए। वे राम की सहायता से अपने ध्यान में विघ्न डाल रहे राक्षसों से मुक्ति पाना चाहते थे। कुटिया के आस पास के इलाके में तारका नाम की एक राक्षस थी। वह बहुत ही बलवान और ताकतवर राक्षस थी जो ऋषियों को पकड़ कर खा जाया करती थी। हालांकि तो भी नौजवान राम उस राक्षस को मारने सक्षम थे और वे ही ऋषियों को उसके अत्याचार से मुक्ति दिला सकते थे। ऋषि विश्वामित्र को मालूम था कि राम धरती पर बुराइयों का नाश करने के उद्देश्य से आए हैं। यह तो बस एक शुरूआत था।
अहल्या ऋषि गौतम की पत्नी थी। वो बिना किसी गलती के अपने पति की बुद्धिहीनता के कारण शापग्रस्त थी। शापग्रस्त होने के कारण वो अदृश्य रूप से हवा में रहती थी। वो शाप से तभी मुक्त हो सकती थी जब राम इस आश्रम में प्रवेश करते। बहुत सालों बाद राम का जन्म हुआ और अंत राम इस आश्रम में प्रवेश किए। राम के आश्रम में उपस्थित होने से अहल्या शाप से मुक्त हो गई और वो राम के सम्मुख प्रकट हुई। इसी समय ऋषि गौतम भी वापस आ गए और उन्होंने पत्नी को फिर से अपना लिया।
राजा जनक की एक बहुत ही सुंदर कन्या थी जिसे सभी उसे देवी लक्ष्मी का अवतार समझते थे। राजा जनक के पास रुद्र का एक महान धनुष था। जब बेटी की शादी के लिए वर तलाशने का समय आया तब राजा जनक ने यह घोषणा की कि जो भी इस धनुष की डोरी इस पर चढ़ा देगा वो हमारी बेटी का हाथ थामेगा। यद्यपि स्वयंवर में बहुत सार महारथी आए लेकिन किसी से यह काम हो न सका। तब राम ने बिना किसी परिश्रम के धनुष की डोरी चढा़ई और डोर को जोर से पीछे की ओर खींचे, जिससे की आश्चर्यस्वरूप धनुष कड़कड़ाहट के साथ दो टुकड़ों में टूट ग
राजा दशरथ ने अपनी तीन पत्नियों में से कैकेयी को एक इच्छा मांगने का वचन दे रखा था जिसे कैकेयी ने कई सालों से छोड़ रखा था। कैकेयी ने अपनी इच्छा के अनुरूप दशरथ से राम के लिए 14 साल वनवास और अपने बेटे भरत के लिए अयोध्या की राजगद्दी मांगी। राम हमेशा सच्चाई का समर्थक रहे हैं, इसलिए वे अपने पिता के दिए वचन को पूरा करने के लिए प्रसन्न थे। सीता और लक्ष्मण (अपने बड़े भाई राम के अनुरागी) राम से अलग नहीं होना चाहते थे इसलिए दोनों राम के साथ जंगल में चले गए। रास्ते में उन्हें जंगल का राजा गुहा मिला। गुहा ने राम के चरणों को धोया और उसके बाद उसने अपने नाव में तीनों को बैठाकर गंगा नदी को पार कराया।ं टूट गया।
राम के छोटे भाई भरत भी राम के बड़े भक्त थे। वे अपनी माता द्वारा राजगद्दी के लिए किए गए छलकपट के बार में कुछ भी नहीं जानते थे और वे उस समय मौजूद नहीं थे। जब वे अयोध्या लौटे और राम भइया के बार में मालूम चला तो वे अपने बड़े भाई को वापस लाने के जंगल की ओर चल पड़े। राम के लिए राजगद्दी से ज्यादा महत्वपूर्ण अपने पिता को दिए वचन को पूरा करना था। भरत ने राम के पादुका को लिए और उसे राजसिंहासन पद विराजमान किए। भरत ने राम का अनुयायी बनकर शासन को संभाला और राम के वनवास रहने तक एक साधारण जीवन व्यतित किया।
रावण नाम का एक दुष्ट और ताकतवर राजा रहता था जो तीनों दुनिया पर राज करता था। वह सोचता था कि उसके पास दुनिया की सारी सुंदर चीचें मौजूद हैं। जब उसे मालूम चला कि जंगल में एक सुंदर महिला रह रही हैं तो उसके मन में उसे पाने की इच्छा होने लगी। रावण के चाचा मरीचा काले जादू के महारथी थे। मरीचा ने एक मनमोहक हिरण का रूप धारण कर जंगल में सीता का ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए वह उनके वाटिका के इर्दगिर्द भटकने लगा। सीता ने जब इस हिरण को देखा तो वे राम इसे पकड़ कर लाने को कहा। यह एक रावण द्वारा बनायी गयी योजना थी जिससे कि राम और सीता एक दूसर से अलग हो सकें।
जब राम और लक्ष्मण उस हिरण को पकड़ने के लिए जंगल में गए तब रावण ने सीता का अपहरण कर लिया। वह सीता को अपने महान रथ में लेकर उड़ चला। आसमान में सहायता को चिल्लती सीता की आवाज सुन गरुड़ जटायु रावण से भिड़ पड़ा लेकिन रावण के सामने जटायु कहां टिक पाता और रावण ने जटायु के दोनों पर काट दिए जिससे की वह जमीन पर गिर पड़ा। सीता ने अपने गहने इस आशा से फेंकना शुरू दिया ताकि राम खोज पाएं और यह समझ सकें कि उसके साथ क्या हुआ है और वह किस दिशा की ओर गयीं है।अलग हो सकें।
सीता की तलाश में निकले राम को बंदरों के राजा सुग्रीव से दोस्ती हो गई। वहां उनकी मुलाकात हनुमान से हुई। हनुमान के बार में ऐसा माना जाता है कि वे भगवान शिव के अवतार थे जो धरती पर राम को उसके लक्ष्य में सहायता करने के लिए अवतरित हुए थे। हनुमान निस्वार्थ सेवा और दीनता की अभिव्यक्ति थे। उसके साथ ही वे बुद्धिमान और बलशाली भी थे। राम ने हनुमान को अपनी अंगूठी देते हुए कहा कि वे इसे सीता को दिखा देना। राम जानते थे कि हनुमान सीता को तलाशने में सक्षम हैं। हनुमान ने सीता को लंका में पाया। लंका में जोरदार तहस नहस करने के बाद हनुमान ने सीता को वचन दिया कि वह राम के साथ जल्द ही वापस आएगा।
समुद्र के रास्ते लंका जाने से पूर्व राम ने भगवान शिव का एक मंदिर बनाया जो आज के दिन रामेव्श्ररम के नाम से जाना जाता है। राम ने यहां भगवान शिव की आराधना की और उनसे आशिर्वाद प्राप्त कर युद्ध की तैयारी शुरू कर दिया।
राम और उनकी बंदरों की सेना ने लंका पर आक्रमण करने के लिए समुद्र पर एक पुल का निमार्ण किया। पुल को बनाने के लिए प्रत्येक पत्थरों पर राम लिखा गया और उसके बाद उसे समुद्र में डाला गया और सभी ने मिलकर प्रतीयमानत: असंभव कार्य को पूरा किया। राम, लक्ष्मण और उनकी बंदरों की सेना और भालू पत्थरों से बने इस पुल के सहार समुद्र को पार लंका पहुंच गए। वे यहां पराक्रमी रावण से लड़ने को तैयार हो गए।
राम और रावण के बीच भीषण युद्ध शुरू हो गया और इस युद्ध के दौरान एक समय लक्ष्मण प्राणघातक रूप से घायल हो गए। वैद्य ने बताया कि संजीवनी जड़ी बूटी जो भारत में एक महत्वपूर्ण पहाड़ पर पाया जाता है, उसके मिल जाने पर ही जान बचाई जा सकती है। हनुमान तुरंत संजीवनी जड़ीबूटी लाने के लिए आसमान में उड़ चले। जब वे पहाड़ पर पहुंचे तो वे जड़ीबूटी को ढूंढने में असमर्थ रहे इसलिए उन्होंने पूरे पहाड़ को उठा कर लक्ष्मण के प्राण को लेकर चले आए। हनुमान का पहाड़ को उठाकर लाने का दृश्य इस बात को चित्रित करता है कि वे अपनी सेवा में किस हद तक जा सकते हैं और राम के कितने बड़े भक्त हैं।तैयार हो गए।
बहुत सारी भयंकर युद्ध लड़ने के बाद राम ने वे कर दिखाया जो सभी इसे असंभव समझते थे। रावण को मारकर राम ने धरती पर अवतार लेने का अपना महत्वपूर्ण कार्य को पूरा कर दिया। उसके बाद सीता का राम से मिलन हुआ। इस समय 14 वर्षो का वनवास भी खत्म हो चुका था। इसके बाद राम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या लौट आए। यहां की जनता इनके अयोध्या लौट आने पर काफी उत्सुक थी। ितने बड़े भक्त हैं।
राम के अयोध्या लौटने पर वहां दीपावली मनायी गई। दीपावली के दिन भक्त शाम को अपने घरों और गलियों में दीपक जलाकर राम को घर लौटने में सहायता करते हैं।