दशहरा या विजया दशमी नवरात्रि के बाद दसवें दिन मनाया जाता है। इसी दिन राम ने महान असुर रावण का वध किया था जिसने राम की पत्नी सीता का अपहरण कर अपने साम्राज्य लंका ले गया था। भगवान राम युद्ध की देवी मां दुर्गा के भक्त थे, उन्होंने युद्ध के दौरान पहले नौ दिनों तक मां दुर्गा की पूजा करते रहे और दसवें दिन राम ने दुष्ट रावण का वध किया। इसके बाद राम ने भाई लक्ष्मण, भक्त हनुमान, और बंदरों की सेना के साथ मिलकर एक बड़े युद्ध लड़कर अपनी पत्नी सीता को छुड़ाया। इसलिए विजया दशमी एक बहुत ही महत्वपूर्ण दिन है। इस दिन रावण, उसके भाई कुंभकरण और पुत्र मेघनाद के पुतले खुले जगह में जलाए जाते हैं। कलाकार राम, पत्नी सीता और भाई लक्ष्मण के रूप धारण कर आते हैं और एक आग सहित तीर को इन पुतलों की मारते हैं जोकि पटाखों से भरे होते हैं। पुतले में आग लगते ही वह धूधू कर जलने लगता है और इनमें लगे पटाखे फटने लगते हैं और जिससे की इनका अंत हो जाता है।
दशहरा के समय शहर में कार्निवाल और मेला आयोतिज किया जाता है। कुछ स्थानों पर रथों को खुबसूरती के साथ सजा कर एक विशाल जुलूस भी निकाला जाता है। इस जुलूस को डांसर और संगीतकार गाना गाकर और संगीत वाद्य को बजाकर जुलूस का नेतृत्व करते हैं और सभी भक्तों को अच्छाई की भावना में शराबोर कर देते हैं। दशहरा पर्व को मनाने के लिए एक बड़े मेले का आयोजन किया जाता है। यहां लोग अपने परिवार, दोस्तों के साथ आते हैं और खुले आसमान के नीचे एक दूसरे से जान पहचान बढ़ाने के साथ मेले का भी पूरा आनंद लेते हैं। मेले में तरह तरह के स्टाल लगाए जाते हैं जहां चुड़ियों से लेकर खिलौने और कपड़े बेचे जाते हैं। इसके साथ ही मेले में आपके पेट के लिए त्योहारी व्यंजनों के स्टालों की भरमार रहती है। यहां पर मशहूर भेलपुरी के स्टाल जो भूने हुए चावल और विभिन्न मसालों का मिश्रण होता है।
दशहरा उत्सव में रामलीला भी एक महत्वपूर्ण रोल अदा करता है। रामलीला में राम, सीता और लक्ष्मण की जीवन का वृत्तांत वर्णन किया जाता है। रामलीला नाटक का मंचन देश के विभिन्न क्षेत्रों में होता है। यह देश में अलग अलग तरीके से मनाया जाता है। बंगाल और मध्य भारत के अलावा दशहरा पर्व देश के अन्य राज्यों में क्षेत्रीय विषमता के बावजूद एक समान उत्साह और शौक से मनाया जाता है।