दुर्गादशमी और विजया दशमी, एक ही त्योहार के दो अलग अलग रूप हैं। विजयादशमी को विजय पर्व के रूप में मनाया जाता है। बंगाल में दशहरा और विजया दशमी एक ही दिन पड़ता है। यह दिन बंगालियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। यह देवी मां के पूजन का दसवां दिन होता है। विजया दशमी के दिन लोग अपने पुराने दोस्त, परिवार तक पहुंच और परिचय बनाकर एक दूसरे को शुभो विजया की बधाई देते हैं। शाम को परिवार, दोस्तों के साथ समय व्यतीत करते हैं। यहां तक कि वे भी जो साल भर अपनों से दूर रहते हैं विजया दशमी के दिन अपने घर आने की कोशिश करते हैं और अपने प्रियजनों को शुभो विजया की बधाई देते हैं।
बच्चे बड़ों के पैर छू उनका आशीर्वाद ग्रहण करते हैं और उनके प्रति आदर का भाव प्रकट करते हैं। उसी प्रकार बड़े भी शुद्ध हृदय से एक दूसरे से आलिंगन करते हैं और बधाई देते हैं, जिसे बंगाली में कोलाकुली कहा जाता है। यह मर्दों के लिए प्रथा के अनुकूल है कि वे एक दूसरे का आलिंगन करें क्यों न वे पहली बार ही एक दूसरे से मिल रहे हों और इस पवित्र दिन को अपने आस पड़ोस और प्रियजनों को शुभो विजया की बधाई देते हैं।
विजया दशमी के दिन ही देवी दुर्गा की प्रतिमा को पास के नदी में विसर्जन किया जाता है। यह धर्मानुष्ठान आगे चलकर एक दूसरे रंगबिरंगे रस्म सिंदूर खेला में जाना जाता है और यह खास कर शादीशुदा महिलाओं के लिए सुरक्षित है। वे दीपक के साथ देवी दुर्गा की आरती करती हैं, मिठाई को दुर्गा प्रतिमा की होठों पर रखते हैं और देवी की विदाई के वक्त महिलाएं अपनी आंसूओं को पोंछती नजर आती हैं। महिलाएं देवी के माथे पर सिंदूर लगाती हैं उसके बाद वे खुद एक दूसरे के माथे पर सिंदूर लगाती हैं जोकि शादीशुदा होने की निशानी है और अंत में वे एक दूसरे को शुभो विजया की बधाई देती हैं।
विसर्जन जुलूस निकलने से पहले विवाहित महिलाएं पंडाल में जमा होकर देवी दुर्गा की पूजा करती हैं। यहां पर सिंदूर खेला शुरू होता है जहां विदाई के वक्त एक दूसरे के बालों में सिंदूरी रंग लगाया जाता है जो वैवाहिक संबंध को मजबूत करता है। विजया दशमी के दिन ये रस्में घरों में परिवार के साथ और दोस्तों और अपने शुभचिंतकों के साथ मनाया जाता है।
यह कोई सोच भी नहीं सकता है कि स्पेशल त्योहार शुभो विजया के दिन स्वादिष्ट मिठाइयां नहीं बने। यह पारंपरिक प्रथा है कि लोग दोस्तों और रिश्तेदारों के यहां घर की बनी मिठाई और नमकीन को ले जाते हैं। कुछ पारंपरिक व्यंजनों में मालपुआ जोकि आटा, दूध और चीनी के मिश्रण से बनाया जाता है और निमकी भी एक प्रसिद्ध व्यंजन है को दोस्तों और रिश्तेदारों में बांटा जाता है। लेकिन अब के समय ये मिष्ठान बनाने की प्रथा धीरे धीर खत्म हो रही है और अधिकतर लोग अब बाजार से रेडिमेड मिठाइयां और नमकीन खरीद लाते हैं।
विजयदशमी के दिन नीलकंठ पक्षी को देखना शुभ माना जाता है। नीलकंठ पक्षी सुंदर और उसका गला नीला होता है, इसी कारण उसे नीलकंठ कहा जाता है। इस पक्षी में लोग विषपायी शिव के दर्शन करते हैं। आत्मजयी जब विजय के लिए निकलेगा तो उसे बहुत सा गरल पीना पड़ेगा। यह गरल अपयश का है, लोकनिंदा का है और सबसे अधिक लोकप्रियता का है। आज इस गरल को पीने के लिए कोई तैयार नहीं हैं।