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रामलीला विदेशों में

रामलीला का रंग मंच सिर्फ भारत में ही नहीं होता है बल्कि इसका रंगमंच विश्व के अनेक देशों में भी होता हैं। जिस किसी भी देश में हिन्दुओं की जनसंख्या है वहां रामलीला का रंगमंच होता है।

एशिया के विभिन्न देशों में रामलीला के अनेक नाम और रुप हैं। उन्हें प्रधानत: दो वर्गों में विभाजित किया जा सकता है- मुखौटा रामलीला और छाया रामलीला। मुखोटा रामलीला के अंतर्गत इंडोनेशिया और मलेशिया के 'लाखोन', कंपूचिया के 'ल्खोनखोल' तथा बर्मा के 'यामप्वे' का प्रमुख स्थान है। इंडोनेशिया और मलयेशिया में 'लाखोन' के माध्यम से रामायण के अनेक प्रसंगो को मंचित किया जाता है।

कंपूचिया में रामलीला का अभिनय ल्खोनखोल के माध्यम के होता है। 'ल्खोन' इंडोनेशाई मूल का शब्द है जिसका अर्थ नाटक है। कंपूचिया की भाषा खमेर में खोल का अर्थ बंदर होता है। इसलिए 'ल्खोनखोल' को बंदरों का नाटक या हास्य नाटक कहा जा सकता है। 'ल्खोनखोल' वस्तुत: एक प्रकार का नृत्य नाटक है जिसमें कलाकार विभिन्न प्रकार के मुखौटे लगाकर अपनी-अपनी भूमिका निभाते हैं।

मुखौटा नाटक के माध्यम से प्रदर्शित की जाने वाली रामलीला को थाईलैंड में 'खौन' कहा जाता है। इसमें संवाद के अतिरिक्त नृत्य, गीत एवं हाव-भाव प्रदर्शन की प्रधानता होती है। 'खौन' का नृत्य बहुत कठिन और समय साध्य है। इसमें गीत और संवाद का प्रसारण पर्दे के पीछे से होता है।

बर्मा की मुखौटा रामलीला को यामप्वे कहा जाता है। बर्मा की रामलीला स्याम से आयी थी। इसलिए इसके गीत, वाद्य और नृत्य पर स्यामी प्रभाव को नकारा नहीं जा सकता, किंतु वास्तविकता यह है कि बर्मा आने के बाद यह स्याम की रामलीला नहीं रह गयी, बल्कि यह पूरी तरह बर्मा के रंग डूब गयी। रामलीला आरंभ होने के पूर्व एक-दो घंटे तक हास-परिहास और नृत्य-गीत का कार्यक्रम चलता रहता है।

थाईलैंड में छाया-रामलीला को 'नंग' कहा जाता है। नंग के दो रुप है- 'नंगयाई' और 'नंगतुलुंग'। नंग का अर्थ चर्म या चमड़ा और याई का अर्थ बड़ा है। 'नंगयाई' का तात्पर्य चमड़े की बड़ी पुतलियों से है। इसका आकार एक से दो मीटर लंबा होता है। इसमें दो डंडे लगे होते हैं। नट दोनों हाथों से डंडे को पकड़कर पुतलियों के ऊपर उठाकर नचाता है।





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