रामलीला में भगवान राम के जीवन का जो वर्णन रामायण महाकाव्य में लिखा हुआ है उसका हू ब हू नाटक के रूप में पर्दे पर प्रदर्शित किया जाता है। रामलीला का मंचन पूरे उत्तर भारत में प्रत्येक वर्ष पारंपरिक कैलेंडर के अनुसार सितंबर और अक्टूबर माह में दशहरा पर्व के दौरान होता है। रामलीला के मुख्य प्रतिनिधिय अयोध्या, रामनगर और बनारस, वृंदावन, अलमोड़ा, सतना और मधुबनी है।
रामलीला में रामायण का स्वरूप पूरी तरह रामचरित्रमानस पर आधारित है, जोकि उत्तर भारत में कथा कहने का एक बहुत ही प्रचलित माध्यम है। राम के गौरव का वर्णन तुलसीदास ने 16वीं सदी में ब्रजभाषा में किया था ताकि इस महाकाव्य को सभी लोगों तक सरल भाषा में पहुंचाया जा सके। रामलीला प्रोग्राम में अधिकतर संभाग रामचरित्रमानस से लिया गया है जिसका मंचन दशहरा के दौरान पहली से लेकर दसवें दिन तक होता है, लेकिन रामनगर में रामलीला एक महीने तक चलता है।
दशहरा पर्व के दौरान हर एक गांव, शहर में भगवान राम के वनवास से लेकर अयोध्या वापस आने पर आधारित नाटक मंच का आयोजन किया जाता है। रामलीला में प्राय: राम के बचपन से लेकर वनवास जाने और राम रावण के बीच युद्ध का मंचन होता है। इस नाटक में जो लोग प्रतिनिधित्व करते हैं वे पूरी तरह अपने अपने रोल के मुताबिक वस्त्र भी धारण करते हैं। रामलीला के लिए शहर में एक विशाल पंडाल का निर्माण किया जाता है। इसको देखने के लिए पंडाल में भारी भीड़ उमड़ पड़ती है। बच्चे हांे या बुढ़े दोनों रामलीला की एक झलक पाने को बेचैन रहते हैं। रामलीला एक ऐसा मंच जो जाति, धर्म और उम्र का भेदभाव किए बिना समाज के हर वर्ग को एक दूसरे के करीब लाता है।
आज की भाग दौड़ भरी जिंदगी में भी रामलीला का महत्व कम नहीं हुआ है। देश की राजधानी दिल्ली में नवरात्रि के आरंभ से ही रामलीला की शुरूआत हो जाती है। दिल्ली के लाल किले के सामने और रामलीला मैदान में रामलीला पूरे धूम धाम से मनाया जाता है। आज कल रामलीला का स्टाइल बदल गया है। रंगमंच पर संवाद प्रस्तुत करने का स्टाइल में अब स्थानीय भाषा का प्रयोग के साथ साथ संगीत का भी मिश्रण हो गया है और रंगमंच पर रामलीला में प्रतिनिधित्व करने वाले व्यावसायिक कलाकार को मंडली कहते हैं।