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Janmashtami Janmashtami यह हैं कुछ कविताएं जो भास्कर के पाठकों ने भेजी हैं। राधा-कृष्ण-मीरा या जन्माष्टमी पर केंद्रित कीजिए अपना मन और आप भी कुछ पंक्तियां कह डालिए। सामयिक और समकालीन भाव-भंगिमा हो तो क्या कहना.. और तत्काल भेज दीजिए हमें। चुनिंदा अच्छी कविताओं, क्षणिकाओं, त्रिवेणियों या हाइकू को हम वेबसाइट पर ऑनलाइन करेंगे और पढ़ेंगे सब.. (ध्यान रखें कविता की लंबाई ज्यादा न हो)हमें अपनी कविताएं इस पते पर भेजें... editorbhaskar at bhaskar dot com
कृष्ण के रूप में जो अजन्मा है
जन्म लेता है मानव के रूप में
लोगों के हृदय और आस्था में
प्रेम डूबी राधा के लिए
भक्ति में डूबी मीरा के लिए
सुदामा जैसे सखा के लिए और
कंस जैसे शत्रु के लिए
जो अजन्मा है वह भी जन्म लेता है
इसी धरती पर
कृष्ण के रूप में मानवता की रक्षा करने।
डॉ. सुश्री शरद सिंह एम-111, सागर(मप्र)
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अली री क्या सुनती हो ये मधुर मोहिनी स्वर
लगता है बंशी पर कान्हा ने रख दिए अधर..
अंग-अंग मे मेरे सर उठा रही है थिरकन,
बंशी की तान पर झूम रहा नागिन सा तन ,
हो गया सखी जाने क्या जादू ये मुझ पर
लगता है बंशी पर कान्हा ने रख दिए अधर..
उठ रही है मन मे मेरे मस्ती भरी तरंग,
जी चाहता है झूमूं मैं भी सारी धरती के संग,
हाय ! उतावला इतना हो रहा मन क्यों कर
लगता है बंशी पर कान्हा ने रख दिए अधर..
पूष्प मुस्कुराते हैं, पंछी भी चहचहाते हैं,
क्या वृक्ष, क्या पौधे, सब झूम के लहलहाते हैं,
आज उत्सव क्या ये चल रहा है धरा पर
लगता है बंशी पर कान्हा ने रख दिए अधर..
ऋषिकेश खोड़के रूह
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वह दिवस बस आखिरी था
आखिरी अवसाद का
अष्टमी में आठवां था
अवतरण अनुनाद का
आठ तालों में हुआ जब
जन्म माखनचोर का
शोर जमुना से उठा तब
धरती के आल्हाद का..
तपेश सक्सेना, पुणे
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अजूबा आज फिर कर दो मेरा रंग राख-सा कर दो
दिखूं न मैं दिखो न तुम जहां को खाक-सा कर दो
चलो फिर से चलें बृज में नया इक रास रच लें हम..
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राधे कृष्ण
राधे श्याम..
..मीरा बेनाम
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न राधा तू न मैं कान्हा न दुनिया आज वैसी है
तुझी से मैं बना ऐसा मुझी से तू भी ऐसी है
खुदा किसको यहां बनना बशर तो कम से कम हो लें..
- उपासना अरोरा, दिल्ली
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जब अबलाएं अभी तक रो रही हैं तो
अभी तक शील अपना खो रही हैं तो
तुम अब अवतार लेते क्यों नहीं हो कृष्ण..
इशारा भीम तुमसे चाहते हैं कृष्ण
कई अर्जुन तुम्हारी राह तकते हैं
कहीं अब प्रेम की मुरली नहीं बजती
बड़े रूखे बड़े कर्कश-से रस्ते हैं
कभी आए कबीरों की तरह से तुम
कभी आए विवेकानंद बनकर तुम
तुम्हीं आए थे गांधी का चलन लेकर
चले आओ कोई फिर रूप धरकर तुम
चले आओ तुम्हारी अब जरूरत है
तुम अब अवतार लेते क्यों नहीं हो कृष्ण..
- भवेश दिलशाद
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अब की जन्माष्टमी पर काश फिर हो कृष्ण का जन्म
कलयुग के भी टलें तभी सब बेइमानी दुष्कर्म..
प्रेम अर्थ फिर समझे हर राधा हर श्याम
मिटे स्वार्थ और काम का निशदिन बढ़ता अधर्म..
सब गाएं मंगल गीत और हो रंगों की बौछार
जन्माष्टमी का त्योहार सिखाए सबको जीवन धर्म..
-दीक्षा हिमिका, भोपाल
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