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कृष्ण समाजवादी थे, व्यक्तिवादी नहीं : नीतीश

मुंबई. राजनीति का स्वरूप बिगड़ रहा है और वह समाज की चिंता छोड़कर व्यक्ति आधारित होती जा रही है। ऐसे में यह समझना जरूरी है कि कृष्ण के आदर्श और सिद्धांत कितने सामयिक हैं क्योंकि कृष्ण ने स्वयं को एक समाजवादी के रूप में प्रस्तुत किया है, व्यक्तिवादी के रूप में नहीं। जन्माष्टमी के मौके पर भवेश दिलशाद से बातचीत करते हुए अपने विचार रखे बीआर चोपड़ा निर्देशित मशहूर धारावाहिक महाभारत मंे भगवान श्रीकृष्ण का चरित्र परदे पर जीवंत करने वाले कलाकार नीतीश भारद्वाज ने..

भगवान श्रीकृष्ण के रूप में अगर कोई जीवंत छवि बन पाई तो वह नीतीश भारद्वाज की थी। अब उसका कितना प्रभाव है और आप कैसा अनुभव करते हैं?

मुझे लगता है कि उस छवि का प्रभाव अब तक है। इसका प्रमाण यह है कि मुझे इस साल जन्माष्टमी पर कृष्ण के दर्शन के प्रभाव पर लेक्चर देने के लिए अमेरिका से आमंत्रण मिला है। और सच पूछिए तो मैंने अक्सर यही महसूस किया है कि नीतीश भारद्वाज से ज्यादा आकर्षण भगवान श्रीकृष्ण का ही रहा है।

कृष्ण की भूमिका निभाते हुए कृष्ण के चरित्र या दर्शन के किस पहलू से आप सर्वाधिक प्रभावित हुए?

अगर आप कृष्ण के दर्शन को पढ़ें और समझें तो ढेरों ऐसे पहलू हैं जिनसे आप प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकेंगे लेकिन अगर एक की ही बात करें तो मुझे जो सबसे ज्यादा प्रभावित करता है वह पहलू है आर्ट ऑफ लिविंग। कृष्ण जीवन जीना सिखाते हैं। जीवन जैसा है, उसे वैसा ही अपनाने की शिक्षा देते हैं। वे जीवन से विमुख होने का नहीं बल्कि कर्म पर अडिग रहने की कला सिखाते हैं और वह भी हंसते और मुस्कराते हुए।

महाभारत में कृष्ण का किरदार निभाने के दौरान घटा कोई स्मरणीय पल या घटना?

जी हां, हुआ यूं कि हमें महाभारत के युद्ध दृश्यों वॉर सीन की शूटिंग करना थी और पूरी टीम जयपुर में थी। महाभारत की लोकप्रियता इतनी थी कि आसपास के गांवों से 5000 से ज्यादा लोग शूटिंग देखने के लिए आए थे। समस्या यह हुई कि वे शूटिंग शुरू नहीं होने दे रहे थे और उन्हें 8-10 लोग उन्हें नियंत्रित भी नहीं कर पा रहे थे।

फिर आखिरकार मुझे बुलाया गया और आश्चर्य की बात यह थी कि मुझे देखकर उन सबका रवैया ही बदल गया। उनको मैंने समझाया कि यहां शूटिंग होना है और वे इसमें सहयोग करें। उन्होंने बिल्कुल वैसा ही करना शुरू कर दिया जैसा हमने कहा। बस उन्होंने एक शर्त रखी कि पहले मैं सारे बच्चों को आशीर्वाद दूं। शूटिंग चूंकि पहले ही करीब तीन घंटे लेट हो चुकी थी सो आखिरकार ऐसा करना पड़ा। उसके बाद सभी एक किनारे खड़े हो गए और शॉट्स लिए जा सके।

यह मेरा पहला अनुभव था, जब मुझे आभास हुआ कि भगवान श्रीकृष्ण की छवि का कितना प्रभाव है, लोगों के दिल में इस छवि के लिए कितना सम्मान है।

जी बेशक, ऐसा कहा जाता है कि अब तक दो कर्मयोगी हुए हैं, पहले भगवान श्रीकृष्ण और दूसरे स्वामी विवेकानंद। क्या आप विवेकानंद की भूमिका भी निभाना चाहेंगे? क्या अब तक ऐसी कोई चर्चा हुई है?

अभी तक ऐसे किसी प्रस्ताव पर बात नहीं हुई है। फिलहाल तो मैं एक फीचर फिल्म निर्देशित कर रहा हूं और उसी में व्यस्त हूं। लेकिन, ऐसा नहीं है कि दो ही कर्मयागी हुए हैं। यह किसी विचारक का अपना मत हो सकता है लेकिन भारतवर्ष ने कई कर्मयोगी पैदा किए हैं। और, भारत की धरोहर अब विश्व धरोहर हो चुकी भगवद्गीता में भी वर्णित है कि कई कर्मयोगी हो चुके हैं। और तो और इस विषय पर भी काफी बहस हो चुकी है।

कृष्ण का दर्शन राजनीति को किस तरह से एक आदर्श प्रारूप दे सकता है और इसकी प्रासंगिकता के बारे में आपका क्या विचार है?

राजनीति के साथ तो कृष्ण का दर्शन बिल्कुल घुला-मिला हुआ है। देखिए, पहले राज्य में राजगुरु और धर्मगुरु होते थे जो राजा को धर्म के अनुसार राजपाठ करने के निर्देश देते थे। यहां धर्म का अर्थ किसी मजहब विशेष से नहीं है। लेकिन, आज धर्म को छोड़कर राजनीति हो रही है और धर्म को दरकिनार कर होने वाली राजनीति पतन का शिकार होती ही है।

श्रीकृष्ण के समाज व्यवस्था या राज व्यवस्था संबंधी सिद्धांत देखिए तो पता चल जाएगा कि कृष्ण व्यक्तिवादी नहीं बल्कि समाजवादी और राष्ट्रवादी थे। द्वारका में जब उन्हाेंने राज्य स्थापित किया तो वहां लोकतांत्रिक प्रणाली अपनाई। उन्होंने व्यक्ति से पहले समाज और देश को महत्व दिया।

लेकिन अब राजनीति व्यक्ति केंद्रित हो रही है। उदाहरण के लिए अंबेडकर के बाद दलितों के लिए आवाज उठाने वाला कोई नहीं, सब अपनी रोटियां सेंक रहे हैं। मुझे लगता है कि टूटे सपनों पर आधारित इस राजनीति को बदलने के लिए समाज को भी जागरूक होना होगा।

जन्माष्टमी पर हमारे पाठकों के लिए आपके दो शब्द..

केवल धारावाहिक देखना और कृष्ण का आनंद लेना ही काफी नहीं है। इससे जीवन में कोई बदलाव नहीं आने वाला, कृष्ण को और उनकी चेतना को आत्मसात करने की जरूरत है। कृष्ण के मूल्यों, उनकी कला और गीता को समझें, उसे व्यवहार में अपनाएं।

कुछ खास बातें : नीतीश भारद्वाज महाभारत के बाद भारत के जनमानस में कृष्ण की छवि के रूप में विख्यात हैं। भारद्वाज इस जन्माष्टमी के मौके पर अमेरिका के ह्यूस्टन, सैन फ्रांसिस्को, स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के अलावा सिंगापुर में कृष्ण के जीवन और दर्शन विषयों पर 8 से 14 सितंबर के बीच व्याख्यान देंगे। वे राजनीति में करीब एक दशक से हैं और सांसद तथा मप्र भाजपा के महामंत्री पद पर रह चुके हैं।





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