Spotlight
Janmashtami Janmashtami वृंदावन. मथुरा से कुछ दूर स्थित मंदिरों के इस शहर की एक और पहचान है, और वह यह कि यहां कई धर्मशालाएं और भजन आश्रम भी हैं जो विधवाओं और परित्यक्ताओं को सहारा देने के लिए बनाए गए हैं।
विधवाएं और वे महिलाएं इन आश्रमों में रहती हैं जिन्हें उनके परिवारों ने किन्हीं कारणों से या बच्चों ने कैरियर बनाने के लिए त्याग दिया है। इनमें से खासकर युवा महिलाएं स्थानीय असामाजिक तत्वों से अपना शील बचाने के लिए निरंतर संघर्ष कर रही हैं। यहां कई मंदिरों में आश्रमों की अनेक महिलाएं दिन भर और शाम को कृष्ण और राधा की आराधना करती हैं, इन्हें सेवादासी भी कहते हैं। हालांकि इनके संपर्क में धर्मशालाओं, आश्रमों के संचालक, पुजारी और कुछ दानदाता हैं लेकिन फिर भी इन्हें खुद को बचाने के लिए अंतिम रूप से भगवान कृष्ण का ही सहारा है।
एक महिला आश्रम की संचालक वंदना जैन का कहना है कि शीलभंग से संबंधित कई मामले सुनने में तो आते हैं लेकिन हमारे यहां ऐसा कभी नहीं हुआ। अब तक किसी महिला ने ऐसी कोई शिकायत नहीं की है। वंदना का कहना है कि युवा वर्ग की विधवाएं मंदिर जाने में भी कतराती हैं क्योंकि उन्हें अपने शोषण का डर रहता है।
दूसरी ओर बालाजी आश्रम के केयरटेकर छलियाबिहारी उपाध्याय का कहना है कि कोई महिलाओं के साथ जबरदस्ती नहीं करता। आश्रम में उन्हें भोजन और कुछ धन भी दिया जाता है। वे यहां आती हैं और पूजापाठ कर भजन कीर्तन आदि सुनाती हैं।
समस्या और भी हैं, यहां महिलाएं पश्चिम बंगाल और दूसरे राज्यों से भी लाई गई हैं और इनमें से कई मानव तस्करी की शिकार भी हैं। वृंदावन नगरपालिका के सर्वे में विधवाओं की संख्या 3105 बताई गई है जबकि एक अनुमान के हिसाब से यहां पांच से छह हजार विधवाएं हैं।
विधवाओं की पीड़ा :आश्रम के अंदर तो कोई शोषण नहीं होता लेकिन बाहर तो हमेशा ही भीड़ तैयार रहती है। इसलिए हम आश्रम में हैं। हम अपना परिवार, घर, पति और बच्चों को छोड़ चुके हैं तो लोग हमारे चरित्र पर शक करते हैं। लेकिन, मुझे लगता है इस स्थिति को बदला नहीं जा सकता है क्योंकि यह लोगों के दृष्टिकोण की बात नहीं बल्कि उनके स्वभाव का हिस्सा बन गया है।गौरी राय
हम यहां भजन गाते हैं और रोजाना हमें बाकी चीजों के साथ ही दाल और चावल मिल जाते हैं। हम इससे ज्यादा कुछ मांग नहीं सकते क्योंकि हमारे जैसे गरीब और मांग भी क्या सकते हैं। बस, हम खुश हैं, संतुष्ट हैं।सुनंदा हलदार
हालात ऐसे हैं : यहां 50 प्रतिशत से ज्यादा विधवाएं भजन आश्रमों पर ही निर्भर हैं और भिक्षा मांगकर जीवन यापन कर रही हैं। कुछ तो इतनी बूढ़ी हैं कि वे अपना काम भी खुद कर पाने में अक्षम हैं। मृत्यु के बाद भी उन्हें पीड़ा भोगनी पड़ती है। इनके सहारे के रूप में किसी संस्था का आगे न आना अफसोस की बात है, यहां तक कि इनकी बीमारी में इलाज भी दान दक्षिणा का मोहताज है।
वृंदावन में कान्हा की धूम
कृष्ण प्रेमियों का एक बड़ा समूह इस धार्मिक शहर के विभिन्न मंदिरों में दिखाई दे रहा है और सभी झूलन महोत्सव का आनंद ले रहे हैं।
हिंदू मान्यताओं के हिसाब से श्रावण माह में यह महीने भर का उत्सव बड़े ही उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस महोत्सव में कृष्ण और राधा के प्रेम पर आधारित लीलाओं का आयोजन होता है। महोत्सव का समापन श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर होगा और इसके समापन की जोरदार तैयारियां कई मंदिरों में की गई हैं। मथुरा से सिर्फ 15 किमी दूर स्थित वृंदावन में कृष्ण प्रेम की लहरें इतनी उमंग भरी हैं कि यहां देश भर के श्रद्धालु और विदेशी पर्यटक भी बड़ी संख्या में आ रहे हैं।
यहां कई मंदिरों में बड़े बड़े झूलों पर कृष्ण और राधा के छोटी छोटी मूर्तियां रखकर रोजाना पूजा अर्चना की जा रही है और कृष्ण प्रेमी भजन आदि कर रहे हैं। कुछ स्थानों पर कृष्ण लीलाओं का आयोजन भी किया जा रहा है।