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Kishor Kumar Kishor Kumar मुंबई.
किशोर कुमार की जादुई आवाज भले ही आज से 20 साल पहले खामोश हो गई लेकिन आज भी यह आवाज लाखों संगीत प्रेमियों के दिल में इस कदर बसी हुई है कि इसकी गूंज सदियों तक कायम रहेगी। हिंदी सिनेमा के इस सदाबहार गायक ने 13 अक्टूबर 1987 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया था। आज किशोर कुमार की 20 वीं पुण्यतिथि है। लाखों दिलों पर राज करने वाली आवाज के नायक किशोर कुमार को भॉस्कर डॉट कॉम की ओर से एक श्रद्धांजलि।
युवा पीढ़ी के चहेते गायक
किशोर आज इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी आवाज आज भी लोगों के दिल और दिमाग पर एक जुनून की तरह छाई हुई है। किशोर दा आज भी युवा पीढ़ी के चहेते गायक है। किशोर दा ने हिंदी और बंगाली के अतिरिक्त मराठी, असमी, गुजराती, कन्नड़, भोजपुरी, मलयालम और उड़िया में भाषा में भी गीत गाकर लाखों लोगों के दिल में अपनी जगह बना ली। 1950 से 1970 के बीच वे मोहम्मद रफी और मुकेश के साथ देश के टॉप थ्री प्ले बैक सिंगर की सूची में शामिल थे। किशोर दा की खासियत थी कि फिल्म के हीरो के मुताबिक वे अपनी आवाज निकाल लेते थे। राजेश खन्ना, देवानंद या अमिताभ, किशोर दा के गाए गीतों को सुनकर आप सहज अंदाज लगा सकते हैं कि यह गीत किस फिल्मकार के लिए गाया गया है।
जन्म
किशोर कुमार का जन्म चार अगस्त 1929 को खंडवा में एक बंगाली परिवार में हुआ था। किशोर दा का पूरा नाम आभास कुमार गांगुली था। किशोर दा बचपन से ही प्रख्यात गायक केएल सहगल के प्रशंसक थे। वे सहगल को अपना गुरु मानते थे।किशोर कुमार के बड़े भाई अशोक कुमार सुपर स्टार थे। किशोर कुमार अक्सर अशोक कुमार के पास मुंबई आना होता था।
किताब की जगह तबला और हारमोनियम
किशोर को संगीत का शौक बचपन से ही था। इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में जब वे होस्टल में रहकर पढ़ाई करते थे तो उनके कमरे पर किताबों की जगह तबला, ढोलक और हारमोनियम ही नजर आते थे। क्लॉस में सबसे पिछली बेंच पर बैठकर किशोर कुमार अक्सर अपनी उंगलियों से डेस्क पर तबला बजाते रहते थे।
खंडवा से बेहद लगाव
किशोर कुमार को खंडवा से बेहद लगाव था। वे अपने जीवन के अंतिम दिन खंडवा में ही बिताना चाहते थे। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो सका। लेकिन उन्हीं के गाए गानों की पंक्तियां सच हो गई । जिंदगी एक सफर है सुहाना, यहां कल क्या हो किसने जाना। किशोर दा अक्सर कहते थे कि फिल्मों से रिटायर होकर खंडवा में बस जाउंगा। उनकी इच्छा थी कि उनका अंतिम संस्कार खंडवा में हो जिसे पूरा किया गया। वे अक्सर अपने स्टेज शो की शुरुआत कुछ इस प्रकार करते थे। मेरे दादा दादियों,मेरे नाना नानियों,मेरे भाई बहनों,तुम सबको खंडवा वाले किशोर कुमार का नमस्कार और राम-राम।
फिल्म शिकारी में पहला मौका मिला
फिल्म इंडस्ट्री में किशोर कुमार की शुरुआत एक अभिनेता के रूप में फिल्म शिकारी (1946) से हुई। इस फिल्म में उनके बड़े भाई अशोक कुमार ने लीड रोल निभाया था। इसके बाद फिल्म जिद्दी (1948) में उन्हें पहली बार गाने का मौका मिला। किशोर की प्रतिभा देखकर उन्हें ऑफर मिलने लगे। इसके बाद किशोर कुमार ने मुंबई में रहने फैसला किया। 1949 में वे मुंबई आ गए। फनी मजूमदार के निर्देशन में फिल्म आंदोलन (1951) में किशोर दा को पहली बार बतौर हीरो काम करने का मौका मिला। इसके बाद किशोर दा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा।
बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे किशोर दा
किशोर कुमार हर फन में माहिर थे। अभिनय और गायन तक ही उन्होंने अपने आपको सीमित नहीं रखा बल्कि निर्माता, निर्देशक, लेखक और संगीतकार के रूप में भी उन्होंने अपने जलवे दिखाए। किशोर दा ने कुल 81 फिल्मों में अभिनय किया। इनमें पड़ोसन, हॉफ टिकट, चलती का नाम गाड़ी, दिल्ली काठग आदि प्रमुख हैं। उन्होने कुल 574 फिल्मों में गाने गाए। किशोर दा ने 14 फिल्मों का निर्माण किया और इनकी कहनानियां भी लिखीं। इनमें से छह फिल्में पूरा नहीं हो पाईं। किशोर दा ने 12 फिल्मों का निर्देशन भी किया। एक म्यूजिक कंपोजर केरूप में भी उन्होंने कई लोकप्रिय गानों को कंपोज किया। इनमें कोई हमदम न रहा, आ चल के तुझे, बेकरार दिल तू गाए ज।
यूडलिंग को लोकप्रिय बनाया
यूडलिंग एक ऐसा शब्द जिसे सुनने के साथ ही जहन में किशोर दा कि छवि उभरती है। इसे लोगों तक पहुंचाने में किशोर दा की गायकी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यूडलिंग यानी गाना लेकिन बिना शब्दों के। दरअसल यूडलिंग की शुरुआत एक भाषा के रूप में हुई थी। आल्प्स पर्वत पर लोग एक जगह से दूसरी जगह कई किलोमीटर दूर तक अपनी आवाज यूडलिंग करके ही पहुंचाते थे। धीरे धीरे यह संगीत की दुनिया तक पहुंच गया।
गाने जिन्हें फिल्म फेयर अवार्ड मिले
किशोर कुमार ने अपनी गायकी के लिए आठ फिल्म फेयर अवार्ड जीता। पहला फिल्म फेयर अवार्ड उन्हें अराधना फिल्म के लिए मिला। इस फिल्म में रूप तेरा मस्ताना प्यार मों दीवाना गाने ने उनके चाहने वालों को दीवाना बना दिया था। इसी गाने के लिए किशोर दा को फिल्म फेयर अवार्ड दिया गया। आइए एक नजर डालते हैँ किशोर दा को मिले फिल्म फेयर अवार्ड पर :
1969 :
फिल्म : अराधना
गाना : रूप तेरा मस्ताना, प्यार मेरा दीवाना
1975
फिल्म : अमानुष
गाना : दिल ऐसा किसी ने मेरा तोड़ा
1978
फिल्म : डॉन
गाना: खाइके पान बनारस वाला
1980
फिल्म : थोड़ी सी बेवफाई
गाना : हजार राहें मुड़ के देखी कहीं से कोई सदा न आई
1982
फिल्म : नमक हलाल
गाना : पग घुंघरू बांध मीरा नाचे
1983
फिल्म : अगर तुम ना होते
गाना: हमें और जीने की चाहत न होती
1984
फिल्म : शराबी
गाना : मंजिलें अपनी जगह हैं रास्ते अपनी जगह
1985
फिल्म : सागर
गाना: सागर किनारे दिल ये पुकारे
चार शादियां की:
किशोर दा ने चार शादियां की थी। उनकी पहली शादी रूमा देवी से हुई थी। रूमा देवी से अमित कुमार का जन्म हुआ। कुछ दिनों बाद रूमा देवी से किशोर की शादी टूट गई। इसके बाद चलती का नाम गाड़ी फिल्म की शूटिंग के दौरान मधुबाला से उनकी नजरें मिली । मधुबाला किशोर की अदाओं पर मिटीं और दोनों ने शादी कर ली। लंबी बीमारी के बाद मधुबाला का देहांत हो गया। मधुबाला देहांत के छह साल बाद उन्होंने योगिता बाली से शादी की। लेकिन यह शादी अधिक दिनों तक टिक नहीं पाई। इसके बाद किशोर कुमार ने लीना चंद्रावरकर से शादी कर ली।
किशोर दा के अजीब कारनामे
किशोर दा का व्यक्तित्व बेहद निराला था। वे इंडस्ट्री के लोगों से कुछ जुदा से इंसान थे। फिल्म इंडस्ट्री में किशोर दा को उनकी हरकतों को लिए सनकी, पागल, सिरफिरा भी कहा जाता था। आइए देखें क्या थी उनकी हरकतें जिनके कारण लोग उन्हें कई तरह के नामों से पुकारते थे।
पेड़ों से बातें:
किशोर दा की आदत थी कि वे पेड़ों से बातें करते थे। कई पेड़ों से उन्होंने दोस्ती कर रखी थी और वे उनसे बातें करते थें। कई पेड़ों का उन्होंने नाम भी रख दिया था। उनका मानना था कि इनसानों से अच्छा है पेड़ों से दोस्ती करना।
अंधेरे कमरे में डरावनी फिल्में देखने का शौक:
किशोर दा ने अपने लिए एक खास कमरा बनवा रखा था। इस अंधेरे कमरे में उन्होंने डरावनी फिल्मों की वीडियो कैसेट्स रखी थी और यहीं बैठकर वे डरावनी फिल्मों को देखा करते थे। इसके साथ ही वे घंटों तक कब्रिस्तान में बैठा करते थे।