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किशोर के साथ फॉर्म हाउस पर

खंडवा. 1957 में किशोर कुमार के साथ उन्हीं के फार्म हाउस पर शीला सोनवाने अपने भाई नारायण चंद्रे।

किशोर दा को कोई भूल ही नहीं सकता। शायद ही कोई ऐसा शख्स होगा जिसने उनके गाए गीत सुने या गुनगुनाए नहीं हों। हमेशा मस्ती व ठिठौली के मूड में रहने वाले किशोर जिससे भी मिलते, अपनी छाप छोड़ देते थे। ऐसा शख्स साल के 365 दिन लोगों के जेहन में जिंदा रहता हो उसके लिए इससे बड़ी याद और क्या हो सकती है।
यहां कल क्या हो किसने जाना!
किशोर कुमार की जादुई आवाज भले ही आज से 20 साल पहले खामोश हो गई लेकिन आज भी यह आवाज लाखों संगीत प्रेमियों के दिल में इस कदर बसी हुई है कि इसकी गूंज सदियों तक कायम रहेगी।
 
कढ़ी का शौक था किशोर को
अशोक कुमार, अनूप कुमार और किशोर कुमार कढ़ी के शौकीन थे। मुंबई में अच्छा छांछ नहीं मिलने के कारण वे जब भी खंडवा आते और जान-पहचान वालों के यहां भोजन करने जाते तो सबसे पहले कढ़ी ही मांगते थे। वह भी कटोरी या प्लेट में नहीं बल्कि बड़ी किनार वाली थाली में।
 
किशोर दा : कुछ खट्टी-मीठी यादें
सेठी नगर निवासी शीला सोनवाने बताती है 1972 में इंदौर में किशोरकुमार नाइट का आयोजन किया गया। खंडवा से किशोर ने दोस्तों को कार्यक्रम में बुलाया था। मैं और मेरे पति भी इंदौर...
 
एक ही कक्षा में हो गए थे दोनों भाई
मैं और अनूप कुमार न्यू हाईस्कूल में एकसाथ पढ़ते थे। अनूप कुमार मेट्रिक में तीन बार फैल हो गया था। किशोर कुमार मेरे से दो साल छोटा था उसने मेट्रिक में अनूप कुमार को मिला लिया था किशोर कुमार पास होते गए और दोनों एक क्लास में हो गए।