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मातृत्व के इस सफर की कहानी, मांओं की जुबानी

मदर्स-डे स्पेशल.हर स्त्री के भीतर उमंगों में डूबी एक मां है। यह एक सफर है लंबा, जिसमें ढेर सारे उतार-चढ़ाव और मुकाम हैं। पहला मुकाम वह होता है, जब दिल के दरवाजे पर नन्हे मेहमान की पहली दस्तक होती है। फिर चलता है दौर एक नन्हे के मन को मÊाबूती से गढ़ने का। फिर आता है वह पड़ाव, जब बेटा नौकरी के लिए घरोंदे से बाहर दुनिया में पहला कदम रखता है और बेटी घर से विदा होती है। फिर जब मां की बेटी खुद मां बनने की राह पर पहला कदम बढ़ाती है, तब नानी के भीतर एक और मां का जन्म होता है। मातृत्व के इस सफर की कहानी, मांओं की जुबानी। मनीषा पांडेय की रिपोर्ट

आजकल पांव जमीं पर नहीं पड़ते मेरे

अपनी मुस्कराहट और अभिनय से लोगों के दिल पर राज करने वाली अभिनेत्री रेणुका शहाणो अभिनेत्री से भी पहले दो नन्हे बच्चों की मां हैं। वो मां ही होना चाहती थीं। रेणुका के शब्दों में ‘मां होने का एहसास बहुत अनोखा होता है। कुछ थोड़े से शब्दों में इसे बयां कर पाना उतना ही मुश्किल है, जैसे रेत की छननी से पानी छानने की कोशिश करना। कितने सारे ऐसे एहसास होंगे, जो अनकहे ही रह जाएंगे। जब मैंने आशुतोष से शादी करने का निर्णय लिया तो उसके पीछे सबसे बड़ा और निर्णायक कारण मेरी मां बनने की इच्छा ही थी।

आशुतोष को हालांकि बच्चे बहुत पसंद नहीं थे, और शादी के पहले तो बिल्कुल भी नहीं। साथ ही इतनी जल्दी वो इस निर्णय के लिए तैयार भी नहीं थे, लेकिन मेरी मां बनने की तमन्ना का उन्होंने पूरा सम्मान किया। मैं एक स्वतंत्र और आत्मनिर्भर स्त्री थी। पर मां बनने की पहली आहट के साथ ही मैंने सारे शूटिंग असाइनमेंट कैंसिल कर दिए और खुद को आने वाली जिम्मेदारियों के लिए तैयार करने लगी। नौ महीने घर पर ही रही। मैं आराम करती और खूब अच्छी-अच्छी किताबें पढ़ती। शोर्यमन के जन्म में मुझे जीवन का अर्थ दिया।

जूही मेरी आंखों का नूर है

रंगमंच की अभिनेत्री और जाने-माने अभिनेता राज बब्बर की पत्नी नादिरा बब्बर मातृत्व के सफर के दूसरे मुकाम पर हैं। बेटी अपना संसार बसा चुकी है और मां नई Êिाम्मेदारियों के सपने सजा रही है। कैसा था बेटी की विदाई का पल और उस पल मां होने का एहसास। बता रही हैं नादिरा बब्बर।‘मैं जीवन के तमाम चरणों से गुजरती हुई आज इस मुकाम तक पहुंची हूं पहले मैं किसी की बेटी थी, फिर पत्नी बनी। फिर एक दिन जीवन की सबसे बड़ी जिम्मेदारी का एहसास हुआ, मेरी बिटिया का जन्म हुआ। मैं मां बनी और जूही मेरी गोद में आई। उसे एक-एक पल पाल-पोसकर बड़ा किया। उसके साथ जीवन को हर दिन नए सिरे से जिया।

जीवन हमेशा एक-सा नहीं होता। उतार-चढ़ाव, सुख और दुख का रेला तो आता-जाता रहता है। जीवन में कुछ बुरा वक्त भी आया और गुजर गया। मेरे ऊपर दो-दो बच्चों की जिम्मेदारी थी। मैं सब कुछ से हाथ पीछे खींच लेती, लेकिन मां होने से कैसे। मेरे भीतर की मां मुझसे पहले अपने होने को लेकर सचेत थी। उसे अपने बच्चों की फिक्र थी। मैंने जूही और आर्य दोनों को बड़े जतन से पाला। उनकी हर जरूरतें पूरी कीं।

मेरी हमेशा कोशिश होती थी कि मैं उनकी हर उम्मीद पर, मां के हर कर्तव्य की कसौटी पर खरी उतर पाऊं। मैं कितनी सफल हूं, ये तो मेरे बच्चे ही बता पाएंगे।

बिटिया की विदाई का वो पल

अगर आपकी बेटी है तो कभी न कभी वह क्षण तो आता ही है, जब बेटी डोली में बैठकर विदा होगी। यहां से उसकी एक नई जिंदगी की शुरुआत होती है, और यह सारी बातें मां उन दिनों की याद में ले जाती हैं, जब वह एक दिन ऐसे ही अपनी मां के घर से डोली में बैठकर विदा हुई थी।

बेटी की सफलता है मां की सार्थकता

अब तक बेटी आपके पास, आपकी सुरक्षा के साए में थी। अब वह जिंदगी के रंगमंच पर उतर रही है। अब यही दुआ है कि जो मैंने उसे सिखाया, वो आने वाली पीढ़ियों तक स्थानांतरित हो। मेरी बिटिया मेरा गौरव है। उसकी शुक्रगुजार हूं कि उसमें मुझे मां होने का गौरव दिया। यह मौका दिया कि मैं उस दिव्य एहसास से गुजर पाऊं।

मेरे प्रेम का प्रतीक हैं मेरे बच्चेमां होना जीवन की सबसे खूबसूरत अनुभूति है। यह सृजन की अनुभूति है। एक नए जीवन के निर्माण की अनुभूति। सृजन की यह शक्ति सिर्फ ईश्वर के पास है और उस ईश्वर ने यह ताकत सिर्फ स्त्री को प्रदान की है।

मैं जब पहली बार मां बनी तो मैंने ईश्वर को धन्यवाद दिया और उसके प्रति इतनी असीम कृतज्ञता महसूस की। सृजन की वह अनुभूति पारलौकिक है। वह इस दुनिया से परे है। मुझे और धर्मवीर भारती जी को बच्चों से अथाह स्नेह था। हमारे तीन बच्चे हुए। सबसे बड़ी बेटी पार्मिता बंगलौर में है। बेटा किंशुक अमेरिका में और सबसे छोटी बेटी प्रज्ञा, जो जर्नलिस्ट है, वो मुंबई में ही है।

आज मैं दादी-नानी बन गई हूं। मेरी सबसे बड़ी बेटी का बेटा खुद २२ साल का है। जब अपने बच्चों को उन्हीं मूल्यों और संस्कारों की राह पर चलते देखते हैं तो असीम संतोष होता है। पार्मिता के बेटे की जब नौकरी लगी तो अपनी पहली तनख्वाह के पैसों से उसने अपने सभी छोटे भाई-बहनों को पांच-पांच हजार रु. दिए। हमने अपने बच्चों को हमेशा सिखाया, जो भी हो उसे आपस में मिल-बांटकर इस्तेमाल करना। अपने से छोटों का ख्याल करना।

मेरी बेटी ने वो संस्कार अपने बच्चों को दिए। ऐसा महसूस होता है कि नाती-पोतों के रूप में मेरे और धर्मवीर भारती जी के संस्कार ही रूपांतरित हो रहे हैं। मैंने और धर्मवीर जी ने अपने बच्चों को हमेशा इस तरह से पाला कि उनके ऊपर कभी खुद को लादा नहीं। मूल्य, संस्कार जरूर हमारे थे, लेकिन जीवन उनका स्वतंत्र था। हम उनकी मदद करते थे, लेकिन अपने निर्णय उन्होंने खुद लिए। हमने कभी उन्हें इस बात का एहसास नहीं होने दिया कि वह अपने ऊपर या अपनी संपन्नता पर कोई मिथ्या गर्व करें। सबकुछ के बावजूद पैर जमीन पर थे। बच्चों ने मेहनत करना और अपने बलबूते अपना जीवन बनाना सीखा।





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