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मां से बेटीदूर कहां!

दुनिया के सबसे नाज़ुक और सबसे मज़बूत रिश्ते के बारे में पूछिए, दोनों का जवाब एक ही मिलेगा, मां-बेटी का रिश्ता। एक मां की गोद में नन्ही कली के आते ही उसकी दुनिया बदल जाती है। अपने इस प्रतिरूप को बढ़ते, फलते-फूलते देखने से •यादा सुखद अहसास दूसरा नहीं हो सकता। बिटिया रानी के बाल बनाती, उसके लिए मनपसंद कपड़े चुनती, उसके साथ बालिका-सुलभ खेल खेलती, हठ पूरे करती, मां जैसे एक बार फिर अपना बचपन जी लेती है।

इतना मज़बूत, बिना शर्त प्यार पर टिका, यह मीठा-सा रिश्ता, कभी-कभी तो उम्र के साथ और गहरा हो जाता है, वहीं कभी वक्त मानो ग्रहण बनकर आता है। न जाने क्यों और कहां से मां-बेटी के बीच कुछ मसले आ खड़े होते हैं और कहा-सुनी, तकरार और झगड़ों के स्वर तेज़ होने लगते हैं। रिश्ते में एक अनकही-सी दूरी आ जाती है। भरोसा और प्यार शक के घेरे में आने लगता है। हालांकि समाज में इस रिश्ते को इतना गहरा और भावनापूर्ण माना जाता है कि अमूमन इन बातों को कोई गम्भीरता से नहीं लेता लेकिन दिक्कतें तो हैं ही।

शैफाली को ही लें। एम.बी.ए के लिए उसका दूसरे शहर के कॉलेज में चयन हो गया। हॉस्टल के बजाय उसने रूम लेकर रहना मुनासिब समझा। मां यह सोचकर कि बेटी वहां अकेली है, शैफाली के पास रहने चली आईं। शेफाली यहां अपनी मर्ज़ी से रहने की आदी थी पर मां ने आते ही उसके कमरे को अपने ढंग से सजाया। अब मां की यह शिकायत रहती है कि शैफाली बहुत आलसी है, वह अपना कमरा साफ नहीं करती, अपनी चीज़ें जगह पर नहीं रखती। पहले-पहल तो शैफाली ने अपना बचाव करना चाहा लेकिन आखिर एक दिन वह बिफर पड़ी और उसने कह दिया, ‘मां, देखती तो हो कि मेरे पास समय कहां रहता है? अब मैं कोई छोटी बच्ची नहीं रही। हमेशा की टोका-टाकी मुझे पसंद नहीं।’ बस इसके बाद तो आंसुओं में डूबे गिले-शिकवों का वह दृश्य निर्मित हुआ कि पूछिए मत। ऐसे ही कई और कारण बड़ी होती बेटियों और मांओं के बीच दीवार बनकर खड़े हो जाते हैं। दोनों को ही अपना पक्ष सही लगता है और हल कहीं नज़र नहीं आता।

मां की ख्वाहिश

यह मामला एक हद तक पीढ़ियों के अंतर का है। ‘हमारे समय तो ऐसा होता था’ या ‘हमने तो कभी ऐसा नहीं कहा’, जैसे वाक्य अक्सर बेटियों के सुनने को मिलते हैं और बेटियां चिढ़ जाती हैं। जैसी जीवनशैली, संस्कार, काम का तरीका, रिश्तों के प्रति रवैया, मांओं ने अपनी मां से सीखा, वे चाहती हैं कि उनकी बड़ी होती बेटियां भी वह सब जानें-सीखें और जब वे पाती हैं कि बेटियों की ज़िंदगी में इन बातों की कहीं गुंजाइश ही नहीं बची, तो वे आहत होती हैं।

मां चाहती है कि बेटी व्यवस्थित जीवन-शैली अपनाए, सही समय पर शादी कर ले। मां टिफिन लगाकर देती है, बेटी ऑफिस कैंटीन में पित्ज़ा खा लेती है। मां चाहती है छुट्टी के एक दिन बेटी घर में समय गुज़ारे, बेटी का कहना है कि उसे दोस्तों के साथ एंजॉय करने के लिए एक ही दिन मिलता है। मामला इसलिए •यादा उलझ जाता है क्योंकि दोनों स्त्रियां हैं और दोनों संवेदनशील हैं।

बेटी की अपेक्षाएंमधुलिका बताती है, ‘मुझे ऑफिस के काम से कई बार देर हो जाती है। मम्मा को यह सब पता है। वे मुझ पर विश्वास भी करती हैं लेकिन फिर भी उनकी पूछताछ और हिदायतें खत्म ही नहीं होतीं।’ कई लड़कियों को शिकायत है कि मां उनके ई-मेल या एस एम एस चेक करती हैं। वे जो पहनें, मां को उनके कपड़ों पर आपत्ति ही होती है। इसके अलावा बेटियां चाहती हैं कि मां नए ज़माने के हिसाब से अपडेट हों। उन्हें कार चलाने से लेकर चैटिंग तक सारे हुनर आने चाहिए। मां खुद को भी ग्रूम करें कि वे सहेलियों के बीच मां पर गर्व कर सकें। मां के रूप में वे सहेली चाहती हैं लेकिन वे पाती हैं कि जैसे-जैसे वे बड़ी हो रही है, मां एकदम पारम्परिक मां बनती जा रही है। ये दुविधा उन्हें हजम नहीं होती है।

हां, प्यार हैएक बात जान लें कि ऊपरी तौर पर भले ही कुछ परेशानियां नज़र आएं लेकिन ये मनमुटाव सतही ही है। कई शादीशुदा लड़कियों का अनुभव है कि जिन बातों के लिए मां उन्हें टोका करती थीं, अब वही बातें उनके बहुत काम आ रही हैं। दूसरी तरफ नौकरी या शादी के बाद बाहर रह रही बेटियों को याद कर मां की आंखें सजल हो जाती हैं। कहीं यह अंतर पीढ़ी का है, तो कहीं समझ या संवाद में कमी से उपजा है। दोनों खुद को उस जगह पर रखकर देखें, स्थिति अपने-आप स्पष्ट हो जाएगी। दरअसल, एक-दूसरे को सही ढंग से समझने और समझाने भर की देर है और लगेगा कि मिले हुए मनों में मनमुटाव की गुंजाइश ही कहां है-

मां को यह स्वीकार करना चाहिए कि अब उसकी बेटी बड़ी हो गई है और उसका अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व है। उसे स्पेस दें, उसके व्यक्तित्व और उसकी खूबियों का सम्मान करें।

यह जान लें कि अब वक्त बहुत बदल गया है। अब व्यक्ति की ज़रूरतें, चुनौतियां बिल्कुल अलग है। इन्हें जानने और समझने का प्रयत्न करें।स्वयं नए जमाने की बातों में दिलचस्पी दिखाएं, सीखें।

बेटियों से बचपन से ऐसा रिश्ता रखें कि वे बेझिझक आप से सबकुछ कह सकें। अगर खुद पूछना पड़े, तो कहीं अविश्वास नहीं झलकना चाहिए।बेटियां समझें कि चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों न हो जाएं मां के लिए वह बच्ची ही रहेंगी। उनकी हिदायतों में छुपी चिंता और परवाह को महसूस करें।मां से अपनी हर बात शेयर करें ताकि मां आप पर पूरा भरोसा कर सकें।

उनसे बात करते समय आपका स्वर और भाषा हमेशा सौम्य हो। बच्चों के कटु वचन मां को गहरे तक दुख पहुंचा जाते हैं। आखिर उन्होंने आपके लिए इतना कुछ किया है।

संस्कार, नियमितता, मूल्यों, जैसी बातें अपनाने से आपको फायदा ही होगा, नुकसान नहीं।रोज़ कम से कम आधा घंटा आपस में बात करें और हफ्ते में एक बार शॉपिंग, फिल्म या घूमने ज़रूर जाएं।

किसी भी रिश्ते की तरह इसमें भी सराहना की आवश्यकता होती है। एक-दूसरे के प्यार और परवाह की कद्र करें। आखिर आप दोनों खुशकिस्मत हैं कि दुनिया के सबसे प्यारे बंधन से बंधी हैं।

लेखिका मनोविशेषज्ञ है





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