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Mothers Day Mothers Day
नन्हे की हर पुकार पर हाज़िर रहने वाली मां,कभी उसकी पुकार को अनसुना कर दे तो बच्चे पर क्या गुज़रेगी? बच्च अपनी बात, जिद, भावनाएं मां से बेझिझक कह लेता है पर कई बार स्वभाव या परिस्थितियों के कारण मां अपने मनोभाव बच्चों के सामने व्यक्त नहीं कर पाती है। कुछ लम्हे होते हैं, जब हर पल साथ खड़ी मां चाहकर भी बच्चों से कह नहीं पाती, मैं हूं न।
उन्हीं पलों की भावनात्मक स्वीकारोक्ति के साथ अपने बच्चों को सम्बोधित करते मांओं के ढेर सारे पत्र हमें प्राप्त हुए। इन्हीं में चयनित खत यहां प्रस्तुत हैं..
प्यारे बेटे प्रत्युष,
तुम्हारे बचपन की बात है। तुम मुझे जब भी बाथरूम की ओर जाता देखते, मेरे पीछे-पीछे आकर मुझे शावर पाइप से भिगो देते। 3-4 साल की उम्र में यह तुम्हरा प्रिय खेल था। ऐसे ही एक दिन मैं बाथरूम में कपड़े भिगो रही थी और तुम बहुत ही उत्साहित होकर कुछ बताने के लिए मुझे ढूंढ रहे थे। तुमने दौड़-दौड़ कर हर कमरे में मुझे आवाज़ दी, ‘डाली मां, डाली मां’।
यहां तक कि रसोई, बालकनी तथा दूसरे बाथरूम में भी मुझे तलाश आए। संयोग से तुम उसी बाथरूम में नहीं आए, जहां मैं थी। मैंने तुम्हारी हर पुकार सुनी, लेकिन कहीं तुम आकर मुझे भिगो न दो, इसलिए उत्तर नहीं दिया। जब मैं बाहर आई, तुम एकदम सहमे-से मुझसे लिपटकर ज़ोर से रो दिए। बहुत रोए। शायद तुमने यह समझा कि मैं कहीं चली गई और तुम घर में अकेले हो। तुम्हारे उस खेल की अवहेलना करके और उस पुकार का प्रतिउत्तर न देकर जो मैं एक तरह से छुपी रही, उसी की वजह से तुम इतना रोए। बाथरूम से निकलने से पहले तक मुझे अंदाÊा नहीं था कि तुम्हारी शरारत से बचने का मेरे मन पर कैसा असर होगा। बच्चों का नटखटपन लुभाता भी है और कभी-कभी उन पर गुस्सा करने या उन्हें नज़रअंदाज़ करने का कारण भी बन जाता है। बच्चे तो ये सब भूल जाते हैं पर हमारे लिए यह कभी न भूलने वाली कसक बन जाती है।
डॉ. आदर्श मदान अजमेर (राजस्थान)
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प्रिय सार्थक,
तुम्हारा नाम जुबां पर आते ही मुझे 5-6 साल का भोला, नटखट बेटा याद आ जाता है। कल जब तुम्हारा रूड़की से फोन आया कि कैम्पस इंटरव्यू में एक बड़ी कम्पनी में अच्छे पैकेज पर तुम्हार चयन हो गया है और तुमने कहा कि यह सब आपके कारण ही सम्भव हो पाया है मम्मी, तो मेरी आंखों से अश्रुधारा बह निकली। पुरानी यादें ताज़ा हो गईं।
तुम सात साल के थे। तुम्हारे स्कूल में पेरेन्ट्स-टीचर मीटिंग थी। जैसे ही मैंने टीचर से बात शुरू की, वह बिफरकर बोलीं, ‘इसकी शैतानियां, इसकी होशियारी पर हावी हो रही हैं..’ और उन्होंने तुम्हारी गलतियां गिनानी शुरू कर दीं। मुझे याद है, तुमने कुछ कहने की कोशिश की पर उसे अनसुना करते हुए तुम्हें टीचर ने खूब डांटा। टीचर के साथ मैं भी तुम्हें डांटने लगी।
क्लास के साथियों के सामने अपनी बेइ•ज़ती होती देख तुम्हारा चेहरा रुआंसा हो गया। तुम्हें रोते देख मेरा मन पसीज उठा। मन किया उसी वक्त तुम्हें गले लगा लूं पर इससे तुम्हें गलत संदेश जाता। तुम्हें सही रास्ते पर लाने के लिए घर आकर भी मैं तुमसे नाराज़ होने का नाटक करती रही। मेरी बेरुखी से तुम व्यथित हो गए और तुमने वादा किया कि ‘मम्मी, आपको अब कभी कोई शिकायत नहीं मिलेगी।’ तुमने मन लगाकर पढ़ने का वादा भी किया। यही वो क्षण था, जिसने तुम्हारी ज़िंदगी को सकारात्मक दिशा दी और आज तुम शिखर पर पहुंच गए हो।
उस दिन स्कूल मैं बहुत चाहते हुए भी, मैं तुम्हें दिलासा नहीं दे पाई लेकिन आज मैं तुमसे कह सकती हूं कि जिंदगी में कितने ही तूफान आएं, तुम घबराना मत। मैं तुम्हारे साथ हूं बेटा।
-ढेर सारा प्यार और आशीष
तुम्हारी मां
भावना शैलेन्द्रनीमा
इन्दौर, मध्यप्रदेश
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प्रिय मुक्ता, खुश रहो!
आज किरण बेदी को टीवी पर देखा, पल भर को लगा तुम्हीं हो। वही बेबाकी और सच कहने की हिम्मत। आज बीस वर्ष हो गए, तुम्हारा सपना चूर हुए। कल की ही बात लगती है, जब तुमने उल्लसित स्वर में प्रारम्भिक और मुख्य परीक्षा में उत्तीर्ण होने के बाद मेडिकल के लिए जाना है, कहकर चौंका दिया था। पापा तुम्हारे साथ थे, पता नहीं कब एम.ए. की परीक्षा के बहाने तुम भाई के साथ परीक्षा दे आईं थीं। लेकिन अपनी संस्कृति और ग्रामीण सोच का हवाला देते हुए मैंने रौद्र रूप धारण कर लिया था, ‘एम.ए के पहले साल में ही शादी होगी। घर बैठे एयरफोर्स में कार्यरत लड़के का रिश्ता आया है। जो करना है, शादी के बाद कर लेना। इंस्पेक्टर, कलेक्टर जो चाहे बन जाना।’
तुम चुप थीं। पापा के मौन को अपने स्वीकृति में बदलने के लिए मैंने उन्हें झिंझोड़ा था, ‘और तुम्हें क्या हुआ है? लड़की से नौकरी करवाओगे? लोग क्या कहेंगे? तभी मैं कहूं कि पिछले 5-6 महीनों से इसे हो क्या गया है?’ मैं सोचती रहती थी कि मेरी बेटी ये सारे काम क्यों करती है। लम्बरदार होकर भी नौकरों के काम भी तुमने अपने ऊपर ले लिए थे। दूर खेतों में दौड़कर खाना पहुंचा आना, अनाज के बोरे खुद उठाकर चक्की पर डालना, गहरे कुंए में खुद उतर कर पंखे की हवा निकालना- ये सब आदमियों वाले काम तुम करतीं, तो मैंने इसे तुम्हारा शौक समझा। लेकिन बेटी, तुम यहां भी नहीं रूकीं। चरवाहों को हटाकर खुद गाय-भैंसों का दूध दुहना, चारा कटवाना, भैंस की पूंछ पकड़कर तैरने की कोशिश.. ये सब यूं ही नहीं थे। मुझे तब भी शक नहीं हुआ कि ये सब तुम अपना लक्ष्य पाने के लिए फिटनेस और स्टेमिना बढ़ाने के लिए कर रही हो। इसके बाद तुमने डेयरी चलाई, ट्रैक्टर चलाना सीखा। शहर से डीज़ल, खाद से भरी ट्राली लाकर हंगामा भी खड़ा कर दिया। मुझे गर्व भी होता पर मैं तुम्हारे मन की थाह नहीं पा सकी। मुझे याद है, चुनौती स्वीकार करना और जी-जान से पूरा करना तुम्हारी फितरत थी।
तुमने आधी रात को अकेले फावड़ा ले जाकर खेत में क्यारी का पानी काटा था। हंसी आती है, कैसे तुम डेयरी के काम से बचत करके पहला सलोरा टीवी लाई थीं। दूर-दूर के गांववाले भीड़ लगा लेते, चौपाल में रखना पड़ा था सबके लिए। बन्दूक चलाना, जीप चलाना, ये सब भी इसी कड़ी का हिस्सा थे।
काश! तब मैं समझ पाती कि ये सारी मेहनत तुम जिसके लिए कर रही हो, वह मुकाम तुम्हारे लिए कितना महत्वपूर्ण है। काश! तुम तब थोड़ी आक्रमक हो गई होतीं या मैं कुछ झुक जाती। मेरी वजह से तुम्हारी ज़िंदगी का सबसे अहम सपना तुमसे दूर हो गया। बेटी, दुआ करती हूं कि आगे तुम्हारे लक्ष्य में कोई बाधक न बने और तुम विवेक और हिम्मत से अपना फैसला ले सको। क्षमा की आशा के साथ-तुम्हारी मां-
विद्या चहल
पठानकोट, पंजाब
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मेरे प्यारे बेटे आदि,
तुम्हे ढेर सारा प्यार और आशीर्वाद। मुझे विश्वास है कि इस पत्र का एक-एक शब्द लिखते समय ही तुम्हारी अंतरात्मा इसे पढ़ लेगी क्योंकि मां और बच्चे का रिश्ता हर सांस से जुड़ा है।
मेरे बच्चे, मैं नहीं जानती कि तुम ऐसे क्यों हो? इसमें किसकी गलती है, मेरी, डॉक्टरों की या स्वयं परमेश्वर की। खैर, कारण जो भी हो पर तुम अनमोल हो। समय से पहले तुमने इस संसार में अपने कदम रखे। तुम्हारी आवाज़ कानों तक पहुंची ही थी कि पता चला कि तुम्हार शरीर नीला पड़ गया है। तुम्हें देख भी नहीं पाई थी कि अगले आधे घंटे के लिए तुम्हें ऑक्सीजन पर रख दिया गया।
खैर, तुम्हें गोद में लिए उत्साहित, रोमांचित हम तीसरे दिन घर पहुंचे। पांचवें दिन ज्ञात हुआ कि तुम ज़बरदस्त पीलिया के चपेट में हो और यह मस्तिष्क तक पहुंच चुका है। फिर शुरू हुआ इलाज का अंतहीन सिलसिला और इस संसार में तुम्हारी पहली और बड़ी लड़ाई।
तुम्हें दी जाने वाली हर दवा मेरे रक्त में कडवाहट भर रही थी, तुम्हारे नन्हे हाथ-पांव सुइयों से छलनी हो चुके थे और मेरा दिल भी। इसके बाद तुम्हारा विकास धीमा हो गया और एक दिन पता चला कि तुम्हें सेरीब्रल पाल्सी है और तुम आम बच्चों से हटकर विशेष हो गए। उस दिन मैं न निराश हुई, न उदास। मैंने तय कर लिया कि तुम जैसे भी हो, मेरे अस्तित्व का भाग हो। मैं तुम्हें जीवन की सारी खुशियां दूंगी। हमने जीवन को पूरी तरह तुम्हारे अनुसार बदल लिया। तुम हम सबकी मुस्कराहट के आधार हो।
आज 6 वर्ष बीत चुके हैं। क्या हुआ, जो तुम गदर्न नहीं सम्भाल पाते, तुम्हारे हाथ-पैर सामान्य नहीं हैं, क्यों तुम्हें देख लोगों को तुम पर और मुझ पर तरस आता है? जबकि तुममें परमात्मा की छवि है, पवित्रता से भरपूर, निष्पाप, सच्चे, दुलर्भ प्रेम से ओत-प्रोत। तुम बिना शब्दों के खुद को व्यक्त कर लेते हो, लोगों को पहचानने की शक्ति तुममें विशेष है। तुम्हारा स्पर्श, हमें यह विश्वास दिलाता है कि हमारी हर सम्भव कोशिशों में, जीवन के सुख-दुख में तुम हमारे साथ हो।
तुमने मुझे संसार की सबसे ऊंची, मां की पदवी दी है। संतान-सुख का अर्थ मेरे लिए है, तुम्हारा कोमल स्पर्श। मेरी गोद में बैठकर, जो निश्छल मुस्कान तुम्हारे चेहरे पर आती है, वही मेरी खुशी है, मेरा सुख है। मेरे बच्चे, शायद तुम इस बात को समझ सको कि तुम हमारी ज़िम्मेदारी नहीं, हमारी चाहत हो। हर माता-पिता की अपने बच्चों से कुछ अपेक्षाएं होती हैं पर हम चाहते हैं कि तुम हमसे अपेक्षा रखो और परमात्मा से यही प्रार्थना है कि तुम्हारे प्रति अपने प्रेम को हम अच्छी तरह निभा सकें।
हरदम, हर पल तुम्हार साथ-
तुम्हारी मां
दीपिका मिश्राउज्जैन (मध्यप्रदेश)
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प्रिय बेटा विपुल,
तू अच्छा है न? मुझे हर पल तेरी याद आती है और वो लम्हा याद आ जाता है, जब तुमने आठवीं की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण की और नवोदय विद्यालय के लिए तुम्हारा चयन हो गया।
इस उपलब्धि पर मैं खुश हुई थी पर इसी के साथ आई तुम्हारी जुदाई। जब भी कोई त्योहार हो और घर में खीर बनी हो, तो उस नन्हे विपुल का चेहरा आंखों के सामने आ जाता है, जो खीर देखते ही मां से लिपट जाता और कहता, ‘मेरी मम्मी कितनी अच्छी है।’ ठंड में नहाने के लिए गर्म पानी लेते समय आंखें नम हो जाती हैं।
पता नहीं मेरा बेटा ठंड में हॉस्टल के नियम के अनुसार कैसे ठंडे पानी से नहाता होगा? एक रात तुम्हारे हॉस्टल से फोन आया कि तुम सीढ़ी से गिर गए हो और फ्रैक्चर हुआ है। मेरी तो जैसे जान ही निकल गई। तुम्हें बस चार दिन की छुट्टी मिल पाई। मैं तुम पर खूब लाड़ और देखभाल करती, तो तुम्हारे पापा डांटते कि फिर हॉस्टल में जाने पर तुम्हें परेशानी होगी।
बेटा, ये दिन मुश्किल लग रहे हैं पर मम्मी-पापा का संघर्ष और तुम्हारी लगन ज़रूर रंग लाएगी। हमारा आशीर्वाद सदा तुम्हारे साथ है। तुम्हारी मां
गायत्री वर्माझाबुआ (मध्यप्रदेश)
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प्यारे रिक्की,
बेटा, मुझे पता है, मैं तुम्हारे साथ कई बार ज़्यादती कर जाती हूं। मैं रोज़ सोचती हूं कि रिक्की को बहुत प्यार से समझाऊंगी। फिर तुम कुछ ऐसा कर देते हो या मेरी बात को अनदेखा, अनसुना कर देते हो और मुझे पता नहीं कैसे इतना गुस्सा आ जाता है कि मैं तुम पर हाथ उठा देती हूं। मैं शायद काम के बोझ को सह नहीं पाती हूं और तुम्हारे ऊपर न चाहते हुए भी गुस्सा निकल जाता है। अभिनव, तुम्हारा भाई, अभी छोटा है और उसे मेरी •यादा ज़रूरत है। मुझे उसका अधिक ध्यान रखना पड़ता है और मैं तुमसे उम्मीद करती हूं कि तुम अपने छोटे-छोटे काम खुद कर लोगे। पर शायद मैं ही गलत हूं। मैं तुमसे •यादा अपेक्षा रख रही हूं और वे पूरी नहीं होतीं, तो मैं गुस्सा तुम्हारे ऊपर निकाल देती हूं। बाद में मुझे बहुत ग्लानि महसूस होती है और सोचती हूं कि आइंदा ऐसा नहीं करूंगी पर फिर वही हो जाता है।
रिक्की, तुम मेरी बात क्यों नहीं समझते हो, बेटा। मैं तुमसे बस यही चाहती हूं न कि तुम अपनी पढ़ाई पूरी कर लो और अपनी चीज़ों को जगह पर रखो ताकि अगले दिन उन्हें ढूंढने में परेशानी न हो। रोज़ सुबह तुम्हारी चीज़ों को ढूंढने में आधा घंटा निकल जाता है। फिर मुझे छोटू को देखना होता है, खुद स्कूल जाना होता है।
बेटा, अभी से यदि तुम मेहनत नहीं करोगे, तो आलसीपन तुम्हारी आदत बन जाएगा और तुम पिछड़ते जाओगे। मैं चाहती हूं कि मेरा बेटा दुनिया का बेस्ट बॉय बने। सारी धरती और सारा आकाश तुम्हारा हो, इसी शुभकामना के साथतुम्हारी मम्मी
अर्पिता पवारबैतूल, मध्यप्रदेश