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Mothers Day Mothers Day मदर्स-डे की प्रणोता ऐना जारविस
यह कहानी एक बेटी के संकल्प की कहानी है। अपनी मां को श्रद्धाजंलि देने का उसने वह तरीका चुना कि सम्पूर्ण विश्व उसके पदचिन्हों पर चल रहा है। मदर्स-डे की प्रणोता ऐना जारविस ने अपना पूरा जीवन मदर्स-डे को मान्यता दिलाने के लिए समर्पित कर दिया और आज वे ‘मदर ऑफ मदर्स-डे’ के नाम से जानी जाती हैं। ऐसे मिली प्रेरणाऐना जारविस का जन्म 1 मई 1864 को पश्चिमी वर्जिनिया में हुआ। ग्यारह भाई-बहनों के बड़े परिवार में उनका क्रम नवां था। मदर्स-डे का विचार ऐना के मन में किस तरह अंकुरित हुआ, इसके पीछे एक रोचक घटना है। ऐना तब महज 12 साल की थी। ऐना की मां ने अपनी बेटी की उपस्थिति में एक पाठ, ‘मदर्स ऑफ बाइबल’ पढ़ा। पाठ के पूरा होने पर उन्होंने एक कविता से इसका समापन किया। कविता का भावार्थ कुछ इस तरह था-
मैं उम्मीद करती हूं कि कोई, कभी ऐसे मदर्स-डे की खोज कर सके जो मां की मानवता के हर क्षेत्र में अद्वितीय सेवाओं के लिए उसका आभार मान सके। वह इसकी हकदार है।’
नन्ही-सी ऐना के मन पर ये शब्द गहरे अंकित हो गए और वह इन्हें ताउम्र नहीं भुला सकी। 1905 में ऐना की मां का निधन हो गया। उन्हें दफनाते वक्त भी ऐना के मन में उसी कविता के शब्द गूंज रहे थे और वह बुदबुदाई, भगवान ने चाहा तो मदर्स-डे का वह दिन ज़रूर आएगा। ऐना के भाई क्लॉड ने ये शब्द सुने।
संघर्ष का सफरऐना ने निश्चय किया कि वह मां का सपना पूरा करके ही रहेगी और इसके बाद शुरू हुआ असली संघर्ष। अमेरिकी बच्चों के द्वारा अपने माता-पिता के प्रति अवहेलना भरे व्यवहार ने उनके संकल्प को और मज़बूत किया कि कोई ऐसा दिन तय करें, जो बच्चों को उनके मां के त्याग और कष्टों का स्मरण कराए। 1907 में ऐना ने मां की दूसरी बरसी पर फिलाडेल्फिया के चर्च से राष्ट्रीय स्तर पर मदर्स-डे के लिए अभियान आरम्भ किया। इसके बाद उन्होंने और उनके समर्थकों ने इस सम्बंध में शासन को हज़ारों पत्र लिखे। 1909 तक करीब 45 राज्य इस अभियान से जुड़ चुके थे। वे कार्नेशन फूलों के ज़रिए अपनी भावनाएं व्यक्त करते थे। ये फूल ऐना की मां को बहुत प्रिय थे। 1911 में मदर्स-डे अमेरिका के लगभग हर कोने में मनाया गया और अंतत: 1914 में राष्ट्रपति विल्सन ने एक आधिकारिक घोषणा करते हुए मई के दूसरे इतवार को मदर्स-डे की मान्यता दी और इसे राष्ट्रीय अवकाश घोषित किया। इस तरह ऐना का संघर्ष पूरा हुआ। उनका उद्देश्य हर मां को सम्मान दिलाना था, जो असहनीय पीड़ा झेलकर बच्चे को जीवन और जन्म देती है। मां के बच्चे के प्रति प्यार और समर्पण का कोई मुकाबला नहीं हो सकता।
प्रस्तुती प्रतीक शिवनारायण