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Mothers Day Mothers Day मातृत्व दिवस पर विशेष.
जिस तरह एक कुम्हार कच्ची मिट्टी से तरह-तरह के बर्तन बना देता है, बच्चे के लिए भी माता-पिता की वही भूमिका होती है। परंतु वर्तमान आपाधापी की जिंदगी और तनावग्रस्त माहौल में एक मां अपने बच्चे में कितने संस्कार डाल पा रही है!
ब्रिटेन में हुए अध्ययन बताते हैं कि प्रतिस्पर्धा अब घर-घर में प्रवेश कर गई है और मां भी इससे अछूती नहीं रही है। आज की मां तनाव में है क्योंकि उसे अपने मातृत्व और कैरियर के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो रहा है। नतीजतन मां का समय न मिलने से बच्चे जिद्दी हो रहे हैं।
ऐसे में मां अपने बच्चे के बारे में सही निर्णय नहीं ले पा रही हैं और इस कारण उसके आत्मविश्वास में कमी आ रही है। बड़े-बूढ़े भी इस बात से चिंतित हैं कि उनकी अपनी लड़कियां अपने बच्चों को कैसे पाल रही हैं! कुछ दशक पहले तक बेफिक्री से बच्चों का पालन-पोषण करने वाली इन महिलाओं के अनुसार आज की मां अपने बच्चों के जीवन के प्रत्येक पहलू पर नियंत्रण रखना चाहती हैं जिससे वे तनावग्रस्त हैं।
आजकल के अधिकांश बच्चों में खोए-खोए रहना और भ्रम से ग्रसित रहने जैसे लक्षण प्रमुखता से पाए गए हैं, जिन पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। कारण, एक बच्चे में स्वस्थ, जुझारू और सभी परिस्थितियों में अपने को ढालने जैसे व्यक्तित्व विकास के लिए आरंभ के वर्ष बहुत ही महत्वपूर्ण होते हैं। इस उम्र में वह जो भी देखता है उसकी छाप उसके अवचेतन मन पर पड़ती है। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होने लगता है, अवचेतन मन की सभी बातें उसे याद आने लगती हैं और उसी के आधार पर वह निर्णय करता रहता है।
आठ और 14 वर्ष के बीच बच्च ‘अभिव्यक्ति’ की स्टेज में आ जाता है। इसी स्टेज में उसमें भावुकता का विकास होता है। चूंकि इस अवधि में वह माता-पिता के नियंत्रण में होता है अतएव जो भी माइंड सेट माता-पिता का होता है उसका प्रभाव बच्चे पर पड़ता है।
बच्च उन्हीं के जीवन-मूल्यों और धारणाओं की पूरी तरह नकल करता है। जहां तक महिलाओं की स्थिति का प्रश्न है वे आज ज्यादा शिक्षित हैं, आर्थिक रूप से स्वतंत्र हैं, परिवार नियोजन अपना रही हैं और महत्वपूर्ण पदों पर आसीन हैं।
इन सबके बावजूद इनमें उतनी संतुष्टि और खुशी नहीं दिखाई पड़ती जितनी होनी चाहिए। महिलाओं में संतुष्टि और खुशी के बारे में हुए अध्ययन बताते हैं कि अधिकांश महिलाएं खुश नहीं हैं। सत्तर के दशक के शुरुआती वर्षो में जितनी संतुष्टि और खुशी देखी जाती थी उसकी तुलना में आज कम देखी जा रही है। यह एक चिंताजनक बात है कि जैसे-जैसे महिलाएं आर्थिक रूप से स्वावलंबी बन रही हैं, वैसे-वैसे खुशियां उनसे दूर भाग रही हैं।
70 के दशक में जितना समय महिलाएं कामकाज में लगा रही थीं उतना ही समय वे आज भी लगा रही हैं परंतु अब इनका ज्यादा समय घर से बाहर कामकाज में लग रहा है। आज महिलाएं सप्ताह में 23 घंटे कठिन कामों में लगाती हैं जो स्थिति अमेरिका में है वही कमोबेश भारत में भी बन रही है। ‘फ्यूचर फॉउंडेशन’ के एक सर्वेक्षण के अनुसार महिलाएं अब 20-29 वर्ष के बीच ही पुरुषों की कमाई का 96 प्रतिशत कमा लेती हैं।
इस बात की भविष्यवाणी भी की गई है कि आने वाले 20 वर्षो में महिलाएं एक चौथाई परिवारों में कमाई का मुख्य स्रोत बनेंगी। लेकिन इस फेर में मां-बाप अपने बच्चों को समय नहीं दे पा रहे हैं। समय की क्षतिपूर्ति वे बच्चों को भारी-भरकम जेबखर्च देकर रहे हैं। यह बच्चों की आदतें और खराब करने जैसा ही है।
कह सकते हैं कि सफलता पद, प्रतिष्ठा या पैसे की प्राप्ति में नहीं है, बल्कि आप जो भी करते हैं उससे संतुष्ट होना ही असली सफलता है। यही कारण है कि जहां माता-पिता दोनों रोजगार में हैं वहां बच्चों को कम समय मिल रहा है, जिससे बच्चों पर दबाव बढ़ता जा रहा है। इसका एकमात्र उपाय यही है कि वे बच्चों को अधिक समय दें और लाड़-प्यार करें।
लेखक सामाजिक विषयों के टिप्पणीकार हैं।